राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित थे अशोक सिंघल

Edited By Updated: 28 Sep, 2026 03:03 AM

ashok singhal was dedicated to nation building

एक बहुत सुंदर सुभाषित है, ‘वृक्ष कबहुं नङ्क्षह फल भखै, नदी न संचै नीर। परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर।’ इसका मतलब है कि पेड़ कभी अपने फल स्वयं नहीं खाता, नदी अपना जल अपने पास नहीं रखती। इसी तरह, संत स्वभाव के लोग भी स्वयं को प्राथमिकता न देते हुए,...

एक बहुत सुंदर सुभाषित है, ‘वृक्ष कबहुं नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर। परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर।’ इसका मतलब है कि पेड़ कभी अपने फल स्वयं नहीं खाता, नदी अपना जल अपने पास नहीं रखती। इसी तरह, संत स्वभाव के लोग भी स्वयं को प्राथमिकता न देते हुए, सदैव दूसरों की सेवा के लिए तत्पर रहते हैं, अपना जीवन लोक कल्याण के लिए समर्पित कर देते हैं। सदियों से हमारे ऋषियों ने हमें यही सिखाया है कि मानवता के कल्याण के लिए समर्पित जीवन का महत्व व्यक्तिगत उपलब्धियों से कहीं अधिक होता है। श्रद्धेय अशोक सिंघल जी का जीवन इस भावना का पुण्य उदाहरण है।

27 सितम्बर से हम स्वर्गीय अशोक सिंघल जी का जन्म-शताब्दी वर्ष मनाने जा रहे हैं। यह एक महान विभूति के सम्मान का सुअवसर है। उन्होंने आध्यात्मिक साधना, सांस्कृतिक जागरण और दशकों तक समॢपत भाव से समाज एवं संगठन के कार्यों को आगे बढ़ाया।
यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि मुझे स्वर्गीय अशोक जी के साथ लंबे समय तक कार्य करने, उनसे सीखने, उनसे संवाद करने और उनका स्नेह प्राप्त करने का अवसर मिला। मुझे 1981 का एक प्रसंग याद आता है। उस समय मैं एक युवा कार्यकत्र्ता के तौर पर संगठन की ओर से मिली जिम्मेदारियां निभा रहा था। तब मुझे अशोक जी का हाथ से लिखा एक पत्र मिला, जिसमें उन्होंने आने वाले एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम के बारे में जानकारी दी थी और मुझे कुछ जिम्मेदारियां सौंपी थीं। यह मेरे लिए बहुत विशेष और यादगार क्षण बन गया था।

मैंने उन्हें कई दशकों तक दिन-रात काम करते देखा। वह देश के दूर-दराज के क्षेत्रों की लंबी और कई बार कठिन यात्राएं किया करते थे। वह लगातार इस पर चिंतन करते थे कि समाज के वंचित और अंतिम पंक्ति में खड़े लोगों के लिए और क्या किया जा सकता है। जब भी देश में कहीं प्राकृतिक आपदा आती, तो अशोक सिंघल जी सबसे पहले वहां पहुंचने वालों में होते या फिर प्रभावित लोगों की सहायता के लिए कार्यकत्र्ताओं को मार्गदर्शन देते। वर्ष 2001 में कच्छ में आए भूकंप के बाद उनके साथ का मेरा अनुभव अविस्मरणीय बन गया।आदरणीय अशोक जी अत्यंत प्रतिष्ठित और संपन्न परिवार से थे। उनके पिता महावीर जी की एक प्रशासक के रूप में पहचान थी। उनके एक भाई बी.पी. सिंघल जी पुलिस अधिकारी बने और बाद में संसद सदस्य भी रहे। दूसरे भाई वी.पी. सिंघल जी त्रिपुरा के तब मुख्य सचिव बने, जब यह नया राज्य बना था। परिवार के अन्य सदस्यों ने भी कॉमर्स और कृषि के क्षेत्र में सफलता हासिल की। लेकिन शुरू से ही अशोक जी का झुकाव बिल्कुल अलग दिशा में था। बहुत कम उम्र में ही उनके व्यवहार में दूसरों के प्रति करुणा और सेवा की अद्भुत भावना दिखने लगी थी। वह चाहते थे कि भारत का पुनरुत्थान हो और मां भारती की संतान गौरवशाली उपलब्धियां हासिल करे। 

प्रयागराज में पले-बढ़े अशोक जी कई घंटे संगम के तट पर बैठा करते थे। नदी के प्रति उनका स्वाभाविक आकर्षण था। वहां आने वाले साधु-संत और श्रद्धालुओं से भी उनकी बहुत आत्मीयता थी। इससे भारत के सांस्कृतिक लोकाचार की उनकी समझ और समृद्ध हुई। समाज के लिए कुछ करने का उनका संकल्प भी और दृढ़ हुआ। दूसरों के लिए जीने की यही ललक उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में ले आई। अशोक सिंघल जी ने अपने निरंतर प्रयास और अथक परिश्रम से अनेक संस्थाओं और आंदोलनों को मजबूत किया। अपनी ओजस्वी वाणी और अभिव्यक्ति की अद्भुत शैली से वह पूरी सभा को मंत्रमुग्ध कर देते थे। जो भी उनके संपर्क में आता, वह उनकी सादगी से प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। देशभर के साधु-संतों के बीच भी उनका काफी सम्मान था। संतगण उनके परामर्श को महत्व देते थे और उनकी बातों को पूरे आदरभाव से सुनते थे। मेरी स्मृति में ऐसी 2 घटनाएं उभर रही हैं, जिनसे अशोक सिंघल जी के विराट व्यक्तित्व को समझा जा सकता है। पहली घटना 1993 की है। विश्व ङ्क्षहदू परिषद ने स्वामी विवेकानंद जी के शिकागो संबोधन के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में अमरीका में एक सम्मेलन आयोजित किया था। विदेश में ऐसे भव्य सम्मेलन का विजन, उसकी प्लानिंग और विभिन्न समूहों को एक मंच पर लाने का भगीरथ प्रयास अशोक जी के अद्वितीय संगठनात्मक कौशल का परिचायक था।

दूसरी घटना वर्ष 2000 की है, जब त्रिनिदाद और टोबैगो के पोर्ट ऑफ स्पेन में विश्व हिंदू सम्मेलन का आयोजन हुआ था। उस समय मैं भी वहीं था। अशोक सिंघल जी की उपस्थिति ने अन्य प्रतिनिधियों में उत्साह भर दिया था। मेरे संबोधन के बाद उन्होंने जिस तरह मेरी सराहना की, वह मेरे लिए बहुत भावुक कर देने वाला अनुभव था। राम जन्मभूमि आंदोलन में अशोक सिंघल जी की ऐतिहासिक भूमिका का स्मरण किए बिना उनका कोई भी उल्लेख अधूरा है। वर्ष 1991 की बोट क्लब रैली में दिए गए उनके ओजस्वी संबोधन को कौन भूल सकता है? या आंदोलन के चरम पर लहूलुहान और घायल अवस्था में अशोक जी की वह ऐतिहासिक तस्वीर भला किसकी स्मृति से मिट सकती है? आज अयोध्या में भव्य राम मंदिर है, तो इसके पीछे अशोक जी जैसी विभूतियों का नि:स्वार्थ समर्पण है, जिन्होंने इसे संभव बनाने के प्रयास में स्वयं को पूरी तरह खपा दिया। 

स्वर्गीय अशोक सिंघल जी स्पष्ट रूप से मानते थे कि समाज में समरसता के साथ ही भाईचारे का संदेश मजबूत होना चाहिए। उन्होंने सामाजिक एकता और समानता के लिए निरंतर कार्य किया। उनका साफ मत था कि प्रत्येक व्यक्ति समान गरिमा व सम्मान का अधिकारी है। यही वजह थी कि उन्होंने अयोध्या में राम मंदिर की पहली ईंट रखने को लेकर अपने विचार को स्पष्ट रूप से रखा। उन्होंने ही कहा था कि यह पुनीत कार्य बिहार के वी.एच.पी. कार्यकत्र्ता और वंचित वर्ग से आने वाले कामेश्वर चौपाल जी के हाथों से हो। काशी में एक धर्म संसद में उन्होंने डोम राजा को सम्मानित करने का फैसला किया और कई सामुदायिक अभियानों में उनके साथ मिलकर काम किया। राष्ट्र-निर्माण के साथ ही अशोक सिंघल जी के दो ऐसे प्रिय क्षेत्र थे, जो उनके हृदय के अत्यंत निकट थे। शिक्षा (विशेषकर वैदिक शिक्षा) और संगीत। मुझे इस बात पर अत्यंत गर्व की अनुभूति होती है कि जहां का मैं प्रतिनिधित्व करता हूं, उस शाश्वत काशी ने अशोक सिंघल जी के जीवन में एक अहम भूमिका निभाई। उन्होंने बी.एच.यू. से शिक्षा प्राप्त की थी और वह एक मेधावी छात्र के रूप में जाने जाते थे। वह युवा कार्यकत्र्ताओं को सदैव पुस्तकें पढऩे के लिए प्रेरित करते रहते थे। 

आदरणीय अशोक जी को निकट से जानने वालों को पता है कि वह कितना सुंदर गाते थे। मुझे नागपुर की उन बैठकों की याद आती है, जिनमें वह ‘एकल गीत’ गाया करते थे। उनका गायन सभी को मंत्रमुग्ध कर देता था और पूरी बैठक में नई ऊर्जा भर जाती थी। वर्ष 2015 में उनके 90वें जन्मदिवस समारोह का एक वीडियो खूब वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने ‘हे मातृभूमि मेरी, हे पितृभूमि मेरी’ गाकर सभी को चौंका दिया था। स्वर्गीय अशोक सिंघल जी ने अपने जीवन में हर क्षण इस महान राष्ट्र के उत्कर्ष का ही स्वप्न देखा था। उनकी जन्मशती के इस पावन अवसर पर हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अधिक से अधिक युवा उनके विराट व्यक्तित्व और महानता से परिचित हों। आइए, हम अपने राष्ट्र और देशवासियों के लिए अशोक सिंघल जी के सपनों को साकार करने के संकल्प को एक बार फिर दोहराएं।-नरेन्द्र मोदी(प्रधानमंत्री, भारत )

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