भारत देख रहा, पाकिस्तान कर रहा : वह ‘ऑप्टिक्स वॉर’ जिसे दिल्ली हार रही है

Edited By Updated: 24 Apr, 2026 04:36 AM

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अमरीका -ईरान वार्ता रुकी हुई है, और ट्रम्प ने पाकिस्तान के अनुरोध पर युद्धविराम को आगे बढ़ा दिया है। तमाम ‘अलंकृत’ संदेशों के बावजूद असीम मुनीर ईरान को दूसरे दौर की बातचीत के लिए नहीं ला सके। तीनों राजधानियों (वॉशिंगटन, तेहरान, इस्लामाबाद) से इस बात...

अमरीका -ईरान वार्ता रुकी हुई है, और ट्रम्प ने पाकिस्तान के अनुरोध पर युद्धविराम को आगे बढ़ा दिया है। तमाम ‘अलंकृत’ संदेशों के बावजूद असीम मुनीर ईरान को दूसरे दौर की बातचीत के लिए नहीं ला सके। तीनों राजधानियों (वॉशिंगटन, तेहरान, इस्लामाबाद) से इस बात के आरोप लग रहे हैं कि किसने किससे क्या वादा किया और उसे पूरा नहीं किया। मुनीर को अभी भी दोनों पक्षों को इस मोड़ तक लाने का श्रेय मिलेगा और उन्हें पुरस्कृत किया जाएगा। पाकिस्तान ने अपने सीमित वजन का भरपूर फायदा उठाया है, जबकि भारत ‘सेफ’ खेलने में ही संतुष्ट नजर आ रहा है। एक (पाकिस्तान) भविष्य के प्रयासों के लिए जगह बनाने वाला एक उन्मत्त अभिनेता है, तो दूसरा (भारत) एक हैरान पर्यवेक्षक, जो अपने हितों की रक्षा के लिए बस हाथ-पांव मार रहा है।

भारत की ‘फेल-सेफ’ (सुरक्षित) मुद्रा ने पिछले 2 वर्षों में कई मौकों पर माहौल को समझने में गलती की है, जिसकी शुरुआत राष्ट्रपति चुनाव अभियान से हुई और ट्रम्प 2.0 तक जारी है। डैमोक्रेट्स खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं क्योंकि भारतीय राजनयिक ट्रम्प शासन को खुश करने में बहुत व्यस्त हैं। विक्रम मिसरी के कार्यक्रम में डैमोक्रेट्स के साथ कोई मुलाकात शामिल नहीं थी। निश्चित रूप से, कैपिटल हिल पर वरिष्ठ कर्मचारियों या किसी थिंक टैंक की महफिल के लिए एक घंटा निकाला जा सकता था। पाकिस्तान के लिए, हाई प्रोफाइल होने का मतलब है बड़ा लाभांश। वर्तमान में उसकी उपयोगिता ऐसी है कि पाकिस्तान की बदहाल अर्थव्यवस्था, दम तोड़ते लोकतंत्र या आतंकी खेलों के बारे में चुभते हुए सवालों को ‘बाल की खाल निकालना’ कहकर खारिज कर दिया जाता है। क्या मुनीर अमरीकी उम्मीदों पर खरे उतर सकते हैं, सऊदी अरब को संतुष्ट कर सकते हैं, ईरान के कट्टरपंथियों को साथ ला सकते हैं और स्वदेश में शियाओं को संभाल सकते हैं, यह देखा जाना बाकी है। फिलहाल, उनकी ‘शटल डिप्लोमेसी’ (दौड़-धूप वाली कूटनीति) प्रशंसा बटोर रही है। 

अगर पाकिस्तान गेंद लेकर दौड़ रहा है, तो युद्ध के प्रति भारत का नजरिया गलतियों की एक शृंखला रहा है। इसकी शुरुआत एक आकलन से हुई थी। स्पष्ट रूप से यहां (वॉशिंगटन) स्थित भारतीय दूतावास से, कि युद्ध आसन्न नहीं था और प्रधानमंत्री की इसराईल यात्रा ठीक रहेगी। संयोग से, जिस दिन नरेंद्र मोदी वहां उतरे, बेन गुरियन हवाई अड्डा अमरीकी सैन्य विमानों और हथियारों से भरा हुआ था।जानकार इस बात पर जोर देते हैं कि भारत ‘लंबा गेम’ खेल रहा है और पाकिस्तान की प्रमुखता से बेअसर है। इसके अलावा, दुनिया इतनी तेजी से बदल रही है कि तुरंत हस्तक्षेप करना मुश्किल है। भारत एक ‘चिंतनशील मूड’ में है, नियमित यात्राओं के साथ अमरीका के साथ अपने संबंधों को शांति से संवार रहा है और जहां संभव हो, विस्तार की तलाश कर रहा है। शांति का स्तर ऐसा है कि दिल्ली अमरीकियों की इच्छा के विरुद्ध नहीं जाएगी, भले ही राष्ट्रीय हित दांव पर हों, वे (अमरीका) अपनी मर्जी से तेल छूट देते हैं और छीन लेते हैं।

यह अनावश्यक लड़ाई लडऩे का तर्क नहीं है। यह अपनी आवाज उठाने का सही तरीका खोजने के बारे में है। पिछले हफ्ते, ट्रम्प ने होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी की घोषणा की। भारत ने कुछ नहीं कहा, जबकि उसका कच्चे तेल आयात का 50 प्रतिशत, एल.एन.जी. का 60 प्रतिशत और लगभग पूरी एल.पी.जी. आपूर्ति इसी जलमार्ग से आती है। भारतीय नौसेना को तेल टैंकरों की सुरक्षा के लिए क्यों नहीं भेजा जा सकता, खासकर जब उसने अतीत के ऑपरेशनों में अमरीकी नौसेना की सहायता की है? यदि भारत एक ‘ब्लू वॉटर नेवी’ होने के बावजूद अपने घर के करीब एक छोटे से भौगोलिक क्षेत्र में अधिकार का प्रयोग नहीं करेगा, तो क्षेत्रीय शक्ति होने का क्या मतलब है? जैसा कि एक विश्लेषक ने मुझे याद दिलाया, मुंबई कोलकाता की तुलना में चाबहार के ज्यादा करीब है।

शायद विविधीकरण रणनीति के रूप में अधिक अमरीकी तेल और गैस खरीदने और उच्च माल ढुलाई लागत एवं लंबे डिलीवरी समय को सहन करने में ही बुद्धिमानी है। दिल्ली ऊर्जा के झटके का सामना उसी तरह कर रही है जैसे उसने पिछले साल व्यापार और टैरिफ पर तीखे अपमान का सामना किया था। भारतीय व्यापार वार्ताकार यहां वॉशिंगटन में हैं। उन्हें सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रम्प के आपातकालीन टैरिफ को अवैध घोषित करने से पहले फरवरी में घोषित ढांचे के भविष्य का पता लगाना चाहिए। दिल्ली के खिलाफ ‘संरचनात्मक अतिरिक्त क्षमता’ और ‘जबरन श्रम’ के उपयोग के लिए 301(बी) जांच को देखते हुए भारत के लिए पहले से बातचीत की गई 18 प्रतिशत दर से नीचे जाने की बहुत कम उम्मीद है।(‘ई.टी.’ से साभार)-सीमा सिरोही

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