Edited By ,Updated: 16 Mar, 2026 05:53 AM

कंसल्टैंट्स का कहना है कि अमरीका में सख्त वीजा नीतियां, खासकर डोनाल्ड ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में और ब्रिटेन, कनाडा तथा ऑस्ट्रेलिया में इमिग्रेशन के कड़े नियम और पढ़ाई के बाद काम करने के कम होते मौकों के साथ-साथ पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष, कई...
कंसल्टैंट्स का कहना है कि अमरीका में सख्त वीजा नीतियां, खासकर डोनाल्ड ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में और ब्रिटेन, कनाडा तथा ऑस्ट्रेलिया में इमिग्रेशन के कड़े नियम और पढ़ाई के बाद काम करने के कम होते मौकों के साथ-साथ पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष, कई भारतीय छात्रों को अपनी विदेश में पढ़ाई की योजनाओं को रोकने या उनमें बदलाव करने पर मजबूर कर रहे हैं। हाल के महीनों में, कई छात्रों ने विदेशी यूनिवॢसटीज में दाखिले के अपने प्लान को अगले सैशन तक के लिए टाल दिया है, जबकि वैश्विक अशांति और अनिश्चितता के बीच कुछ छात्र अपने घर के करीब या ज्यादा स्थिर जगहों पर पढ़ाई के विकल्प तलाश रहे हैं।
कॉलेजीफाई के सह-संस्थापक और निदेशक आदर्श खंडेलवाल ने कहा, ‘‘विदेश में पढ़ाई के रुझानों में एक साफ गिरावट देखी जा रही है। सरकारी आंकड़े दिखाते हैं कि विदेश में पढ़ाई के लिए जाने वाले भारतीयों की संख्या 2023 में 9,08,000 से घटकर 2025 में 6,26,000 रह गई है, जो कि एक बहुत बड़ी गिरावट है।’’ उन्होंने आगे कहा कि भारत को अब सिर्फ एक ‘बैकअप’ (दूसरा विकल्प) के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे तेजी से एक गंभीर ‘पहली पसंद’ वाले माहौल के तौर पर परखा जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, माता-पिता अपने बच्चों को विदेश भेजने से पहले ज्यादा सोच-समझकर फैसले ले रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि छात्रों के बीच सबसे बड़ी चिंता ‘नीतियों में अनिश्चितता’ है, न कि युद्ध।
आई.डी.पी. एजुकेशन के क्षेत्रीय निदेशक (दक्षिण एशिया, कनाडा और लाटाम) पीयूष कुमार ने कहा, ‘‘विदेशों में पढ़ाई के मुख्य ठिकानों से मिले हालिया सरकारी आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल के मुकाबले छात्रों की विदेश यात्रा की रफ्तार धीमी हो गई है।’’ उदाहरण के लिए, अमरीकी विदेश विभाग के आंकड़े दिखाते हैं कि जून और जुलाई 2025 के बीच विदेशी छात्रों को जारी किए गए वीजा की संख्या में 62 प्रतिशत की गिरावट आई है। कुमार के अनुसार, ‘‘इस गिरावट के पीछे कई वजहें हैं, जिनमें सख्त वीजा नीतियां, नए ग्रैजुएट्स के लिए मुश्किल जॉब मार्केट और करंसी में उतार-चढ़ाव शामिल हैं।’’ पोस्ट ग्रैजुएट (स्नातकोत्तर) स्तर पर इसका असर ज्ेयादा पड़ा है। कुमार ने आगे कहा, ‘‘कई इच्छुक छात्र ऐसे कामकाजी पेशेवर हैं, जो अपनी पढ़ाई की योजनाओं को 1 या 2 साल के लिए टालना पसंद कर रहे हैं।’’ वे मौजूदा उथल-पुथल के शांत होने का इंतजार कर रहे हैं।
विकल्पों को फिर से तय करना : कंसल्टैंट्स के अनुसार, इस क्षेत्र में सुरक्षा स्थिति के कारण यू.ए.ई. जाने वाले आवेदनों में भी अस्थायी गिरावट आई है। लैवरेज एजुकेशन के संस्थापक और सी.ई.ओ. अक्षय चतुर्वेदी ने कहा, ‘‘बड़े स्तर पर, 2026 में अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा की मांग किसी संरचनात्मक गिरावट की बजाय, गंतव्य विकल्पों में फिर से बदलाव और विविधता लाने के दौर को दर्शाती है।’’ कॉलेजीफाई के खंडेलवाल ने कहा, ‘‘जब कोई संघर्ष होता है, अस्थिरता को लेकर मीडिया में लगातार खबरें आती हैं, तो इससे घरों का भावनात्मक माहौल बदल जाता है।’’ यूनिवर्सिटी लिविंग के संस्थापक और सी.ई.ओ. सौरभ अरोड़ा ने कहा कि कुछ छात्र मजबूत घरेलू संस्थानों या भारत के भीतर ही उपलब्ध अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों को चुन रहे हैं, जबकि अन्य अभी भी विदेश में पूरी डिग्री हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं।
अरोड़ा ने कहा, ‘‘जमीनी स्तर पर हम जो देख रहे हैं, वह यह नहीं है कि छात्र अपनी योजनाओं से पीछे हट रहे हैं, बल्कि वे अपने फैसले को अंतिम रूप देने में थोड़ा ज्यादा समय ले रहे हैं।’’
विशेषज्ञों ने कहा कि छात्र और अभिभावक गंतव्यों, खर्चों और करियर के नतीजों का मूल्यांकन करने में ज्यादा समय लगा रहे हैं। वीजा नियमों में बदलाव, शिक्षा की बढ़ती लागत और पढ़ाई के बाद काम के बदलते अवसरों ने पिछले एक-दो सालों में परिवारों को पहले से ही ज्यादा सतर्क बना दिया है। इस बीच, कई वैश्विक विश्वविद्यालयों, जिनमें यूनिवॢसटी ऑफ साऊथैम्पटन और डीकिन यूनिवॢसटी शामिल हैं, ने भारत में अपने कैंपस या सांझेदारियां स्थापित करना शुरू कर दिया है। अरोड़ा ने कहा, ‘‘भारत भी खुद एक ज्यादा प्रमुख शिक्षा गंतव्य बनता जा रहा है।’’ विशेषज्ञों ने अमरीका, कनाडा, यू.के. और ऑस्ट्रेलिया जैसे पारंपरिक गंतव्यों से हटकर जर्मनी, आयरलैंड, स्पेन और इटली जैसे देशों की ओर रुझान बढऩे की तरफ भी इशारा किया।-प्राची वर्मा