Edited By ,Updated: 17 Aug, 2026 03:59 AM

भारत अमूल्य प्राचीन धरोहरों से समृद्ध प्राचीन सभ्यताओं का देश है जिनमें सिंधु घाटी सभ्यता जिसके महास्वरूप को हड़प्पा सभ्यताएं भी कहा जाता है। हमारे प्राचीन ऐतिहासिक स्मारक और अवशेष हमारे इतिहास के साक्षी होने के नाते ये हमारे देश में पर्यटन उद्योग...
भारत अमूल्य प्राचीन धरोहरों से समृद्ध प्राचीन सभ्यताओं का देश है जिनमें सिंधु घाटी सभ्यता जिसके महास्वरूप को हड़प्पा सभ्यताएं भी कहा जाता है। हमारे प्राचीन ऐतिहासिक स्मारक और अवशेष हमारे इतिहास के साक्षी होने के नाते ये हमारे देश में पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देकर देश के राजस्व में वृद्धि तथा विदेशी मुद्रा की कमाई का बड़ा जरिया बन सकते हैं परंतु सम्बन्धित विभाग की अनदेखी के कारण नष्टï हो रहे हैं जिसे कदापि उचित नहीं कहा जा सकता।
लद्दाख तथा देश के विभिन्न भागों में बहुत अच्छी सुंदर गुफाएं और मठ हैं परंतु उनकी समुचित देखभाल न होने के कारण उनकी हालत अत्यंत खस्ता हो गई है जबकि इसके विपरीत चीन तथा अन्य देशों में वहां के संबंधित विभागों ने अपनी इस अनमोल विरासत को बहुत अच्छी तरह सहेज कर रखा हुआ है जिन्हें देखने के लिए दुनिया भर से पर्यटकों के आने के कारण वहां के पर्यटन उद्योग को भारी प्रोत्साहन मिल रहा है। चीन में भारत से गए बौद्ध भिक्षुओं द्वारा निर्मित गुफाएं (बौद्ध मठ) 1650 से 1800 साल पुरानी हैं।
नवीनतम जानकारी के अनुसार पुरातात्विक महत्व के स्मारकों की देखभाल और संरक्षण के लिए जिम्मेदार ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संस्थान’ (ए.एस.आई.) का पिछले 5 वर्षों में संरक्षित स्मारकों की देखभाल पर होने वाला खर्च घटता-बढ़ता रहा है। इसने वित्त वर्ष 2024 में इनके संरक्षण पर 1,444 करोड़ रुपए खर्च किए, जो वित्त वर्ष 2026 में घट कर सिर्फ 1,377 करोड़ रुपए ही रह गए। कुछ समय पूर्व भारत के ‘संस्कृति और पर्यटन मंत्री’ गजेंद्र सिंह शेखावत ने ‘ए.एस.आई.’ द्वारा संरक्षित स्मारकों के सभी प्रमुख सर्किटों में ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संस्थान’ के नियोजित और वास्तविक खर्च का ब्यौरा दिया।
वित्त वर्ष 2026 में सर्वाधिक खर्च दिल्ली, मुम्बई, रायपुर और आगरा सॢकटों पर किया गया। दिल्ली-एन.सी.आर. के स्मारकों पर 142 करोड़ रुपए से अधिक और शेष तीनों पर 116 करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए गए। विदेशियों के बीच लोकप्रिय अन्य प्रमुख सर्किटों-जयपुर, जोधपुर और चेन्नई में खर्च में कटौती देखी गई, जबकि अजंता तथा एलोरा धन प्राप्त करने के मामले में प्रमुख हैं मगर खराब स्थिति में हैं। जोगेश्वरी गुफाओं (पत्थरों को काट कर बनाई गई 6-8 शताब्दी पुरानी पौराणिक गुफाएं) जैसे प्राचीन स्थल अत्यधिक कूड़े-कचरे से भरे हैं।
हड़प्पा संस्कृति के भारत में 7 स्थलों में से 2, ढोलाविरा तथा लोथल गुजरात में हैं और रखरखाव के कारण कुछ अच्छी स्थिति में हैं, जबकि हरियाणा में स्थित बाकियों का इस्तेमाल स्थानीय लोगों द्वारा किया जा रहा है।
इसी तरह अपरकोट गुफाएं, जोगीमारा गुफाएं, अंढावाली गुफाएं सभी उपेक्षा तथा रखरखाव की कमी के कारण नष्ट हो रही हैं। कोंडाना गुफाएं (पत्थर काट कर बनाई गई 16 बौद्ध गुफाओं का समूह) भी बहुत खराब स्थिति में हैं, जहां भारी खरपतवार उग आए हैं तथा रौशनी की कोई व्यवस्था नहीं। लद्दाख घाटी में ससपोल गुफाएं खंडहर बनती जा रही हैं। 2025 में आगरा (ताजमहल), औरंगाबाद (बौद्ध, अजंता और एलोरा गुफाएं) तथा कर्नाटक के हम्पी समेत सभी बड़े टूरिस्ट सॢकटों में खर्चे में काफी कमी आई।
यह खर्च इसलिए मायने रखता है क्योंकि भारत विदेशी पर्यटकों को आकॢषत करने के लिए संघर्ष कर रहा है और हमारी सांस्कृतिक विरासत का रखरखाव इसमें मदद कर सकता है। पर्यटन मंत्रालय के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 2025 में भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या वाॢषक आधार पर 9.4 प्रतिशत घट कर 9.02 मिलियन रह गई जबकि 2019 में, महामारी के वर्षों में टूरिज्म के ठप्प होने से पहले, लगभग 11 मिलियन विदेशी पर्यटक भारत आए थे।
स्मारकों और अन्य विरासतों के संरक्षण पर किसी देश को कितना खर्च करना चाहिए, इसका कोई मापदंड नहीं है परंतु यूनेस्को के नवीनतम आंकड़ों से पता चलता है कि यूरोप और उत्तरी अमरीका के देश अपनी सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत की सुरक्षा पर सर्वाधिक खर्च करते हैं और बहुत अधिक लाभ भी उठाते हैं। जैसे अमरीका पर्यटन से 213-215 अरब डॉलर प्रतिवर्ष, स्पेन जैसा छेटा-सा देश 113 अरब डॉलर कमाता है, ब्रिटेन 89.6 अरब डॉलर, फ्रांस 84 अरब डॉलर, जापान 64 अरब डॉलर हर साल कमाते हैं। तो क्या भारत को इस ओर ध्यान नहीं देना चाहिए? और तो और, मिस्र ने नया ग्रैंड इजिप्शियन (जेम) म्यूजियम इंगलैंड, फ्रांस जैसे अनेकों देशों से अपना आर्ट तथा जवाहरात वापस लाकर खोला है और वहां पर्यटक बढ़ते जा रहे हैं। चीन ने डुनहुआंग में 492 गुफाओं को संरक्षित किया है। अत: भारत को भी अपने पुरातात्विक महत्व की विरासती इमारतों के संरक्षण पर ध्यान देने की आवश्यकता है, जिससे पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा और हमारे राजस्व में भी वृद्धि होगी।