देवीलाल के लिए सत्ता का अर्थ केवल मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं था

Edited By Updated: 25 Sep, 2026 04:34 AM

for devi lal power did not only mean the chief minister s chair

1987 में जब चौधरी देवीलाल दूसरी बार हरियाणा के मुख्यमंत्री बने तो मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालते ही उन्होंने अधिकारियों से बुढ़ापा पैंशन की फाइल मंगवाई। उस पर हस्ताक्षर करने के बाद अपने सहज अंदाज में कहा-‘ले, हो गई बुढ़ापा पैंशन।’ उनके लिए सत्ता का...

1987 में जब चौधरी देवीलाल दूसरी बार हरियाणा के मुख्यमंत्री बने तो मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालते ही उन्होंने अधिकारियों से बुढ़ापा पैंशन की फाइल मंगवाई। उस पर हस्ताक्षर करने के बाद अपने सहज अंदाज में कहा-‘ले, हो गई बुढ़ापा पैंशन।’ उनके लिए सत्ता का अर्थ केवल मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं, बल्कि उस कुर्सी के माध्यम से गरीब, बुजुर्ग, किसान, मजदूर और कमेरे वर्ग के जीवन में राहत पहुंचाना था। उस समय चौधरी बंसीलाल लोगों के बीच कहते थे कि देवीलाल बुढ़ापा पैंशन लागू नहीं कर पाएंगे। देवीलाल ने जवाब दिया था कि मुख्यमंत्री बनते ही सबसे पहले बुढ़ापा पैंशन की फाइल पर हस्ताक्षर करेंगे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपने कथन को अमल में बदल दिया। वर्ष 1987 में 100 रुपए मासिक की दर से वृद्धावस्था पैंशन शुरू कर दी गई। आज यही योजना वृद्धावस्था सम्मान भत्ते के रूप में हरियाणा की प्रमुख सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में शामिल है और इसकी राशि 3,200 रुपए प्रतिमाह तक पहुंच चुकी है।

चौधरी देवीलाल केवल राजनेता नहीं, बल्कि राजनीति और समाज सेवा की ऐसी संस्था थे, जिनका जीवन गरीब, किसान, मजदूर और कमेरे वर्ग के अधिकारों के संघर्ष में बीता। जाति, धर्म और संप्रदाय से ऊपर उठकर उन्होंने राजनीति को जनसेवा का माध्यम बनाया। 25 सितम्बर, 1914 को तत्कालीन हिसार जिले के (वर्तमान में सिरसा जिले के) तेजा खेड़ा गांव में जन्मे देवीलाल ने आजादी की लड़ाई से लेकर हरियाणा के निर्माण और आम आदमी के अधिकारों तक के लिए संघर्ष किया। मुख्यमंत्री और उपप्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनकी पहचान आम आदमी से जुड़ी रही। वह कठिन बात भी गांव की भाषा में कहते थे और यही उनकी जनसंचार शैली की सबसे बड़ी ताकत थी।

देवीलाल की राजनीति केवल बुढ़ापा पैंशन तक सीमित नहीं थी। ‘खुले जनता दरबार’ के माध्यम से शासन को गांव और आम आदमी के दरवाजे तक पहुंचाने का प्रयास किया गया। किसानों और गरीबों को राहत, सहकारी संस्थाओं के कर्ज से जुड़ी राहत, अनुसूचित जाति की चौपालों का निर्माण, बेरोजगार युवाओं के लिए सहायता, विद्याॢथयों के बस पास में राहत और साक्षात्कार के लिए जाने वाले युवाओं की बस यात्रा नि:शुल्क करने जैसे अनेक फैसले उनके जनकल्याणकारी दृष्टिकोण को दर्शाते हैं। जच्चा-बच्चा के लिए पोषण सहायता, कुछ करों से राहत, ट्रैक्टर और साइकिल का टोकन टैक्स समाप्त करना, रेडियो लाइसैंस फीस खत्म करना तथा गरीब परिवारों की बेटियों के विवाह में सहायता जैसी पहलें भी उनके शासन की पहचान बनीं।

चौधरी देवीलाल की सादगी और 36 बिरादरियों के नेता होने का प्रमाण मुझे स्वयं वर्ष 1989 में गांव खेड़ी मसानिया में देखने को मिला। उस समय उन्होंने गांव-गांव में मैचिंग ग्रांट योजना के तहत अनुसूचित जाति की चौपालों के निर्माण की घोषणा की थी। चौपाल निर्माण की जिम्मेदारी तत्कालीन उद्योग मंत्री डा. कृपाराम पूनिया को दी गई थी। खेड़ी मसानिया में श्री गुरु रविदास मंदिर के शिलान्यास और चौपाल के उद्घाटन का कार्यक्रम डा. पूनिया को करना था लेकिन किन्हीं कारणों से उन्हें कार्यक्रम रद्द करना पड़ा। उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा भी दिया, हालांकि देवीलाल ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया। अगले दिन डा. पूनिया ने मुझे चंडीगढ़ बुलाया और बाद में देवीलाल से मिलवाया। मुझे देखते ही उन्होंने सहज अंदाज में पूछा-‘हां भई छोरे, क्या चाहते हो तुम?’ मैंने कहा कि डा. पूनिया तो आएं ही, आप भी हमारी चौपाल के उद्घाटन समारोह में आएं। इससे गरीब और दलित समाज का सम्मान बढ़ेगा। उन्होंने तत्काल कहा-‘मैं गांव खेड़ी मसानिया आऊंगा, आप तैयारी करो।’

वह 31 मार्च, 1989  को डा. कृपाराम पूनिया के साथ खेड़ी मसानिया गांव में पहुंचे । उन्होंने चौपाल का उद्घाटन किया, श्री गुरु रविदास मंदिर का शिलान्यास किया और भारी जनसमूह को संबोधित किया। उन्होंने मैचिंग ग्रांट के साथ अतिरिक्त सहायता राशि की घोषणा की तथा किसानों, गरीबों, दलितों और ग्रामीण विकास के लिए सहयोग का आश्वासन दिया। उनके व मोहल्ला वासियों के प्रयासों से बनी चौपाल शानदार भवन का रूप ले चुकी है। देवीलाल ने राजनीति को समाज के कमजोर व्यक्ति को सम्मान देने का जरिया बनाया। 25 सितम्बर को जननायक चौधरी देवीलाल के जन्मदिवस पर उन्हें याद करना केवल श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उस जनसेवा की परंपरा को स्मरण करना भी है, जिसमें गरीब की चिंता, किसान का सम्मान, बुजुर्गों की सुरक्षा और गांव का विकास शासन की प्राथमिकता माने जाते थे।-सतीश मेहरा 

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