विलासिता नहीं, उद्देश्य चाहिए घर के बुजुर्गों को

Edited By Updated: 24 Aug, 2026 04:14 AM

elders need purpose not luxury

आधुनिक समाज में सुख की परिभाषा बदल गई है। हम सोचते हैं कि आराम, नौकर-चाकर, ऑनलाइन डिलीवरी और सुविधाओं का ढेर ही जीवन को खुशहाल बना देता है। लेकिन हाल ही में सोशल मीडिया में एक सच्ची घटना शेयर की गई, जिसने इस धारणा को पूरी तरह झूठा साबित कर दिया। यह...

आधुनिक समाज में सुख की परिभाषा बदल गई है। हम सोचते हैं कि आराम, नौकर-चाकर, ऑनलाइन डिलीवरी और सुविधाओं का ढेर ही जीवन को खुशहाल बना देता है। लेकिन हाल ही में सोशल मीडिया में एक सच्ची घटना शेयर की गई, जिसने इस धारणा को पूरी तरह झूठा साबित कर दिया। यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि आज के पूरे समाज का आईना है, जहां हम बुजुर्गों को आराम देकर उनसे उनके जीवन का उद्देश्य छीन लेते हैं और फिर हैरान होते हैं कि घर में शांति क्यों नहीं बची। सोशल मीडिया की पोस्ट के अनुसार कहानी पुणे की है। एक बेटा और बहू लंबे समय तक बड़ी मल्टीनैशनल कंपनियों में काम करते रहे। घर का लगभग सारा काम उन्होंने आऊटसोर्स कर रखा था। कुछ समय बाद वे दिल्ली लौटे, अपना व्यवसाय शुरू किया और कई वर्षों के अंतराल के बाद पति के 80 वर्षीय माता-पिता उनके साथ रहने लगे।

घर आकर उन्होंने देखा कि बुजुर्ग दंपति का पूरा जीवन छोटी-छोटी जिम्मेदारियों के इर्द-गिर्द घूमता था। सुबह चाय बनाना, अखबार पढऩा, बाजार जाना, सब्जियों पर मोल-भाव करना, मसालों की चर्चा, रोटियां बनाना, कपड़े व्यवस्थित करना आदि, ये सब उनकी दिनचर्या का हिस्सा थे। यह देख बेटा-बहू भावुक हो गए। उन्होंने सोचा, माता-पिता ने जीवनभर हमारे लिए संघर्ष किया। हमें हर सुख-सुविधा दी है। अब हमारी बारी है उन्हें आराम देने की। उन्होंने पूरी व्यवस्था बदल दी। एक फुल-टाइम रसोइया रख लिया। ई-कॉमर्स कंपनियों से किराना और अन्य जरूरी सामान आने लगा। मां-बाप के लिए अलग-अलग अटैंडैंट और कार व ड्राइवर का इंतजाम किया। अटैंडैंट उनके पैर दबाता, जिस्म पर तेल लगाता, चाय-पानी देता, सैर के लिए ले जाता। बच्चों को लगा कि अब माता-पिता सचमुच सुख का जीवन जिएंगे। लेकिन कुछ ही महीनों में सब बिखर गया। मां ने चलना-फिरना और काम करना बंद कर दिया। दिन भर सोती रहतीं, सहायकों की हर बात की शिकायतें करतीं। फिर अवसाद आया और डिमेंशिया के लक्षण शुरू हो गए। पिता चिड़चिड़े और गुस्सैल हो गए। डिलीवरी वालों से झगड़ते, नौकरों को गालियां देते, रसोइए को डांटते, अटैंडैंट पर चीखते-चिल्लाते और दिनभर बेमकसद घूमते और गुस्से में घर लौटते। धीरे-धीरे घर का माहौल जहरीला हो गया। बेटा-बहू हैरान हुए कि उनकी इतनी कोशिशों के बावजूद मां-बाप का जीवन ऐसा खराब क्यों हो गया।

यहीं छिपा था जीवन का गहरा सबक। पहले पिता हर सुबह एक उद्देश्य के साथ उठते थे, पत्नी के लिए चाय बनाते, साथ में अखबार पढ़ते, थैला लेकर बाजार जाते, सब्जियों पर चर्चा करते, मोल-भाव करते। मां खाने की योजना बनातीं, मसाले जांचतीं, सबके कपड़े संभालतीं। ये सिर्फ साधारण घरेलू काम नहीं थे, ये वे अदृश्य भावनात्मक धागे थे, जो दो बुजुर्गों को मानसिक रूप से जीवित रखते थे और एक-दूसरे से जोड़ते थे। रसोई सिर्फ रसोई नहीं थी, वह संगति थी। बाजार सिर्फ खरीदारी की जगह नहीं था, वह उपयोगिता का भाव देता था। धनिया-मिर्च पर छोटी-छोटी बहसें सिर्फ बहसें नहीं थीं, वे संवाद थे। आधुनिक समाज में युवा बुढ़ापे के मायने गलत समझते हैं। वे सोचते हैं कि बुजुर्गों को सिर्फ आराम चाहिए। मनुष्य को सिर्फ आराम नहीं चाहिए। उसे चाहिए उपयोगी होने का भाव, मन को व्यस्त रखने वाला काम, शरीर के लिए गतिविधि और सबसे महत्वपूर्ण, दिल में यह एहसास कि ‘मैं अभी भी जरूरी हूं। मेरा अभी भी घर में कुछ योगदान है।’

किसी ने उस युवा दंपति को असामान्य सलाह दी, ‘‘अपने माता-पिता की कुछ सुविधाएं कम करो।’’ ये उनके प्रति क्रूरता या उपेक्षा नहीं होगी। इससे उनकी स्टाफ पर अत्यधिक निर्भरता नहीं रहेगी। फुल-टाइम अटैंडैंट हटाओ। कुछ पार्ट टाइम सहायता रखो लेकिन जिम्मेदारी वापस बुजुर्गों को ही दो। उनके अंदर अपने महत्व का भाव लौटाओ। बेटा मां से कहने लगा, ‘‘आप जैसी सब्जी कोई नहीं बना सकता। रोज कम से कम एक सब्जी जरूर बनाइए।’’ बहू ससुर से कहने लगी, ‘‘आप जो सब्जियां लाते हैं, वे हमेशा ताजी होती हैं।’’ धीरे-धीरे पुरानी लय लौटी। बातें शुरू हुईं। अगले दिन की योजनाएं बनने लगीं। छोटी-छोटी बहसें वापस आईं। चलना-फिरना शुरू हुआ। उद्देश्य लौटा और धीरे-धीरे... खुशी भी लौट आई।

यह कहानी आज के भारत के लिए चेतावनी है। हाल के महीनों में वृद्धाश्रमों से आने वाली खबरें दिल दहला देने वाली हैं। मऊ में एक पिता ने मजदूरी करके बेटे को सरकारी नौकरी दिलवाई लेकिन आराम की बारी आने पर बेटे ने उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ दिया। भोपाल के ‘अपना घर’ में 70 वर्षीय व्यवसायी की मौत हुई, चार बच्चों में से कोई अंतिम संस्कार के लिए नहीं आया। इंदौर में 85 वर्षीय सरिता नारायण ने साढ़े 4 साल तक बेटे का इंतजार किया। बेटा ‘दो दिन में लौटूंगा’ कहकर गया और फिर कभी नहीं आया। उनकी मृत्यु पर भी कोई नहीं पहुंचा। हरियाणा के सोनीपत में एक पिता की मृत्यु पर 3 बेटियों ने वीडियो कॉल पर अंतिम संस्कार देखा। भोपाल, महाराजगंज, पूर्णिया, हर जगह ऐसी कहानियां हैं, जहां भरा-पूरा परिवार होने के बावजूद बुजुर्ग वृद्धाश्रम में अंतिम दिन काट रहे हैं। 

ये सिर्फ उपेक्षा की घटनाएं नहीं, ये उस मानसिकता की देन हैं, जहां हम बुजुर्गों को ‘बोझ’ समझ लेते हैं। हम उनकी सक्रियता, उनकी छोटी-छोटी जिम्मेदारियों और उनके ‘जरूरी होने’ के भाव को छीन लेते हैं। फिर या तो घर में जहर घुल जाता है, या वे वृद्धाश्रम की चारदीवारी में दम तोड़ देते हैं। सुख विलासिता में नहीं, जीने के उद्देश्य में है। छोटी-छोटी जिम्मेदारियां ही व्यक्ति को अंदर से जीवित रखती हैं। बुजुर्गों को आराम देने का मतलब यह नहीं कि उन्हें निष्क्रिय बना दो। मतलब यह है कि उनके अनुभव, उनकी क्षमता और उनकी उपस्थिति को सम्मान दो। उन्हें घर का हिस्सा बनाओ, सिर्फ मेहमान नहीं। माता-पिता ने हमें बड़ा किया, संघर्ष किया, सपने देखे। अब हमारी जिम्मेदारी है कि उनकी अंतिम सांस तक उन्हें यह अहसास दिलाएं कि वे अभी भी जरूरी हैं। वे बोझ नहीं, बल्कि प्यार, सम्मान और उद्देश्य का सहारा हैं। बुजुर्गों को आराम दो लेकिन जिम्मेदारी लौटाओ। तभी आधुनिक समाज सचमुच सुखी और संतुलित बनेगा।-विनीत नारायण
 

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