‘शिकार बनते शिकारी’

Edited By Updated: 16 Mar, 2026 04:31 AM

hunters becoming the hunted

कहावत अमरीका और इसराईल पर जस की तस लागू होती है। हर दूसरे दिन जंग जीतने का दावा करने वाले जनाब डोनाल्ड ट्रम्प इन सवालों से कन्नी काट जाते हैं कि ‘जीत’ के बाद जंग क्यों जारी है? हालात गवाह हैं कि उनके पास न तो हमले का कोई वाजिब कारण था, न युद्ध से...

कहावत अमरीका और इसराईल पर जस की तस लागू होती है। हर दूसरे दिन जंग जीतने का दावा करने वाले जनाब डोनाल्ड ट्रम्प इन सवालों से कन्नी काट जाते हैं कि ‘जीत’ के बाद जंग क्यों जारी है? हालात गवाह हैं कि उनके पास न तो हमले का कोई वाजिब कारण था, न युद्ध से निकलने की कोई योजना। वह फंस गए हैं। 5000 साल पुरानी सभ्यताएं कुछ बमों से खत्म नहीं होतीं, यह ईरान ने साबित कर दिया है। आक्रमण के पहले ही दिन उसके सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई अपने सर्वोच्च 44 साथियों के साथ मारे जाते हैं।

इसराईल और अमरीका को लगा कि अब इराक की तरह बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरकर बगावत कर देंगे। हुआ इसका उलटा। लाखों लोग तेहरान में शोक मनाने के लिए इकट्ठा हो जाते हैं। इसके साथ ही इसराईल और खाड़ी के देशों पर ईरानी ड्रोन अथवा मिसाइलें बरस उठती हैं। ऐसा इसलिए संभव हो सका, क्योंकि पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार, ‘सुप्रीम लीडर’ के गुजरते ही समूचे प्रशासनिक ढांचे को विकेंद्रीकृत कर दिया गया। अब हर क्षेत्रीय कमांडर परिस्थिति के अनुसार निर्णय ले सकता है। इससे झल्लाकर वाशिंगटन व तेल अवीव के हुक्मरानों ने और बड़े बमों की झड़ी लगा दी। यह सब इतने गैर-जिम्मेदाराना तरीके से किया गया कि 28 फरवरी को एक बालिका विद्यालय पर थोड़े अंतराल में 2 बार बमबारी की गई। नतीजतन, 168 बच्चियां और 14 अध्यापिकाएं शहीद हो गईं।

नवनिर्वाचित ‘सुप्रीम लीडर’ अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई अमरीका और ट्रम्प को ‘दंडित’ कर ‘मुआवजा’ वसूलने का इरादा जाहिर कर रहे हैं। इससे पहले ईरान युद्धबंदी के लिए 3 शर्तें रख चुका है। आप इसे एक नौसिखिए का बड़बोलापन मानने को स्वतंत्र हैं, पर इतना तय है कि ईरान जैसा प्रतिरोध वाशिंगटन ने बरसों से नहीं देखा था। इससे अमरीकी चौधराहट की चमक धुंधली पड़ उठी है। पैट्रो डॉलर के बल पर अपनी और पश्चिम की झोलियां भरने वाले खाड़ी के हुक्मरानों ने अमरीकी सरपरस्ती में एक ऐसी दुनिया रची थी, जिसमें अमन-चैन और अमीरी थी। यह समझ खोखली साबित हो चुकी है। खाड़ी की घटती साख के साथ अमरीका और इसराईल को अन्य मोर्चों पर भी जबर्दस्त आर्थिक क्षति का सामना करना पड़ रहा है। सी.एन.एन. की रिपोर्ट के अनुसार, आक्रमण के शुरुआती 6 दिनों में ही 11 अरब अमरीकी डॉलर स्वाहा हो चुके थे। 

आजकल ईरानी हमलों से खाड़ी स्थित अमरीकी अड्डों को खासा नुकसान उठाना पड़ा है। अब तक वे संसार के समूचे मिसाइल भंडार का एक-तिहाई खर्च कर चुके हैं। इसकी बरसों तक भरपाई नहीं की जा सकेगी, क्योंकि इनकी निर्माण क्षमता भी सीमित है। उधर, प्रतिस्पर्धी चीन का धन और बल, दोनों सुरक्षित हैं। हालात इतने संगीन हैं कि अमरीका को दक्षिण कोरिया, जापान आदि देशों में तैनात मिसाइल खाड़ी स्थित अड्डों पर मंगवाने पड़े हैं। इससे सवाल उठने लगे हैं, दक्षिण कोरिया पर उत्तर कोरिया या जापान पर चीन हमलावर हो उठे, तो अमरीकी उनकी सुरक्षा कैसे करेंगे? इससे कुछ नए सामरिक समीकरण उभर सकते हैं। अमरीका के लिए यह शुभ संकेत नहीं है।

इस युद्ध ने रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष से उभरे एक तथ्य को स्थापित कर दिया है। वह यह कि अब लड़ाई सिर्फ भारी-भरकम हथियारों और सैनिक दस्तों से नहीं जीती जा सकती। उसे रोकने के लिए छोटे से छोटा देश ड्रोन और नई टैक्नोलॉजी का सहारा लेकर खुद को लंबे समय तक बचाए रख सकता है। महज 20000 डॉलर वाले ईरानी शाहिद ड्रोन को नाकाम करने के लिए पेंटागन को 40 लाख डॉलर की मिसाइल खर्च करनी पड़ती है। यह युद्ध अगर लंबा ङ्क्षखच गया, तो इसराईल बदहाल और अमरीका मंदी का शिकार बन सकता है। उनको कूटनीति के मोर्चे पर भी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। स्पेन ने तेल अवीव में अपना दूतावास बंद कर दिया है। आगे कुछ और देश ऐसा कर सकते हैं। अमरीका के इटली जैसे सहयोगी ने पहले ही कह दिया है कि वह युद्ध में शामिल नहीं है। 

डोनाल्ड ट्रम्प और बेंजामिन नेतन्याहू के इस अविवेकी निर्णय ने विश्व की अर्थव्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। कच्चे तेल की कीमतें शनिवार की दोपहर तक 102 डॉलर प्रति बैरल के करीब जा पहुंची थीं। समूची दुनिया के शेयर बाजार कंपकंपा रहे हैं और कई देशों में ऊर्जा की आपूर्ति चरमराने लगी है। खुद अमरीका में ही ट्रम्प का विरोध जोर पकड़ता जा रहा है। यहां 70 फीसदी से ज्यादा लोग इस अकारण के आक्रमण से नाखुश हैं। जल्द होने वाले उपचुनावों में ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी को आघात का सामना करना पड़ सकता है, वहीं समूची दुनिया में अमरीका विरोध की भावनाएं जोर मार सकती हैं। कुछ विशेषज्ञ इसे अमरीकी साम्राज्य के पराभव की शुरुआत बता रहे हैं। 9/11 के बाद से अमरीका लगातार नुकसानदेह लड़ाइयों में फंसता रहा है। उसकी फौजें ईराक को बदहाल छोडऩे के बाद अफगानिस्तान से भी परेशान होकर लौटी थीं। उन्हें सीरिया, सोमालिया और लीबिया से भी उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं हासिल हुए। यही नहीं, हर अमरीकी जंग चीन के लिए तोहफा साबित होती है। बीजिंग ने 1979 के बाद कोई युद्ध नहीं लड़ा और कारोबार पर ध्यान दिया। आज उसे ‘दुनिया का कारखाना’ कहा जाता है।

अब अपने देश की बात करते हैं। हमारा लगभग 50 फीसदी तेल और 90 प्रतिशत एल.पी.जी. गैस होर्मुज की खाड़ी से गुजरती है। ईरान ने चीन के अलावा सभी के लिए इसे बंद कर दिया था, मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री के विशेष प्रयासों से भारतीय पोतों को कुछ छूट दी गई है। अगर खाड़ी कुछ और दिन बंद रही, तो हमारे सामने नई चुनौतियां आ खड़ी होंगी। सरकार ने इसीलिए एहतियात बरतनी शुरू कर दी है। गैस के व्यावसायिक उपयोग पर रोक के साथ घरेलू गैस की बुकिंग भी अब निश्चित समय बीतने के बाद ही कराई जा सकेगी। इससे अभी से कई स्थानों पर अफरातफरी मच गई है। गैस एजैंसियों पर कतारें लगी हैं, बिजली के चूल्हे बाजार से नदारद हो गए हैं, ढाबों और छोटे रेस्तरांओं में मैन्यू को सीमित कर दिया गया है।-शशि शेखर

Related Story

    img title
    img title

    Be on the top of everything happening around the world.

    Try Premium Service.

    Subscribe Now!