Edited By Pardeep,Updated: 01 Sep, 2026 06:20 AM

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों पर एक बार फिर बड़े खतरे की घंटी बज चुकी है। जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) के कारण गढ़वाल हिमालय के अलकनंदा बेसिन में खड़ी ढलानों पर मौजूद 219 'हैंगिंग ग्लेशियर' (लटकते हुए ग्लेशियर) बेहद नाजुक स्थिति में टिके हुए हैं,...
देहरादून: उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों पर एक बार फिर बड़े खतरे की घंटी बज चुकी है। जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) के कारण गढ़वाल हिमालय के अलकनंदा बेसिन में खड़ी ढलानों पर मौजूद 219 'हैंगिंग ग्लेशियर' (लटकते हुए ग्लेशियर) बेहद नाजुक स्थिति में टिके हुए हैं, जिनके किसी भी वक्त अचानक टूटने का गंभीर खतरा बना हुआ है। हाल ही में 'Natural Hazards' जर्नल में (अप्रैल 2026) प्रकाशित एक नए शोध पत्र "Basin-scale inventory and exposure assessment of hanging glaciers, Central Himalaya" में इस डरावने सच का खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस हिमालयी क्षेत्र में तापमान वैश्विक औसत (ग्लोबल एवरेज) से भी अधिक तेजी से बढ़ रहा है, जिससे बर्फ के अचानक टूटने का जोखिम बहुत ज्यादा बढ़ गया है。
एक-तिहाई ग्लेशियर हिस्सा पूरी तरह अस्थिर
वैज्ञानिकों ने इस अध्ययन में 'GlabTop2' मॉडल का उपयोग करके अलकनंदा बेसिन के इन खतरनाक ग्लेशियरों की पहचान की है। शोध पत्र में सामने आए वैज्ञानिक आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। ये 219 लटकते हुए ग्लेशियर करीब 71.7 ± 3.5 वर्ग किलोमीटर (km²) के बड़े क्षेत्र में फैले हुए हैं। इनका कुल अनुमानित बर्फ आयतन (ice volume) लगभग 2.39 ± 0.42 घन किलोमीटर (km³) है। और सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि इसमें 0.74 ± 0.14 km³ केवल 'हैंगिंग आइस मास' (लटकती हुई बर्फ) है, जिसका सीधा मतलब है कि इन ग्लेशियरों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा बेहद अस्थिर और टूटने की कगार पर है।
उत्तराखंड में लटकते ग्लेशियरों की पहली ऐसी सूची
इस महत्वपूर्ण शोध पत्र के लेखक और आईआईटी (IIT) भुवनेश्वर में असिस्टेंट प्रोफेसर आशिम सत्तार ने मीडिया से बातचीत में बताया कि क्लाइमेट चेंज का इस पूरे हिमालयी क्षेत्र पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा है। उन्होंने कहा, "उत्तराखंड में लटकते हुए ग्लेशियरों की यह पहली इन्वेंट्री (सूची) में से एक है।" उन्होंने चेतावनी दी कि तेजी से बढ़ती गर्मी के कारण हिमालय के ग्लेशियरों में अस्थिरता लगातार बढ़ रही है, जिससे कभी भी बर्फ नीचे गिर सकती है और निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को भारी तबाही का सामना करना पड़ सकता है।
निगरानी और आपदा प्रबंधन की सख्त जरूरत
वैज्ञानिकों के इस खुलासे के बाद अब उत्तराखंड प्रशासन और आपदा प्रबंधन विभागों की जिम्मेदारी काफी बढ़ गई है। शोध में साफ तौर पर यह सलाह दी गई है कि इस बड़े खतरे को देखते हुए उत्तराखंड में पिघलते ग्लेशियरों की लगातार निगरानी बढ़ाना और आपदा प्रबंधन की मजबूत योजनाएं तैयार करना अब बेहद जरूरी हो चुका है ताकि किसी भी संभावित बड़े हादसे से लोगों को सुरक्षित बचाया जा सके।