जेन-जी की भाषा से परे, उनके अनुरूप ढलना

Edited By Updated: 24 Aug, 2026 05:43 AM

adapting to gen z beyond its language

हाल ही में एक यात्रा के दौरान, मैंने अपने 8 वर्षीय बेटे पर गुस्सा किया। कुछ मिनट बाद उसने मेरे पति और मुझसे जो कहा, उससे हम हैरान रह गए। और तब से यह बात मुझे बार-बार याद आती रहती है। मेरी अभी-अभी एक खाने की दुकान पर एक कर्मचारी से बहस हुई थी। हम कार...

हाल ही में एक यात्रा के दौरान, मैंने अपने 8 वर्षीय बेटे पर गुस्सा किया। कुछ मिनट बाद उसने मेरे पति और मुझसे जो कहा, उससे हम हैरान रह गए। और तब से यह बात मुझे बार-बार याद आती रहती है। मेरी अभी-अभी एक खाने की दुकान पर एक कर्मचारी से बहस हुई थी। हम कार में वापस बैठ रहे थे लेकिन मेरा बेटा अंदर आने में थोड़ा धीमा था। वह मुझसे एक सवाल पूछने ही वाला था कि मैंने झल्लाकर कहा, ‘‘तुम मेरी बात कभी क्यों नहीं सुनते?’’ मेरे पति ने बीच में दखल देते हुए कहा, ‘‘बेटा, अम्मा की बात सुनो।’’

गाड़ी में सफर शुरू करने के लगभग 5 मिनट बाद, मेरे बेटे ने आंसू रोकते हुए, धीरे से पूछा, ‘‘आप और अम्मा ने कहा कि मैंने आपकी बात नहीं सुनी। मैंने क्या नहीं सुना?’’ हम दोनों चौंक गए। सच तो यह था कि उसने कुछ भी गलत नहीं किया था। यह तो बस कर्मचारी से हुई बातचीत के कारण मेरी अपनी ही भड़ास थी। हाल ही में, जब भी मैं युवाओं को उन फैसलों पर सवाल उठाते देखती हूं, जिन्हें वे अन्यायपूर्ण मानते हैं, तो यह सवाल मेरे मन में बार-बार आता है। इससे मुझे आश्चर्य होता है कि क्या हम अगली पीढ़ी के सत्ता के प्रति दृष्टिकोण में एक गहरा बदलाव देख रहे हैं? यहां असली बदलाव भाषायी नहीं, बल्कि मूल्यों से जुड़ा है। पिछली पीढ़ियों की तुलना में जेन-काी को सूचना तक कहीं अधिक पहुंच प्राप्त हुई है। पिछली पीढिय़ों की तुलना में इनमें से कई बच्चों का पालन-पोषण ऐसे माता-पिता ने किया है जो जीवनयापन के संघर्ष में कम उलझे रहे और आत्म-अभिव्यक्ति और आत्मविश्वास को प्रोत्साहित करने में सक्षम रहे। जिस भाषा में वे पले-बढ़े हैं, वह अधिकारों, गरिमा, प्रमाणिकता, मानसिक स्वास्थ्य, समावेश और जवाबदेही की भाषा है।

वे घर में होने वाले आघातों के पैटर्न को पहचानते हैं। वे विषाक्त कार्यस्थलों और अनुचित व्यवहार करने वाले बॉस के खिलाफ आवाज उठाएंगे। जवाबदेही और पारदर्शिता के आदर्श, जिन पर कभी लोक प्रशासन की पाठ्यपुस्तकों में महत्वाकांक्षी शब्दों में चर्चा की जाती थी, अब नागरिकों की अपने नागरिक संस्थानों से रोजमर्रा की अपेक्षाएं बन गई हैं। इसका हमारे सार्वजनिक सेवा वितरण तंत्र पर प्रभाव पड़ता है।

यदि संस्थानों को अगली पीढ़ी के मूल्यों को प्रतिबिंबित करना है, तो इसकी शुरुआत नागरिकों के रोजमर्रा के अनुभवों से होनी चाहिए। जन्म प्रमाण पत्र मात्र 25 रुपए में जारी किया जाना चाहिए। हर बच्चे को शाम को खेलने के लिए पास के नगरपालिका पार्क तक पहुंच मिलनी चाहिए। घर का मालिक बनने के लिए भवन निर्माण की अनुमति, बिजली या पानी के कनैक्शन प्राप्त करने हेतु बिचौलियों के जाल में उलझने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। अपार्टमैंट खरीदने पर यह आश्वासन मिलना चाहिए कि इसका निर्माण नियमों के अनुसार किया गया है। पुलिस स्टेशन या सरकारी कार्यालय जाने पर डर या किसी ऐसे व्यक्ति को जानने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए, जो किसी और को जानता हो। सरकारी अस्पताल जाने पर मरीजों को इस बात की चिंता नहीं होनी चाहिए कि डॉक्टर आएगा या नहीं। 

संस्थागत सुधारों को और अधिक व्यापक बनाने के लिए कई प्रस्ताव हैं। लेकिन हम एक सरल और शायद अधिक परिवर्तनकारी उपाय से शुरुआत कर सकते हैं-सार्वजनिक सेवा वितरण के केंद्र में नागरिकों को रखना। व्यवस्थाओं को ठीक करने के अलावा, हमें मानसिकता में बदलाव की आवश्यकता है, ताकि एक आम नागरिक वह हासिल कर सके, जो पहले से ही उसका है, किसी एहसान के रूप में नहीं, बल्कि अधिकार के रूप में।

मेरे बेटे का सवाल अब भी मेरे मन में गूंज रहा है। मेरे लिए, यह एक ऐसा सवाल था, जिसने अधिकार और निष्पक्षता के बीच के अंतर को उजागर किया। हम देख रहे हैं कि नागरिकों का सत्ता के साथ संबंध स्थापित करने के तरीके में एक पीढ़ीगत बदलाव आ रहा है। जेन-जी के साथ असली चुनौती उनकी भाषा सीखना नहीं, बल्कि उनके मूल्यों के अनुरूप ढलना है। जवाबदेही और पारदर्शिता अब आकांक्षाएं नहीं, बल्कि अपेक्षाएं बन गई हैं। सार्वजनिक सेवा को अब ऐसे नागरिकों के लिए तैयार किया जाना चाहिए जो अस्पष्टता, देरी, मनमानी या भ्रष्टाचार को अपरिहार्य नहीं मानेंगे।-सिंधु शर्मा

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