शनिवार-मंगलवार को इस मंदिर में दिखते हैं ऐसे दृश्य, जानकर कांप जाएगी आपकी भी रूह

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Tuesday, July 18, 2017-9:44 AM

गुजरात के सौराष्ट्र स्थित सारंगपुर गांव के कष्टभंजन हनुमान के दर्शन मात्र से ही किसी भी जातक की भूत, प्रेत, ब्रह्मराक्षस बाधा तुरंत दूर हो जाती है। सारंगपुर के कष्टभंजन हनुमान के इस धाम को पीड़ित जनों का उद्धार स्थल कहा जाता है। यहां हर जाति, धर्म के लोग आते हैं। कहा जाता है कि भूत-प्रेत-पिशाच तथा ब्रह्मराक्षस से पीड़ित व्यक्ति पर यहां का पुजारी जैसे ही मंत्र बोलकर जल छिड़कता है वैसे ही मानव शरीर को जकड़ी बुरी आत्मा सामने आ जाती है। 


कौन है? कहां से आए हो? इसे क्यों परेशान कर रहे हो? क्या चाहते हो? आदि बातें पुजारी उस आत्मा से करता है। कभी-कभी ये बुरी आत्माएं चौंकाने वाली कहानियां भी बताती हैं। पहले तो ये पीड़ित को नहीं छोडऩे का हठ करती हैं लेकिन जैसे ही उन्हें स्वामी गोपालानंद की छड़ी दिखाई जाती है, वैसे ही वे चीखने-चिल्लाने लगती हैं और फिर उस व्यक्ति को कभी परेशान न करने का वचन देकर वहां से भाग खड़ी होती हैं। मनुष्य तन से बुरी आत्मा के दूर होते ही वह पूर्ण स्वस्थ हो जाता है, ऐसा लोगों को विश्वास है। इस तरह का दृश्य इस मंदिर में प्रत्येक शनिवार एवं मंगलवार को देखने को मिलता है, जहां हजारों श्रद्धालु कष्टभंजनदेव का दर्शन कर अपने विविध कष्टों से निजात पाते हैं।


सारंगपुर के विषय में कहा जाता है कि रामायण काल में जब भगवान राम अपने भाई लक्ष्मण के साथ सीता जी को खोजते-खोजते किष्किंधा पहुंचे तो वहां उनकी मुलाकात हनुमान जी से हुई। हनुमान जी ने उन्हें सुग्रीव से मिलवाया। बाली का वध हुआ। सुग्रीव किष्किंधा के राजा बने। राजा सुग्रीव ने अपने सचिवों हनुमान जी, नल, नील, जामवंत, अंगद आदि को बुलाकर कहा कि वन प्रदेशों में जाकर वानर सेना को इकट्ठा करो। हनुमान जी को पश्चिम दिशा की ओर भेजा गया।

 
उस समय रैवताचल पर्वत के वन प्रदेश में वानरों की संख्या अधिक थी। हनुमान जी वहां मांडव्य ऋषि के आश्रम में रुके। यहां सारंग मृग, कालियार मृग, मोर तथा विविध पक्षियों के कलरव, नयनरम्य मनोहर स्थान को देखकर हनुमान जी मंत्र मुग्ध हो गए। किष्किंधा पहुंचकर हनुमान जी ने भगवान राम से इस वन प्रदेश की सुंदरता का जब वर्णन किया तभी भगवान राम के मुख से निकला कि भविष्य में आप वहां निवास कर पीड़ितों के कष्ट दूर करेंगे।


युग बदला। कलियुग आया। इसके साथ ही अयोध्या के सूर्यवंशी रघुवंशी राजाओं की समृद्धि भी घटने लगी। अवधपुरी में आततायियों का प्रभाव बढऩे लगा। तीर्थस्थल की पवित्रता दूषित होने लगी। समय को देखते हुए वहां के सूर्यवंशियों ने मारवाड़ में आकर सूर्यनारायण का मंदिर बनाया तथा उनकी पूजा करने लगे। 


मार्तंड यानी सूर्य की पूजा करने वाले वृद्ध पुजारी जिसे लोग ‘दादा’ कहते थे, का नियम था कि जब तक वे भगवान की पूजा नहीं कर लेते तब तक अन्न-जल ग्रहण भी नहीं करते थे। वहां अकाल पड़ गया और कई वर्ष तक बारिश नहीं हुई। लोग जल की खोज में गुजरात की ओर निकले।

 
दादा भी सूर्यनारायण की मूर्त को एक रथ में रखकर उनके साथ चले। चलते-चलते उनके रथ का एक पहिया मिट्टी में धंस गया। बहुत कोशिश हुई पर पहिया नहीं निकला। उसी रात सूर्य भगवान ने उन्हें स्वप्र में दर्शन देकर कहा कि यहीं विश्राम करो। इस क्षेत्र में एक दिन पूर्ण पुरुषोत्तम नारायण आएंगे और सूर्यवंशियों का कल्याण करेंगे। मार्तंडराय के नाम पर स्थापित सूर्य मंदिर को मांडवराय कहा जाने लगा। सूर्यभक्त दादा के वंशज कारियाणी, लोया, बोराद, नागकड़ा आदि गांवों में बस गए। स्वामी नारायण सम्प्रदाय के स्वामी गोपालानंद जी महाराज ने अपनी तपस्या से हनुमान जी को प्रसन्न कर उनसे सारंगपुर में निवास करने का आग्रह किया। 


1905 में कष्टभंजन हनुमान जी की मूर्ति की स्थापना एवं प्राण-प्रतिष्ठा हुई। तभी से यहां प्रतिदिन हजारों की संख्या में भक्त अपने कष्टों के निवारण के लिए कष्टभंजन देव का दर्शन करने के लिए देश-विदेश से आते हैं। यहां सुरेन्द्र नगर स्टेशन से बोराद के लिए ट्रेन से या सड़क मार्ग से पहुंचा जा सकता है।   


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