भवसागर से पार करवाकर माया के बंधन से मुक्त करेगा, युगल मंत्र

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Wednesday, September 07, 2016-2:27 PM

लीला विग्रहों का प्राकट्य ही वास्तव में अपनी आराध्या श्री राधा जू के निमित्त ही हुआ है। श्री राधा जू प्रेममयी हैं और भगवान श्री कृष्ण आनन्दमय हैं। जहां आनन्द है वहीं प्रेम है और जहां प्रेम है वहीं आनन्द है। आनन्द-रस-सार का धनीभूत विग्रह स्वयं श्री कृष्ण हैं और प्रेम-रस-सार की धनीभूत श्री राधारानी हैं अत: श्री राधा रानी और श्री कृष्ण एक ही हैं।

 

सच्चे प्रेम में प्रेमी के पार्थिव शरीर की उपस्थिति का परितार बड़ी ऊंची स्तर की बात है। प्रेम में अधिकतम त्याग कभी शादी न करना राधा का यह कौमार्य आजीवन उत्सर्ग को सदा अन्नत प्रेमा धार रसधार श्री राधा का नाम श्री कृष्ण से भी पहले लेने को प्रेरित करता रहेगा। उनका पावन नाम भक्तों को तारता रहेगा।

 

कृष्ण प्राणमयी राधा, राधा प्राणमयी हरि।

 

भगवान श्री कृष्ण के प्राण, श्री राधा रानी के हृदय में बसते हैं और श्री राधारानी के प्राण भगवान श्री कृष्ण के हृदय में बसते हैं। वह जीवन नित्य धन्य है, जो श्री राधा कृष्ण के आश्रय में व्यतीत होता है।  

 

परम ज्ञानी उद्धव जी को भगवान श्री कृष्ण जी का तत्व श्री राधा जी से प्राप्त हुआ। ऋषि अष्टावक्र ने अपने अंतिम समय में श्री राधा-माधव के दर्शन प्राप्त कर गोलोक धाम प्राप्त किया। श्री राधा जी की भक्ति से अनंत ब्रह्मांडों के स्वामी श्री कृष्ण सहज ही प्राप्त हो जाते हैं।  

 

वृंदावनेश्वरी राधा, कृष्णो वृंदावनेश्वर:। जीवनेन धने नित्यं राधा कृष्ण गतिर्मम।। 

 

अर्थात : श्री राधा रानी वृंदावन की स्वामिनी हैं और भगवान श्री कृष्ण वृंदावन के स्वामी हैं। श्री राधा कृष्ण के परम आश्रय में मेरे जीवन का प्रत्येक क्षण व्यतीत हो।  

 

अत: भवसागर से पार कराने वाला, माया के बंधन से छुड़ाने वाला, कलयुग में श्री राधा कृष्ण का युगल मंत्र ही एक मात्र उपाय है। 


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