‘चंद सरकारी अस्पताल’ लापरवाही का शिकार होते मरीज!

Edited By Updated: 02 Oct, 2026 02:41 AM

patients falling prey to negligence in a few government hospitals

लोगों को सस्ती और उच्च स्तरीय शिक्षा एवं चिकित्सा, स्वच्छ पेयजल और लगातार बिजली उपलब्ध करवाना केंद्र और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है परंतु स्वतंत्रता के 79 वर्ष बाद भी सरकारें इसमें विफल हो रही हैं। इसीलिए लोग सरकारी अस्पतालों में इलाज करवाने से...

लोगों को सस्ती और उच्च स्तरीय शिक्षा एवं चिकित्सा, स्वच्छ पेयजल और लगातार बिजली उपलब्ध करवाना केंद्र और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है परंतु स्वतंत्रता के 79 वर्ष बाद भी सरकारें इसमें विफल हो रही हैं। इसीलिए लोग सरकारी अस्पतालों में इलाज करवाने से भी संकोच करते हैं। 
चंद सरकारी अस्पतालों के चिकित्सा स्टाफ की लापरवाही का अनुमान हाल ही में सामने आई निम्न घटनाओं से लगाया जा सकता है : 

* 9 जून को ‘बीकानेर’ (राजस्थान) के सरकारी अस्पताल में सिजेरियन डिलीवरी के बाद 6 महिलाओं की किडनियां फेल हो गईं जिसके चलते महिलाओं को वैंटिलेटर तथा डायलिसिस पर रखना पड़ा। 
शुरुआत में अस्पताल प्रशासन और डॉक्टर इस पूरे मामले को दबाने और छिपाने की कोशिश कर रहे थे। जब लापरवाही से प्रभावित महिलाओं की स्थिति बिगडऩे लगी तो अस्पताल के पूरे सिस्टम की पोल खुल गई।
* 9 सितम्बर को ‘पुनालुर’ (केरल) स्थित  सरकारी अस्पताल में एमरजैंसी सी-सैक्शन (सिजेरियन आप्रेशन) के बाद एक नवजात शिशु की मौत हो गई। नवजात के परिजनों ने इलाज में देरी और लापरवाही का आरोप लगाते हुए पुलिस में संबंधित डाक्टरों के विरुद्ध मामला दर्ज कराया।

* 26 सितम्बर को ‘गंगटोक’(सिक्किम) स्थित सबसे बड़े ‘एस.टी.एन.एम. सोच्यागांग अस्पताल’ में एक महिला की लैप्रोस्कोपिक (दूरबीन से की जाने वाली) सर्जरी के दौरान बड़ा ‘कट’ लगा देने के परिणामस्वरूप अत्यधिक ब्लीङ्क्षडग होने से उसकी मौत हो गई। 
* 28 सितम्बर को ‘नोएडा’ (उत्तर प्रदेश) में सैक्टर 39 स्थित जिला अस्पताल में एक महिला का प्रसव कराने में डाक्टर द्वारा अत्यधिक देरी करने के कारण उसके नवजात शिशु की मौत हो गई। 
परिजनों का आरोप है कि समय पर महिला को अस्पताल में भर्ती नहीं किया गया और घंटों इंतजार करवाया। देरी से प्रसव होने के कारण नवजात को सांस लेने में दिक्कत हुई और उसकी मौत हो गई।

* 28 सितम्बर को ही ‘मेरठ’ (उत्तर प्रदेश) में ‘सरकारी महॢष अस्पताल’ में पैर की हड्डïी टूटने के कारण आप्रेशन के लिए भर्ती हुए 22 वर्षीय युवक ‘ललित कोहली’ की गलत खून चढ़ाने के कारण मौत हो गई।
उसके परिजनों का आरोप है कि रात के आप्रेशन के बाद सुबह तक उनका पेशैंट बिल्कुल ठीक था और बातचीत कर रहा था, लेकिन अस्पताल स्टाफ द्वारा गलत खून चढ़ाने के बाद उसे अचानक बेचैनी तथा घबराहट होने लगी और उसकी मौत हो गई। 
* 30 सितम्बर को ‘वाराणसी’ (उत्तर प्रदेश) में बी.एच.यू. एम्स के ट्रॉमा सैंटर में 71 वर्षीय राधिका देवी की गलत सर्जरी के कारण मौत हो गई।
* 30 सितम्बर  को ही ‘ऊना’ (हिमाचल प्रदेश) में छाती के दर्द से तड़प रहा हरपाल सिंह नामक व्यक्ति  क्षेत्रीय अस्पताल के एमरजैंसी वार्ड में पहुंचा परंतु समय पर इलाज न मिलने से उसकी मौत हो गई। परिजनों ने डाक्टरों पर लापरवाही का आरोप लगाया तथा कहा कि न ही उसकी समुचित जांच की गई और न ही समय पर उचित इलाज किया गया। 

* 30 सितम्बर को ‘मुरैना’ (मध्य प्रदेश) के सरकारी अस्पताल में दाएं पैर में घाव के कारण भर्ती एक मरीज तीन दिन तक बिस्तर पर बेसुध पड़ा रहा, लेकिन कोई डाक्टर उसे देखने नहीं पहुंचा। सही समय पर इलाज न मिलने से घाव का इंफैक्शन फैल गया और उसकी मौत हो गई। मौत के बाद जब उसके शरीर पर चींटियां रेंगने लगीं, तब जाकर डाक्टरों को उसकी मौत का पता चला।
* 30 सितम्बर को ही ‘फिरोजाबाद’ (उत्तर प्रदेश) में सरकारी अस्पताल के ट्रामा सैंटर में पेट दर्द की शिकायत के बाद भर्ती कराए गए 28 वर्षीय युवक ‘मोनू’ की मौत हो गई। उसके परिजनों ने आरोप लगाया कि एक घंटे तक किसी डाक्टर ने उसे देखा तक नहीं।
करोड़ों रुपयों की लागत से निर्मित सरकारी अस्पतालों में प्रशिक्षित चिकित्सा स्टाफ की कमी और लापरवाही निश्चय ही एक ज्वलंत समस्या है जिसका परिणाम इस तरह की दुखद घटनाओं में निकल रहा है। इस समस्या का समाधान यथाशीघ्र ढूंढा जाना चाहिए, नहीं तो अस्पतालों में इसी प्रकार असुखद घटनाएं होती ही रहेंगी।—विजय कुमार

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