‘शुक्र’ हो मेहरबान, तो कल्याण ही कल्याण

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Thursday, November 10, 2016-2:58 PM

किसी व्यक्ति की भौतिक समृद्धि एवं सुखों का भविष्य ज्ञान प्राप्त करने के लिए जन्म कुंडली में शुक्र ग्रह की स्थिति एवं शक्ति (बल) का अध्ययन करना अत्यंत महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है। अगर जन्म कुंडली में शुक्र की स्थिति सशक्त एवं प्रभावशाली हो तो जातक को सब प्रकार के भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है। इसके विपरीत यदि शुक्र निर्बल अथवा दुष्प्रभावित (अपकारी ग्रहों द्वारा पीड़ित) हो तो भौतिक अभावों का सामना करना पड़ता है।


इस ग्रह को जीवन में प्राप्त होने वाले आनंद का प्रतीक माना गया है। प्रेम और सौंदर्य से आनंद की अनुभूति होती है और श्रेष्ठ आनंद की प्राप्ति स्त्री से होती है। अत: इसे स्त्रियों का प्रतिनिधि भी माना गया है और दाम्पत्य जीवन के लिए ज्योतिषी इस महत्वपूर्ण स्थिति का विशेष अध्ययन करते हैं।


अगर शक्तिशाली शुक्र (स्वराशि, उच्च राशि का मूल त्रिकोण) केंद्र में स्थित हो और किसी भी अशुभ ग्रह से युक्त अथवा दृष्ट न हो तो जन्म कुंडली के समस्त दुष्प्रभावों (अनिष्ट) को दूर करने की सामर्थ्य रखता है। शुक्र लग्र द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, नवम, दशम और एकादश भाव में स्थित हो तो धन, सम्पत्ति और सुखों के लिए अत्यंत शुभ फलदायक है। सशक्त शुक्र अष्टम भाव में भी अच्छा फल प्रदान करता है। शुक्र अकेला अथवा शुभ ग्रहों के साथ शुभ योग बनाता है। चतुर्थ स्थान में शुक्र बलवान होता है। इसमें अन्य ग्रह अशुभ भी हों तो भी जीवन साधारणत: सुख कर होता है। स्त्री राशियों में शुक्र को बलवान माना गया है। यह पुरुषों के लिए ठीक है किंतु स्त्री की कुंडली में स्त्री राशि के शुक्र का फल अशुभ मिलता है।


शुक्र और चंद्र सशक्त होकर केंद्र अथवा त्रिकोण में स्थित हों तो सम्मान या राजकीय सुख प्राप्त करते हैं। महात्मा गांधी की कुंडली में इस प्रकार का योग था। शुक्र और बुध पंचम या नवम भाव में स्थित हो तो जातक को धन, सम्मान और प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है।


शुक्र की केंद्र में स्वराशि अथवा उच्चराशि में स्थिति हो तो मालव्य योग होता है। यह योग जातक को सुंदरता, स्वास्थ्य, विद्वता, धन-दाम्पत्य सुख, सौभाग्य और सम्मानदायक है। अशुभ ग्रह के योग से यह योग भंग हो जाता है।


शुक्र, बृहस्पति और चंद्र की युति एवं केंद्र में स्थिति से मृदिका योग होता है जिसके फलस्वरूप उच्च पद एवं अधिकार की प्राप्ति होती है। अशुभ ग्रहों के साथ या दुस्थानों (6, 8, 12) में स्थित होने पर यह ग्रह अच्छा फल नहीं देता। सूर्य, मंगल अथवा शनि के साथ शुक्र की युति होने पर जातक की प्रवृत्ति अनैतिक कार्यों की ओर होती है किंतु बृहस्पति की दृष्टि होने पर यह दोष नष्ट हो जाता है।


शुक्र, वाहन का कारक ग्रह है। अत: लग्र में चतुर्थेश के साथ होने पर वाहन योग बनता है। कामवासना या यौन सुख पर शुक्र का स्वामित्व माना गया है। अत: विवाह अथवा यौन सुख के लिए भी इसकी स्थिति का अध्ययन करना महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है।
अगर यह ग्रह जन्मकुंडली में निर्बल अथवा दुष्प्रभावित हो तो दाम्पत्य सुख का अभाव रहता है। सप्तम भाव में शुक्र की स्थिति विवाह के बाद भाग्योदय की सूचक है। शुक्र पर मंगल के प्रभाव से जातक का जीवन अनैतिक होता है और शनि का प्रभाव जीवन में निराशा व वैवाहिक जीवन में अवरोध, विच्छेद अथवा कलह का सूचक है।


शुक्र अगर दुस्थान में स्थित होकर अशुभ ग्रह से प्रभावित हो तो जीवनसाथी की शीघ्र हानि और पंचम, सप्तम और नवम में निर्बल सूर्य के साथ होने पर वैवाहिक जीवन का अभाव बतलाता है। दुष्प्रभावित शुक्र प्राय: गंभीर बीमारियों का कारण भी होता है। शुक्र और मंगल सप्तम भाव में अशुभ ग्रह द्वारा दृष्ट हों तो संभोगजन्य रोग होता है।
स्त्री की कुंडली (स्त्री जातक) में शुक्र की अच्छी स्थिति का महत्व है। अगर स्त्री की कुंडली में लग्र में शुक्र और चंद्र हो तो उसे अनेक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति होती है। शुक्र और बुध की युति सौंदर्य, कलाओं में दक्षता और सुखमय दाम्पत्य जीवन की सूचक है। शुक्र की अष्टम स्थिति गर्भपात को सूचित करती है और यदि मंगल के साथ युति हो तो वैधव्य की सूचक है।


जीवन में प्राप्त होने वाले आनंद, अलंकार, सम्पत्ति, स्त्री सुख, विवाह के कार्य, उपभोग के स्थान, वाहन, काव्य कला, संभोग तथा स्त्री आदि के संबंध में शुक्र से विचार करना उपयुक्त है। अगर यह ग्रह जन्म कुंडली में शुभ एवं सशक्त प्रधान है तो जातक का जीवन सफल एवं सुखमय माना जाता है किंतु शुक्र के निर्बल या अशुभ होने पर जातक की अनैतिक कार्यों में प्रवृत्ति होती है, समाज में मान-सम्मान नहीं मिलता तथा अनेक सुखों का अभाव रहता है।


 


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