मुक्ति के प्रथम द्वार पर करें पिंडदान, श्री विष्णु संग 33 करोड़ देवी-देवता देंगे पितरों को मोक्ष

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You Are HereDharmik Sthal
Tuesday, September 20, 2016-10:11 AM

पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म कर पिंडदान और तर्पण करने से पूर्वजों की सोलह पीढ़ियों की आत्मा को शांति और मुक्ति मिल जाती है। प्रयाग को पितरों की मुक्ति के लिए प्रथम व मुख्य द्वार माना जाता है। यहां पिंडदान का विशेष महत्व है। प्रयाग के संगम पर हजारों श्रद्धालु पिंडदान व तर्पण करके त्रिवेणी की धारा में डुबकी लगाकर अपने पूर्वजों की आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना कर रहे हैं।

प्रयाग में मंडन करने के बाद बालों का दान किया जाता है। उसके पश्चात सत्रह पिंड तैयार करके उनका पूजन करने के बाद विधि-विधान से संगम में विसर्जित कर बाकी के अनुष्ठान किए जाते हैं।

धर्म शास्त्रों में भगवान विष्णु को मोक्ष अर्थात मुक्ति के देवता माना जाता है। प्रयाग में भगवान विष्णु बारह भिन्न रूपों में विराजमान हैं। माना जाता है कि त्रिवेणी में भगवान विष्णु बाल मुकुंद स्वरूप में वास करते हैं। इसी कारण प्रयाग को पितृ मुक्ति का पहला और सबसे मुख्य द्वार माना जाता है।

इसके अतिरिक्त काशी को मध्य अौर गया को अंतिम द्वार कहा जाता है। प्रयाग में श्राद्ध कर्म का आरंभ मुंडन संस्कार से होता है। यहां मुंडन के बाद बालों का दान किया जाता है । उसके बाद तिल, जौ और आटे से 17 पिंड बनाकर विधि विधान के साथ उनका पूजन करके उन्हें गंगा में विसर्जित करने और संगम में स्नान कर जल का तर्पण किये जाने की परम्परा है।

माना जाता है कि त्रिवेणी संगम में पिंडदान करने से भगवान विष्णु के साथ ही प्रयाग में वास करने वाले 33 करोड़ देवी-देवता भी पितरों को मोक्ष प्रदान करते हैं।


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