Edited By Anu Malhotra,Updated: 03 Aug, 2026 07:25 AM

Lung Cancer: फेफड़ों का कैंसर अब केवल ज़्यादा स्मोकिंग करने वालों तक सीमित नहीं रह गया है। हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं जिन्होंने कभी सिगरेट या तंबाकू का सेवन नहीं किया। विशेषज्ञों के अनुसार, बढ़ता...
Lung Cancer: फेफड़ों का कैंसर अब केवल ज़्यादा स्मोकिंग करने वालों तक सीमित नहीं रह गया है। हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं जिन्होंने कभी सिगरेट या तंबाकू का सेवन नहीं किया। विशेषज्ञों के अनुसार, बढ़ता वायु प्रदूषण, घर के अंदर मौजूद प्रदूषक तत्व और आनुवंशिक कारण इस बदलाव के प्रमुख कारक बनकर उभरे हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि फेफड़े होना ही इस बीमारी के लिए सबसे बड़ी शर्त है, सिर्फ धूम्रपान नहीं। इसलिए गैर-धूम्रपान करने वाले लोगों को भी शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और समय पर जांच करानी चाहिए।
भारत में बढ़ रहे हैं गैर-धूम्रपान करने वाले मरीज
एक विशेषज्ञ के अनुसार, दुनिया भर में फेफड़ों के कैंसर के लगभग 10 से 25 प्रतिशत मामले ऐसे लोगों में पाए जाते हैं जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया। वहीं भारत में यह आंकड़ा 30 से 50 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। उन्होंने बताया कि पहले यह बीमारी मुख्य रूप से अधिक उम्र के पुरुष धूम्रपान करने वालों में देखी जाती थी, लेकिन अब युवा वयस्कों और गैर-धूम्रपान करने वाली महिलाओं में एडेनोकार्सिनोमा प्रकार का फेफड़ों का कैंसर तेजी से सामने आ रहा है।
वायु प्रदूषण और घरेलू प्रदूषक बढ़ा रहे हैं खतरा
पुणे के रूबी हॉल क्लिनिक के चेस्ट फिजिशियन डॉ. महावीर मोदी का कहना है कि तंबाकू के अलावा कई अन्य कारण भी फेफड़ों के कैंसर का जोखिम बढ़ा रहे हैं। उनके अनुसार, लंबे समय तक वाहनों से निकलने वाला धुआं, औद्योगिक प्रदूषण और हवा में मौजूद सूक्ष्म कण (PM2.5) फेफड़ों की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं। इसके अलावा घर के अंदर सेकेंड हैंड स्मोक, रेडॉन गैस और बिना उचित वेंटिलेशन के ठोस ईंधन से खाना पकाने के दौरान निकलने वाला धुआं भी बीमारी का कारण बन सकता है।
आनुवंशिक बदलाव भी बन सकते हैं वजह
गुरुग्राम के CK बिड़ला अस्पताल के सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. पुष्पिंदर गुलिया बताते हैं कि गैर-धूम्रपान करने वाले मरीजों में फेफड़ों का कैंसर जैविक रूप से अलग होता है। इनमें अक्सर EGFR जीन में म्यूटेशन या ALK जीन में बदलाव पाए जाते हैं। आधुनिक मॉलिक्यूलर टेस्टिंग की मदद से इन बदलावों की पहचान कर मरीजों को टार्गेटेड थेरेपी दी जा सकती है, जो पारंपरिक कीमोथेरेपी की तुलना में अधिक प्रभावी और कम दुष्प्रभाव वाली होती है।
इन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें
विशेषज्ञों का कहना है कि गैर-धूम्रपान करने वाले अक्सर खुद को जोखिम से बाहर मानते हैं, इसलिए शुरुआती लक्षणों को सामान्य खांसी, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस या टीबी समझकर इलाज कराते रहते हैं। इससे बीमारी का पता देर से चलता है।
अगर ये लक्षण तीन सप्ताह से अधिक समय तक बने रहें तो तुरंत डाॅक्टर से सलाह लें...
-लगातार तीन सप्ताह से अधिक रहने वाली या बढ़ती हुई खांसी
-सामान्य गतिविधियों के दौरान सांस फूलना या घरघराहट
-खांसी के साथ खून या जंग जैसे रंग का बलगम आना
-तीन सप्ताह से अधिक समय तक रहने वाला सीने, पीठ या कंधे का दर्द
-बार-बार निमोनिया या ब्रोंकाइटिस होना और एंटीबायोटिक से भी राहत न मिलना
-बिना कारण वजन कम होना, लगातार थकान या आवाज बैठ जाना
प्रदूषण से बढ़ रहा है कैंसर का खतरा
विशेषज्ञ अनुसार, WHO और इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) ने बाहरी वायु प्रदूषण और PM2.5 कणों को ग्रुप-1 कार्सिनोजेन यानी कैंसर पैदा करने वाले प्रमुख कारणों में शामिल किया है। उन्होंने बताया कि दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु जैसे शहरों में PM2.5 का स्तर WHO के मानकों से कई गुना अधिक है। लंबे समय तक ऐसे प्रदूषण के संपर्क में रहने से फेफड़ों में सूजन पैदा होती है, जो पहले से मौजूद निष्क्रिय म्यूटेटेड कोशिकाओं को सक्रिय कर कैंसर में बदल सकती है।
बचाव के लिए क्या करें?
-पहले यह समझें कि फेफड़ों का कैंसर सिर्फ धूम्रपान करने वालों की बीमारी नहीं है।
-प्रदूषण वाले दिनों में N95 या FFP2 मास्क पहनें।
-घर में पर्याप्त वेंटिलेशन रखें और जरूरत पड़ने पर HEPA एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करें।
-अत्यधिक प्रदूषण के समय खुले में व्यायाम करने से बचें।
-तीन सप्ताह से अधिक समय तक रहने वाली खांसी या अन्य श्वसन संबंधी लक्षणों को नजरअंदाज न करें।
-समय रहते जांच कराएं, क्योंकि शुरुआती चरण में फेफड़ों के कैंसर का इलाज संभव और अधिक प्रभावी होता है।
नोट: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से है। किसी भी स्वास्थ्य संबंधी समस्या या लक्षण होने पर योग्य चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।