सपने दिखाना सही लेकिन पूरे न किए जाएं तो बाजी पलट जाती है

Edited By Updated: 20 Jun, 2026 03:35 AM

it is okay to dream but if they are not fulfilled the tables turn

केंद्र में पिछले 12 साल से और अनेक प्रदेशों में 10-15 वर्षों से भाजपा सरकारें चल रही हैं। जब आए थे तो 2 करोड़ लोगों को प्रति वर्ष रोजगार देने, 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने और देश में गिफ्ट सिटी, स्मार्ट सिटी तथा औद्योगिक नगर बनाने का वायदा...

केंद्र में पिछले 12 साल से और अनेक प्रदेशों में 10-15 वर्षों से भाजपा सरकारें चल रही हैं। जब आए थे तो 2 करोड़ लोगों को प्रति वर्ष रोजगार देने, 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने और देश में गिफ्ट सिटी, स्मार्ट सिटी तथा औद्योगिक नगर बनाने का वायदा किया। यह बहुत सोच समझकर किया गया होगा, यह माना जा सकता है, अर्थात् यह सब कुछ संभव था। वास्तविकता यह है कि बहुत कम काम हुआ। इसलिए इस बात की पड़ताल जरूरी हो जाती है कि क्या नियत समय के अनुसार सही नीतियां बनाई गईं और क्या यह जनता को भ्रमित करने और उनके साथ धोखा करने जैसा आचरण नहीं है?

पहले प्रोजैक्ट फिर इंफ्रास्ट्रक्चर : कुछ उदाहरणों से इसे समझा जा सकता है। सबसे पहले बहुप्रचारित जेवर एयरपोर्ट, यमुना एक्सप्रैसवे टाऊनशिप और औद्योगिक नगरी तथा फिल्म सिटी की बात करते हैं। 2003 में एयरपोर्ट को मंजूरी मिली, 2014-17 में जमीन अधिग्रहण, 2021 में आधारशिला और जून में डोमैस्टिक फ्लाइट शुरू हुई। यहां से हर साल सवा करोड़ यात्रियों के उड़ान भरने की बात कही गई, जो 5 रनवे बनने के बाद 23 करोड़ हो जाएंगे। चलिए बहुत शानदार सपना दिखाया। अब नगर और उद्योग लगाने पर आते हैं। आवासीय योजना, इंस्टीच्यूशनल प्लॉट, स्कूल, अस्पताल के लिए जगह और उद्योगपतियों तथा उद्यमियों के लिए योजनाएं घोषित की गईं। लोगों ने रुचि दिखाई और फटाफट प्लाटों की बिक्री होने लगी तथा प्राधिकरण के पास करोड़ों रुपए आने लगे। बोर्ड लग गए, उद्घाटन हुए और इस क्षेत्र की ही नहीं, पूरे प्रदेश की आर्थिक उन्नति के ख्वाब दिखाए।

हकीकत देखिए। सरकार के एजैंडे में ही नहीं था कि एयरपोर्ट और अन्य जगहों पर श्रमिक, कर्मचारी, अधिकारी और कारखानेदार तथा उद्यमी कैसे पहुंचेंगे। स्थिति यह है कि आबंटित प्लॉट की पहचान मुश्किल है क्योंकि झाड़-झंखाड़, जंगल जैसी हालत, सड़क नदारद, बिजली, पानी की समस्या और अपने काम करने की जगह तक पहुंचना लगभग असंभव।  जिन्होंने प्लॉट लिए, उनकी किस्तें जारी और बैंकों की बढ़ती देनदारी के कारण चाहे किसी ने रहने के लिए सोचा हो या उद्योग लगाने का, इनके लिए सिवाय अपनी किस्मत को कोसने के कोई चारा नहीं। अधिकारी से मिलो तो सुनने को मिलेगा कि अगले 8-10 साल में ही हो पाएगा, हां इंस्टॉलमैंट तथा इंटरैस्ट समय पर देते रहना, वरना प्लॉट पर कब्जा कर लेंगे। अगर घर बना भी लिया तो न पास में कोई अस्पताल, स्कूल और न ही आने जाने के साधन। 

यही हालत पूरे देश में है : 1970 में नवी मुंबई की घोषणा हुई, ताकि बॉम्बे पर दबाव कम हो, लेकिन अभी तक पूरी बसावट नहीं और बेसिक सुविधाएं नहीं। गुजरात में 2007 में गिफ्ट सिटी अनाऊंस हुई लेकिन पहली बिल्डिंग 2015 में बनी, अमरावती की भी यही कहानी है। सरकार की नीति यह रही कि पहले प्लॉट बेचो उसके बाद मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी। 

अनेक प्रदेशों में इसके विपरीत भी काम हुआ, जैसे कि बेंगलुरु में पहले इंफ्रा, फिर आई.टी. की शुरुआत, गुजरात का धोलेरा मॉडल जिसमें पहले सरकार को सुनिश्चित करना है कि पहले इंफ्रा तैयार हो, फिर लोग बसने या काम करने आएं। सरकार को यह बात समझने में बहुत देर लगी कि जिन देशों में शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों का विकास हुआ, उन्होंने पहले ढांचागत सुविधाओं को विकसित करने पर ध्यान दिया और उसके बाद उद्यमियों तथा निवासियों को आने के लिए प्रोत्साहित किया। हमारे यहां निवेशक का पैसा डूबता है और उसका सपना टूटता है। सरकार को गतिशक्ति जैसी योजनाएं मजबूरन लानी पड़ीं, वरना लोगों का गुस्सा इन्हें उखाड़ फैंकता।

ऐसी अवस्था में निराशाजनक वातावरण, युवाओं का आक्रोश, बढ़ती बेरोजगारी और महंगाई के कारण आत्महत्या जैसे कृत्य बढऩे ही थे। इसका कारण यह कि भारत एसेट खड़े कर रहा है लेकिन जीविका का साधन नहीं बन रहे। चीन ने 80 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाल कर आत्मनिर्भर बनाया और भारत इतने ही लोगों को मुफ्त अनाज देकर उनका पेट भर रहा है और सरकार पर आश्रित बना रहा है। इंडस्ट्रियल सैक्टर में 85 प्रतिशत उद्योगों में से केवल 12 प्रतिशत ढंग से चल रहे हैं, मैडिकल सिटी, गिफ्ट और स्मार्ट या फिल्म सिटी अब से 15 साल बाद ही अस्तित्व में आ पाएंगे। सरकार पहले किसानों की जमीन पर कब्जा कर उन्हें मुआवजा देकर बेसहारा बनाती है, फिर उनकी आमदनी बढ़ाने के स्थान पर उनकी उपज का सही मूल्य भी नहीं दे पाती। 

सच का सामना : सरकार को अगर नौकरियों का वादा पूरा करना है तो लैंड बैंक का मॉडल तोड़कर जॉब बैंक मॉडल पर चलना होगा, यह न हुआ तो 2047 तक विकासशील ही रहेंगे। प्रश्न उठता है कि जब नौकरी नहीं तो कैसा और किसका विकास हो रहा है? 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना कोई ऐसा मैडल नहीं, जिस पर गर्व हो क्योंकि एक आदमी की जेब में खर्च करने को पैसा ही नहीं है, उपयोगी वस्तुओं से लेकर दवाइयों तक का खर्च उठाना कठिन है। हर साल 2 करोड़ लोगों को आजीविका के साधन देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जा सकता था लेकिन वे गरीबी से जूझ रहे हैं, किसान की दुगनी से अधिक आमदनी हो सकती थी लेकिन वह सरकारी नियमों और ऊल ज़ुलूल बातों में उलझकर रह गया। उसने कोटे की जगह काम मांगा तो बहला फुसला लिया और अच्छे दिनों की उम्मीद जगाए रखी। उनके लड़के आज डिलीवरी ब्वॉय बन कर पेट पाल रहे हैं, जबकि वे पढ़-लिख कर अपना काम करना चाहते थे। वह अपनी पुश्तैनी जमीन का अधिग्रहण होने के बाद किसी उद्यमी की तरह आस लगाए थे लेकिन चारों तरफ खाली या आधे-अधूरे बने प्लॉट दिखाई देते हैं।

याद कीजिए श्रीधरन का योगदान, जिन्होंने 4 वर्ष के तय समय में दिल्ली को मैट्रो की सौगात दी और दूसरे शहरों को देखिए, जहां खुदाई के कारण पूरा शहर दसियों साल तक बंधक बना रहता है। सरकार की नीति रही कि सपना बेचो, चाहे दशकों तक लोगों को तकलीफ उठानी पड़े। ‘मेक इन इंडिया’ हो या ‘मैन्युफैक्चरिंग हब का वायदा, अगर टाईमलाइन नहीं है तो कोई सपना पूरा नहीं हो सकता। हमारे देश में पैसे की कमी नहीं लेकिन नीयत साफ न होने से लोगों की जिंदगी मुश्किल होती जा रही है। इस पर जितनी जल्दी सोचा जाएगा, उतना अच्छा होगा वरना बाजी पलट सकती है।-पूरन चंद सरीन
 

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