भागवत ने अपने संबोधन से विरोधियों को नि:शब्द किया

Edited By Updated: 01 Sep, 2026 03:25 AM

bhagwat silenced his opponents with his address

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) के सरसंचालक डॉक्टर मोहन भागवत के न्यूयॉर्क के मैनहट्टन स्थित मैडिसन स्क्वायर गार्डन में कार्यक्रम की सफलता से अमरीका से लेकर भारत तक के विरोधियों को बिना कोई प्रतिक्रिया दिए सटीक उत्तर मिल गया है। भारत में नेताओं...

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) के सरसंचालक डॉक्टर मोहन भागवत के न्यूयॉर्क के मैनहट्टन स्थित मैडिसन स्क्वायर गार्डन में कार्यक्रम की सफलता से अमरीका से लेकर भारत तक के विरोधियों को बिना कोई प्रतिक्रिया दिए सटीक उत्तर मिल गया है। भारत में नेताओं ने कार्यक्रम से पूर्व अपने बयानों से इसके विरोध में माहौल बनाने की कोशिश की। दूसरी ओर अमरीका में कुछ संगठन, जैसे हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स, इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काऊंसिल, इंटरफेथ सैंटर ऑफ न्यूयॉर्क आदि ने जितना संभव हुआ कार्यक्रम को ही रोकने की कोशिश की। न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने कहा कि एक ऐसे आंदोलन का उभार देखना बेहद परेशान करने वाला है, जो एक बहिष्कारवादी सोच पर आधारित है। 

यू.एस. कमीशन ऑन इंटरनैशनल रिलीजियस फ्रीडम ने अमरीकी सरकार से संघ के सदस्यों पर प्रतिबंध लगाने और भारत में कथित धार्मिक स्वतंत्रता उल्लंघनों को लेकर मोहन भागवत का वीजा रद्द करने तक पर विचार करने का आग्रह कर दिया। वॉशिंगटन स्थित इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काऊंसिल ने ऐसी वैन निकाली, जिसमें वीडियो स्क्रीन लगी थी और जो मैनहट्टन की सड़कों पर घूमकर कार्यक्रम के विरुद्ध प्रचार कर रही थी। हालांकि इसका परिणाम हुआ कि अमरीकी मीडिया में इस कार्यक्रम को बिना कोशिश के लगातार कवरेज प्राप्त हो गई। ऐसा नहीं था कि सब कुछ एकपक्षीय था। उदाहरण के लिए अमरीकी गायिका मैरी मिलबेन ने ‘एक्स’ पर पोस्ट कर ममदानी और विरोधियों की आलोचना की। ऐसी प्रतिक्रिया देने वाले और भी कई अमरीकी प्रसिद्ध व्यक्तित्व थे।

विरोध अभियानों के विपरीत आयोजक की एक प्रवक्ता ने मीडिया के प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहा कि इसका मतलब है कि हमारे बीच मतभेद, यहां तक कि गहरे मतभेद भी हो सकते हैं लेकिन फिर भी हम संवाद, सम्मान और अपनी सांझी मानवता को चुन सकते हैं। यह एक बयान ही दोनों पक्षों के चरित्र में गुणात्मक अंतर को दर्शाने वाला था।अब जरा कार्यक्रम की ओर आएं। इसका विषय  था ‘यूनिवर्सल वननैस सैलिब्रेशन’ यानी ‘एक विश्व-एक मानवता उत्सव’। आप सोचिए, आज संपूर्ण विश्व की विविधताओं के बीच एकता के उत्सव से बड़ा विश्व कल्याण की दृष्टि से प्रासंगिक कार्यक्रम क्या हो सकता था? मैडिसन स्क्वायर गार्डन के इंफोसिस थिएटर की क्षमता 5,570 है। लाइव प्रसारण में सभागार खचाखच भरा था। काफी संख्या में लोग बाहर भी खड़े थे। ध्यान रखिए, कार्यक्रम में भारतीय समुदाय के साथ-साथ 30 देशों के, 16 विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधि 180 से अधिक आध्यात्मिक-धार्मिक क्षेत्र के प्रमुख लोग भी थे। 

वास्तव में भागवत ने अपने संबोधन में उसी भाव को सामने रखा, जो कार्यक्रम का उद्देश्य बताया गया। उन्होंने कहा कि राष्ट्र केवल भौगोलिक इकाइयां नहीं, एक दायित्व का निर्वाह करते हैं। भारत का दायित्व है कि वह विविधता में एकता के इस सत्य का साक्षात्कार करे और समय-समय पर संसार को भी इस सत्य का साक्षात्कार कराए। वननैस क्या है, इसका उत्तर देते हुए भागवत ने कहा कि भौतिक सुख स्थायी सुख या समाधान नहीं हैं। सच है कि केवल भौतिक सुख और उपलब्धियों के कारण ही व्यक्ति, समाज, राष्ट्रों के बीच समस्याएं बढ़ी हैं। इसे अधिक स्पष्ट करने के लिए उन्होंने रामकृष्ण मिशन के बोधवाक्य ‘आत्मनो: मोक्षार्थ जगत् हितायच’ की बात की। यानी अपनी आत्मा का मोक्ष विश्व कल्याण में ही निहित है। मैं आप में हूं, और आप मेरे में हैं, हम सब एक-दूसरे में समाए हैं, यही वननैस है। भारतीय होने के नाते हमें संपूर्ण विश्व के कल्याणार्थ इस विचार को अपने आचरण से फैलाना है।

आप सोचिए, इस तरह के संबोधन में किस पहलू का विरोध हो सकता है? उन्होंने यह भी कहा कि विश्व में दो प्रकार के लोग हैं। एक कहते हैं, ‘जियो और जीने दो’। दूसरे कहते हैं कि ‘मात्र उन्हीं को जीने का अधिकार है, जो हमारी बात मानते हैं। हम उन्हीं की रक्षा करेंगे, जो हमारे मत को मानेगा’। यह दूसरे प्रकार के लोग असुर श्रेणी में आते हैं और पहले प्रकार के लोग देव कहलाते हैं। क्या यह सच नहीं कि अमरीका सहित अनेक देशों ने अपना चरित्र यही दिखाया है और इसी कारण विश्व तनाव, संघर्ष सहित अनेक जटिलताओं और समस्याओं में उलझा हुआ है? यही नहीं इसी सोच से निर्मित संगठन और व्यक्ति भी हमारे सामने हैं। 

सभी धर्मों के प्रति सम्मान के साथ कोई यह सोचे या चाहे कि दूसरे पंथ के लोग उसके देश में न हों तो वह हिंदू नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि जो लोग भारत से बाहर दूसरे देशों में बसे हैं, वे देश उनकी कर्मभूमि हैं। अगर हम अमरीका में हैं तो अमरीका का ही हिस्सा हुए। हमें अपनी कर्मभूमि के प्रति पूरी तरह प्रामाणिक रहना चाहिए। किंतु क्योंकि आप भारतवंशी हैं, वह आपके पुरखों की जन्मभूमि है, इसलिए भारत के लिए कुछ करना संभव है तो अवश्य करें। सच कहें तो संघ, हिंदुत्व, हिंदू और भारत के वास्तविक व्यापक दृष्टिकोण को रखकर भागवत ने विरोधियों को नि:शब्द कर दिया। किंतु जिन्हें कुछ मानना ही नहीं है और जिनके अंदर रोग के स्तर पर संघ का विरोध है, वे न पहले माने हैं, न आगे मानेंगे। वे जो कुछ बोलते हैं, प्रचारित करते हैं, लिखते हैं, वह सब झूठ पर आधारित होता है। साफ है कि उनके भाषण के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, हिंदुत्व, भारत आदि में रुचि रखने वाले हर समूह के लोगों की जिज्ञासाओं का समाधान हुआ होगा। भागवत का उद्बोधन भारतीय विचार और भारत के पक्ष को सही संदर्भ में रखने वाला माना जाएगा।

आप देखेंगे कि इतने विरोध और निंदा के बावजूद सामान्यत: संघ के लोग इनका उत्तर देने या खंडन करने का व्यवहार नहीं अपनाते। भारत में संघ का अभी तक यही चरित्र रहा है और विश्व के कार्यक्रमों के संदर्भ में भी किसी विरोध के प्रत्युत्तर की कोई कोशिश तक नहीं हुई। यह ऐसा व्यवहार है जिससे देश और विदेश के विरोधियों को सीखना चाहिए। इसी से संघ का समर्थन लगातार बढ़ता है। अमरीका में उसी तरह का कार्यक्रम स्वयं उन संगठनों के बस की बात नहीं, जो विरोध का झंडा उठाए हुए थे।- अवधेश कुमार
 

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