Edited By ,Updated: 26 Aug, 2026 04:08 AM

चीनी के दाम एक महीने के भीतर 42 रुपए से बढ़कर 70 रुपए प्रति किलो से ऊपर चले गए। इसमें भी बड़ी बढ़ोतरी महज 2 सप्ताह में हुई। वजह क्या थी? कोई तो सोया हुआ था। कौन? इस पर बहस होगी, एक-दो हफ्ते बीतेंगे और फिर आयात-निर्यात के खेल होंगे। चीनी के साथ भी...
चीनी के दाम एक महीने के भीतर 42 रुपए से बढ़कर 70 रुपए प्रति किलो से ऊपर चले गए। इसमें भी बड़ी बढ़ोतरी महज 2 सप्ताह में हुई। वजह क्या थी? कोई तो सोया हुआ था। कौन? इस पर बहस होगी, एक-दो हफ्ते बीतेंगे और फिर आयात-निर्यात के खेल होंगे। चीनी के साथ भी यही हुआ। कीमतें जब चढ़ कर नाक तक आ गईं तो 10 लाख मीट्रिक कच्ची चीनी के बिना शुल्क आयात की अनुमति दी गई। यही काम अगर 2 महीने पहले हो जाता तो शायद यह नौबत नहीं आती। चीनी उत्पादन कितना रहेगा, इसकी तस्वीर तो फरवरी में ही मिल गई थी। अप्रैल तक सारे आंकड़े फाइनल भी हो गए। मार्च के अंत तक गन्ना पिराई का सीजन भी महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे चीनी के दोनों बड़े राज्यों में खत्म हो गया था।
बीते गन्ना सीजन की शुरुआत में महाराष्ट्र में चीनी उत्पादन का अनुमान 105 लाख मीट्रिक टन था, जबकि वास्तविक उत्पादन 99.2 लाख मीट्रिक टन ही हुआ। गन्ने की कमी के कारण मार्च के अंत तक महाराष्ट्र की 90 फीसदी से अधिक मिलें बंद हो गई थीं और अप्रैल मध्य तक पूरा सीजन ही सिमट गया। मगर नीति नियामक प्रशासन ने इस बड़े कारक की अनदेखी की। उत्तर प्रदेश में तो इस सीजन में चीनी उत्पादन में बड़ी गिरावट देखी गई। उत्तर प्रदेश में 2019-20 के सीजन में सर्वकालिक उच्च 126.37 लाख टन चीनी उत्पादन हुआ था, जो पिछले सत्र में घटकर मात्र 89.52 लाख टन रह गया।
इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (आई.एस.एम.ए.) के अध्यक्ष नीरज शिरगांवकर ने कहा कि देश में चीनी की कोई कमी नहीं है। देश में आगामी त्यौहारी सीजन की मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है। शुगर बैलेंस पूरी तरह सुरक्षित है। यह भी कहा जा रहा है कि 30 सितम्बर को चालू सीजन खत्म होने पर भी देश के पास करीब 35 लाख टन का सरप्लस क्लोजिंग स्टॉक बचेगा। यह स्थिति चौंकाने वाली है और इससे कुछ बड़े सवाल खड़े होते हैं कि जब देश के पास बड़ा सरप्लस स्टॉक बचने का अनुमान है, तब चीनी के दाम तेजी से क्यों बढ़े? दूसरा, तब 10 लाख टन चीनी के शुल्क मुक्त आयात का फैसला क्यों लेना पड़ा?
चीनी उत्पादकों का कहना है कि खुदरा बाजार में दाम बढऩे का कारण सट्टेबाजी और स्टॉक जमा करना है। उनका कहना है कि चीनी के दाम बढऩे में मिलों की कोई भूमिका नहीं। चीनी उत्पादक भले कुछ भी कहें, मगर चीनी के ड्यूटी-फ्री आयात के फैसले का सीधा असर थोक बाजार पर पड़ा है। हालांकि खुदरा बाजार में इसका असर दिखने में थोड़ा समय लगेगा। पिछले 3 दिन में थोक बाजार में चीनी के दाम लगभग 15 फीसदी टूट गए हैं। महाराष्ट्र में 20-21 अगस्त को चीनी की थोक कीमतें 6200-6500 रुपए प्रति किं्वटल तक पहुंच गई थीं, वे 24 अगस्त को घटकर 5600 रुपए प्रति क्विंटल पर आ गईं। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अगले 10 दिन में खुदरा बाजार में भी चीनी के दाम 5 रुपए प्रति किलोग्राम तक नीचे आ सकते हैं।
अब प्याज भी महंगाई की चपेट में आ गया है। जुलाई में जो प्याज 30 रुपए किलो तक बिक रहा था, अब 60-70 रुपए प्रति किलो में मिल रहा है। मार्च-अप्रैल में काटी गई प्याज की फसल का स्टॉक मंडियों से धीरे-धीरे खत्म हो रहा है और नई फसल अक्तूबर से पहले बाजार में नहीं आएगी। बाजार में स्टॉक की कमी की खबरों का फायदा उठाकर कुछ बड़े थोक व्यापारियों ने त्यौहारों की मांग को देखते हुए सट्टेबाजी शुरू कर दी है। हालांकि आंकड़ों में तस्वीर कुछ और कहती है। इस साल देश में प्याज उत्पादन लगभग 307.37 लाख मीट्रिक टन हुआ, जो देश की वाॢषक खपत के लिए पर्याप्त है। इसके अलावा सरकार के पास पहले से ही नैफेड और एन.सी.सी.एफ. के माध्यम से खरीदा हुआ भारी मात्रा में बफर स्टॉक उपलब्ध है। इसलिए सरकार ने प्याज के आयात को मंजूरी नहीं दी है। मगर प्याज की कीमतें नियंत्रित रखने में प्रशासन विफल रहा है।
प्याज ने ही 1980 के चुनाव में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी करने में मदद की थी। इतना ही नहीं, अक्तूबर-नवम्बर 1998 में जब अटल सरकार के समय देश में प्याज की कीमतें आसमान छू गई थीं, तब दिल्ली में भाजपा की सरकार थी और सुषमा स्वराज मुख्यमंत्री थीं। प्याज के बढ़े दामों को लेकर जनता में इतना गुस्सा था कि उस साल दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा की करारी हार हुई और शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस सत्ता में आई।
खाद्य पदार्थों के खुदरा दाम अगस्त में तेजी से बढ़े हैं। दक्षिण और मध्य भारत के बाजारों में सूरजमुखी के तेल की कीमतों में इस महीने सबसे बड़ी तेजी देखी गई। कुछ राज्यों में इसके खुदरा दाम बढ़कर 193 रुपए प्रति लीटर तक पहुंच गए। अगस्त के तीसरे और चौथे हफ्ते में उड़द दाल की कीमतों में सबसे तेज साप्ताहिक उछाल देखा गया। थोक मंडियों में चना और उड़द के भाव बढऩे से खुदरा पैकेट बंद दालों के दाम में 5 से 10 रुपए प्रति किलोग्राम तक की तेजी देखी गई। प्रीमियम और सामान्य दोनों तरह के चावलों की कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई है। यह सब इसलिए है क्योंकि बाजार में जब जमाखोरी और सट्टाबाजारी का खेल चलता है, सरकारें और प्रशासन बाद में निद्रा तोड़ता है।
यह लेख सिर्फ चीनी-प्याज को लेकर नहीं है। बीते दिनों राहुल गांधी ने संसद मार्ग थाने पर एफ.आई.आर. को लेकर 6 घंटे तक धरना दिया। आखिर एफ.आई.आर. की गई। एफ.आई.आर. करनी ही थी तो यह काम 15 मिनट में ही क्यों नहीं हुआ? जंतर-मंतर पर भी जो हुआ, वह भी लेट-लतीफी के निर्णय का शिकार हुआ। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में जेन-काी के स्कूली प्रदर्शन के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिला प्रशासन को निर्देश दिए कि फौरन इनकी समस्या हल हो। राजस्थान में भी कॉकरोच जनता पार्टी के स्कूल ठीक करो अभियान में हुए बवाल के बाद भजनलाल सरकार ने स्कूलों के कायाकल्प के लिए तीन साल में 12500 करोड़ खर्च करने का रोडमैप जारी कर दिया। यानी बहुत बवाल से पहले शांति। कहने का कुल जमा यह है कि अगर प्रशासन जगा रहे तो कई समस्याएं मुंह खोल खड़ी नहीं होंगी। लेकिन यहां अगर लगा है, यह ध्यान रखिए।-हम, देश के लोगअकु श्रीवास्तव