Edited By ,Updated: 04 Sep, 2026 05:42 AM

पहले,अंतर्राष्ट्रीय डिग्री हासिल करने का मतलब सिर्फ लाखों में फीस देना ही नहीं था, बल्कि महंगे वीजा, रहने का खर्च, हवाई किराया और अन्य खर्चे भी थे जो करोड़ों तक पहुंच सकते थे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में ब्रांच...
पहले,अंतर्राष्ट्रीय डिग्री हासिल करने का मतलब सिर्फ लाखों में फीस देना ही नहीं था, बल्कि महंगे वीजा, रहने का खर्च, हवाई किराया और अन्य खर्चे भी थे जो करोड़ों तक पहुंच सकते थे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में ब्रांच कैंपस स्थापित करने की अनुमति देकर घरेलू और विदेशी डिग्रियों के बीच एक तीसरा विकल्प तैयार किया।
ये दो विनियामक द्वारों के तहत संचालित होते हैं—वित्त मंत्रालय के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण गिफ्ट सिटी ढांचा और शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियम। दोनों ही दुनिया भर की मान्यता प्राप्त रैंकिंग एजैंसियों द्वारा विषय-वार वैश्विक रैंकिंग में शीर्ष 500 में स्थान पाने वाले संस्थानों तक ही प्रवेश को सीमित करते हैं। ऑनलाइन शिक्षा कंपनी एमेरिट्स द्वारा ‘द जेन जेड आऊटलुक रिपोर्ट 2026’ में पाया गया कि जहां 60 प्रतिशत प्री-कॉलेज छात्र विदेश में पढ़ाई करने में रुचि रखते हैं, वहीं स्नातकोत्तर (पी.जी.) कार्यक्रमों की तलाश करने वाले 69 प्रतिशत छात्र वीजा संबंधी अनिश्चितता और देरी से बचने के लिए भारत स्थित अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम को प्राथमिकता देंगे। फिर भी विदेशी विश्वविद्यालयों के सैटेलाइट कैंपस अभी शुरूआती दौर में हैं, जिससे माता-पिता और विशेषज्ञ ‘इंतजार करो और देखो’ की स्थिति में हैं।
लागत का लाभ : एमेरिट्स के सह-संस्थापक और सी.ई.ओ. अश्विन डामेरा ने कहा कि भारतीय शाखा परिसर का आकर्षण डिग्री की वैधता का त्याग किए बिना काफी कम लागत में निहित है। ये परिसर मूल संस्थानों के समान पाठ्यक्रम पढ़ाते हैं, जिनकी डिग्रियां आमतौर पर मूल विश्वविद्यालय द्वारा प्रदान की जाती हैं। छात्रों को विनिमय (एक्सचेंज) और विदेश में सेमैस्टर बिताने के विकल्प भी मिल सकते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ लिवरपूल के मुख्य परिसर में एक वर्षीय स्नातकोत्तर कार्यक्रम की लागत लगभग 38 लाख रुपए है, साथ ही रहने के खर्च के रूप में 19 लाख रुपए जुड़ते हैं —जो कुल मिलाकर 60 लाख रुपए बैठता है। इसका मुंबई परिसर 14-15 लाख रुपए लेता है, जिसमें स्थानीय रहने के खर्च भी शामिल हैं, जिससे कुल खर्च लगभग दो-तिहाई तक कम हो जाता है।
चार साल के स्नातक (बैचलर्स) कार्यक्रम के लिए, डामेरा ने इलिनोइस टैक का हवाला दिया, जहां कुल विदेशी लागत लगभग 2 करोड़ है। इसका मुंबई परिसर आवास सहित 40-50 लाख रुपए लेता है—जो विदेशी लागत का लगभग एक-चौथाई है—साथ ही उसी फीस संरचना के तहत विदेश में दो सेमैस्टर तक पढऩे की अनुमति भी देता है।
विश्वसनीयता पर सवाल : शिक्षा सलाहकार परिवारों से आग्रह करते हैं कि वे केवल विदेशी ब्रांड से आगे भी देखें। एक स्वतंत्र शिक्षा परामर्शदाता (आई.ई.सी.) बख्तावर कृष्णन ने कहा कि सैटेलाइट परिसरों को अमरीकी वीजा अस्वीकृति, कनाडा के अंतर्राष्ट्रीय प्रवेश में कटौती और बढ़ती ऑस्ट्रेलियाई वीजा फीस जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, लेकिन इन परिसरों को लेकर अन्य अनिश्चितताएं अभी भी बनी हुई हैं।
माता-पिता के कदम पीछे : विदेशी सैटेलाइट परिसर घरेलू विश्वविद्यालयों और महंगी विदेशी शिक्षा के बीच एक तीसरा मार्ग प्रदान करते हैं, लेकिन माता-पिता सतर्क बने हुए हैं। अपनी बेटी की शिक्षा की योजना बना रहे एक व्यापारी अमित गोयल ने कहा: मैं इसे केवल विदेशी डिग्री के लिए प्रीमियम का भुगतान करने के रूप में नहीं देखूंगा। विशेषज्ञ परिवारों को विनियामक ढांचे की पुष्टि करने और यह सुनिश्चित करने की सलाह देते हैं कि डिग्री मुख्य परिसर के समान हो। सैटेलाइट परिसर वैश्विक डिग्री की लागत कम करते हैं, लेकिन नियोक्ता की स्वीकार्यता और करियर परिणाम अनिश्चित बने हुए हैं। माता-पिता को छोटे विवरणों की जांच करनी चाहिए और विदेशी ब्रांड मूल्य से परे देखना चाहिए।-कृष्ण भनोट