अश्लील सामग्री से बच्चों को कैसे दूर रखें?

Edited By Updated: 22 Sep, 2026 03:28 AM

how to keep children away from content

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में कक्षा चार में पढऩे वाले एक बच्चे ने अपनी बहन का न्यूड वीडियो बनाया। उसके साथ अश्लील हरकतें भी कीं। अचानक मां कमरे में आई,  तो उसने बच्चे को ऐसा करते देखा। मोबाइल पर पोर्न चल रहा था।  उसने अपनी अध्यापिका का भी बहुत गंदा...

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में कक्षा चार में पढऩे वाले एक बच्चे ने अपनी बहन का न्यूड वीडियो बनाया। उसके साथ अश्लील हरकतें भी कीं। अचानक मां कमरे में आई,  तो उसने बच्चे को ऐसा करते देखा। मोबाइल पर पोर्न चल रहा था।  उसने अपनी अध्यापिका का भी बहुत गंदा चित्र बनाया था। अपने साथ पढऩे वाली बच्चियों के साथ भी गलत हरकतें करता था। बताया गया कि बच्चा मोबाइल पर बहुत पोर्न देखता था। स्कूल प्रशासन को जब इस बारे में पता चला, तो बच्चे को स्कूल से निकाल दिया गया। माता-पिता को बुलाकर सलाह दी गई कि वे बच्चे का किसी मनोचिकित्सक से इलाज कराएं। बच्चे का इलाज चल रहा है। 

यह खबर न केवल डरावनी है, बल्कि चिंता पैदा करती है। इस पूरी घटना का उसके घर वालों पर क्या प्रभाव पड़ा होगा, स्कूल से निकाले जाने पर बच्चा क्या सोचता होगा, आसपास के लोग उसे देखकर कैसे रिएक्ट करते होंगे। आखिर चौथी कक्षा में पढऩे वाले बच्चे की उम्र भी कितनी होगी। वह मोबाइल में क्या देखता है कि माता-पिता को पता भी नहीं चला। जिस तकनीक को बच्चों, किशोरों, युवाओं के लिए भगवान की तरह से पेश किया गया, आखिर वह क्या कर रही है। कुछ साल पहले मुम्बई में एक छोटी बच्ची के साथ दुष्कर्म के अपराध में कई बच्चे पकड़े गए थे, जिनमें से एक की उम्र 9 साल थी। 

एक तरफ तकनीक बच्चों को वह सब दिखा रही है, जिसे जानने की उनकी उम्र नहीं है। हर ज्ञान की एक उम्र होती है। उम्र से पहले दिया गया ज्ञान घातक भी होता है। दूसरी तरफ इन बड़ी तकनीकी कम्पनियों से जब बच्चों को दिखाए जाने वाले इस तरह के कंटैंट पर सवाल पूछा जाता है, तो वे यह कहकर बचने की कोशिश  करती हैं कि वे तो बस सॢवस प्रोवाइडर हैं। यह बहानेबाजी भी खूब है। अरे भाई आप अपनी कम्पनियों से अरबों-खरबों कमा रहे हैं और जब जिम्मेदारी लेने की बात आती है, तो तरह-तरह के बहाने बनाते हैं।  क्या कोई कैमिस्ट सॢवस प्रोवाइडर होने के नाते गलत या एक्सपायरी डेट की दवा बेच दे और यदि दवा किसी को रिएक्ट कर जाए, तो क्या वह अपनी इस जिम्मेदारी से यह कहकर बच सकता है कि दवा उसने थोड़े ही बनाई है, वह तो बस उसे बेच रहा था, सर्विस प्रोवाइडर था। पैसे कमाने की होड़ इतनी ज्यादा है कि यह भी नहीं सोचा जाता कि इससे बच्चों के मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ेगा। 


रिवार में भी इन दिनों हालत यह है कि परिवार में रहने वाले माता-पिता, दो बच्चे या एक बच्चा है। कुछ घरों में हो सकता है बुजुर्ग भी हों। शहरों में अब अधिकांश माता-पिता काम से बाहर चले जाते हैं। बच्चे घरेलू सहायक, सहायिकाओं या डे केयर सैंटर के भरोसे रहते हैं। आम तौर पर माता-पिता कम उम्र के बच्चों को उनकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए मोबाइल दे देते हैं, ताकि किसी आपातकालीन स्थिति में वे सम्पर्क कर सकें। जब घर में बच्चों के साथ परिवार के सदस्य नहीं हैं, तो कैसे पता चलेगा कि वे मोबाइल पर क्या देख रहे हैं। यदि घर के सदस्य हों भी, तो चौबीसों घंटे कैसे पता चल सकता है कि बच्चा क्या कर रहा है।

फिर अपने देश में बच्चों के विकास के लिए जरूरी बताया जाता है कि उन्हें हर बात पर टोका नहीं जाना चाहिए। उनकी निजता का सम्मान भी करना चाहिए। इसलिए आज के पेरैंट्स बच्चे से कोई खास सवाल-जवाब नहीं करते। कई लोग कहते हैं कि हम तो अपने बच्चे को मोबाइल नहीं देना चाहते लेकिन जब सारे दोस्तों के पास है और वह भी मांग रहा है, तो क्या करें। क्योंकि जिस बच्चे के पास यह नहीं, उसका खूब मजाक भी उड़ाया जाता है। उसे दोस्त एक तरह से अपने कुनबे से बाहर कर देते हैं। बच्चे को स्कूल भेजकर सोच लिया जाता है कि वहां बच्चा क्या कर रहा है, इसकी जिम्मेदारी स्कूल की है। लेकिन जिस तरह से घर वाले हर वक्त बच्चे को ट्रैक नहीं कर सकते, उसी तरह स्कूल में अध्यापक-अध्यापिकाओं को भी बहुत काम रहता है। 

इन दिनों बच्चों का स्क्रीन टाइम कम करने की बातें दुनिया भर में चल रही हैं। हाल ही में यूरोपीय यूनियन की प्रमुख उर्सुला वोन डरलेन ने कहा कि इस संघ में शामिल देशों को 13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर रोक लगा देनी चाहिए। आस्ट्रेलिया तो 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया पर होने पर पहले ही पाबंदी लगा चुका है। अपने देश में अनगिनत बच्चों और किशोरों के पास स्मार्ट फोन्स हैं। वे उन पर क्या देख रहे हैं, क्या सीख रहे हैं, इसे जानना-परखना वाकई मुश्किल है। ऐसे में इस लेखिका को भी समझ में नहीं आता कि कैसे हम अपने बच्चों को दिमागी प्रदूषण से बचाएं। उन्हें पोर्न और एडल्ट कंटैंट से दूर रख सकें। पोर्न इंडस्ट्री अरबों-खरबों की है। अपने देश में इसका बड़ा दर्शक वर्ग मौजूद है। इसमें बच्चे भी शामिल हैं।  तकनीक को रोक नहीं सकते लेकिन इस पर लगाम लगा सकते हैं। नियमन किया जा सकता है। इतनी बड़ी आबादी के लिए यह हो कैसे, इस पर सोचना है।-क्षमा शर्मा
 

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