हर हाल में जाति जनगणना करें लेकिन इससे कुछ तय नहीं होता

Edited By Updated: 22 Aug, 2026 05:27 AM

by all means conduct a caste census but it doesn t decide anything

योगेंद्र यादव ने यह तर्क दिया था ‘जाति जनगणना समाप्त हो चुकी है। किसी औपचारिक घोषणा या अंतिम संस्कार की  उम्मीद न करें’,  (इंडियन एक्सप्रैस, 12 अगस्त) कि जाति जनगणना की कवायद को एक तकनीकी विकल्प द्वारा चुपचाप खत्म कर दिया गया है। जनगणना जिसमें...

योगेंद्र यादव ने यह तर्क दिया था ‘जाति जनगणना समाप्त हो चुकी है। किसी औपचारिक घोषणा या अंतिम संस्कार की  उम्मीद न करें’,  (इंडियन एक्सप्रैस, 12 अगस्त) कि जाति जनगणना की कवायद को एक तकनीकी विकल्प द्वारा चुपचाप खत्म कर दिया गया है। जनगणना जिसमें प्रत्येक भारतीय से अपनी जाति का नाम बताने को कहा गया, जिसके परिणामस्वरूप 2011 में 47 लाख जातियों के नाम सामने आए और इसे आसानी से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। राजनीति के बारे में उनका विश्लेषण काफी हद तक ठोस प्रतीत होता है। लेकिन इसके स्थान पर ‘ड्रॉप-डाऊन मेनू’ का प्रस्ताव रखते हुए, वे यह भी जोड़ते हैं कि इससे गणनाकार के लिए कोई कठिनाई पैदा नहीं होती, जब तक कि जाति के नामों को लेकर कोई भ्रम न हो।

यही असल समस्या है, और यह नामों के बारे में नहीं है। यह प्रोत्साहनों  के बारे में है। बुनियादी  आंकड़े इसका स्पष्टीकरण देते हैं। 1999-2000 में 35.7 प्रतिशत भारतीयों ने कहा कि वे ओ.बी.सी. हैं। पांच साल बाद 40.9 प्रतिशत ने ऐसा कहा। भारत की आबादी 1.8 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़ी।  इस प्रकार ओ.बी.सी. आबादी पांच वर्षों में 35.7 करोड़ से बढ़कर 44.7 करोड़ हो गई,  यानी प्रति वर्ष 4.6  प्रतिशत की वृद्धि दर। सर्वेक्षण के साक्ष्यों के अनुसार, भारत के ओ.बी.सी. ने प्रजनन के मामले में हटरिट्स को भी पीछे छोड़ दिया। और यह कोई पांच साल का अपवाद नहीं था। 1999 और 2025 के बीच ओ.बी.सी. की आबादी लगभग दोगुनी हो गई, यानी 35.7 करोड़ से 67.4 करोड़। चूंकि भारत ने उन 26 वर्षों में कुल 45.6 करोड़ लोग जोड़े, इसलिए जो समूह 1999 में देश का 36 प्रतिशत था, वह तब से बढ़ी कुल आबादी के 70 प्रतिशत हिस्से के लिए जिम्मेदार रहा। इस बीच, सामान्य वर्ग की आबादी घट गई (35.9 करोड़ से 35 करोड़)।

प्रति वर्ष 4.6 प्रतिशत की दर से बढऩे वाली आबादी अत्यधिक युवा होनी चाहिए, बच्चों और वयस्कों के बीच का अंतर बाकी आबादी की तुलना में बहुत बड़ा होना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं है। 2004 में, 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों में ओ.बी.सी. का हिस्सा वयस्कों में ओ.बी.सी. के हिस्से से केवल 2.0 प्रतिशत अंक अधिक था और 2025 तक, यह अंतर घटकर 1.2 रह गया, भले ही ओ.बी.सी. की कुल हिस्सेदारी में और पांच अंकों की वृद्धि हुई। यदि यह वृद्धि वास्तविक होती, तो यह अंतर बिल्कुल ही अलग स्तर का होता। हटरिट प्रजनन दर पर, कुल जन्मों में ओ.बी.सी. का हिस्सा तीन-चौथाई होता और बच्चों के बीच उनका अनुपात 30 प्रतिशत अंक से अधिक होता। छह की कुल  प्रजनन दर पर भी 20 अंकों के अंतर की आवश्यकता होती। इसके विपरीत, मुस्लिम, जिनकी प्रजनन दर वास्तव में अधिक है, 2004 में बच्चों के बीच 3.2 अंक अधिक थे, जो 2025 तक बढ़कर 4.3 हो गए। प्रजनन दर का वास्तविक अंतर ऐसा दिखता है। ओ.बी.सी. के आंकड़े ऐसा कुछ भी नहीं दर्शाते।

पाठक मुझे क्षमा करें या न करें लेकिन मैं निवेश को लेकर भी यही तर्क देता रहा हूं। भारतीय प्रमोटरों ने पिछले साल रिकॉर्ड 33.3 अरब डॉलर विदेश भेजे, जबकि घरेलू निजी निवेश स्थिर रहा। शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश गिरकर जी.डी.पी. के 0.18 प्रतिशत पर आ गया है। टिप्पणीकार इसे उद्यमी उत्साह की विफलता कहते हैं और मंत्री उद्योगपतियों से देश में ही निवेश करने की अपील करते हैं। लेकिन कोई भी अनुचित व्यवहार नहीं कर रहा है। यहां या विदेश में फैक्टरी लगाने का विकल्प चुनने वाली फर्म को एक ऐसे द्विपक्षीय निवेश समझौते का सामना करना पड़ता है जिसमें मध्यस्थता से पहले भारतीय अदालतों में 60 महीने का समय लगता है, 765 क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर्स का सामना करना पड़ता है जहां 2014 में केवल 14 थे और  उस बाजार (अमरीका) के साथ कोई व्यापार समझौता नहीं है जो 42 अरब डॉलर के भारतीय निर्यात को खपाता है। तो क्या सही गिनती के लिए भारत में जाति जनगणना होनी चाहिए? हां। जाति की गिनती करें। भारत जाति के आधार पर ही शिक्षा और रोजगार आवंटित करता है। लेकिन यह विश्वास छोड़ दें कि गिनती से कुछ भी तय होता है।-सुरजीत एस. भल्ला         

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