Edited By ,Updated: 02 May, 2026 03:17 AM
यह चर्चा अक्सर होती है कि क्या मनुष्य उम्र का घटना या बढऩा नियंत्रित कर सकता है और जहां तक संभव हो, मृत्यु को टाल सकता है? खबर है कि रूस के वैज्ञानिक ऐसे तरीके खोज रहे हैं कि 150-200 वर्ष तक जिया जा सकता है।
यह चर्चा अक्सर होती है कि क्या मनुष्य उम्र का घटना या बढऩा नियंत्रित कर सकता है और जहां तक संभव हो, मृत्यु को टाल सकता है? खबर है कि रूस के वैज्ञानिक ऐसे तरीके खोज रहे हैं कि 150-200 वर्ष तक जिया जा सकता है।
मृत्यु ही जीवन को मूल्य देती है : आज जब रूस, अमरीका, जापान और कई अन्य देशों में वैज्ञानिक उम्र बढ़ाने, बुढ़ापा देर से आने और कोशिकाओं की मुरम्मत करने पर काम कर रहे हैं, तब यह केवल विज्ञान का विषय नहीं रह जाता-दर्शन, नैतिकता, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संतुलन का प्रश्न भी बन जाता है। जन्म और मृत्यु प्राकृतिक चक्र है, जिसमें शरीर एक माध्यम है। इसीलिए गीता में कहा गया है कि मृत्यु केवल चोला बदलना मात्र है। बात सही भी है लेकिन हमेशा से यही खोज का विषय रहा है कि क्या अंत समय का ज्ञान केवल ईश्वर को ही है और विज्ञान इसमें कुछ नहीं कर सकता? भारतीय दर्शन से लेकर यूनानी चिंतन तक में, मृत्यु को अंत नहीं बल्कि व्यवस्था का हिस्सा माना गया है। यदि मनुष्य इस चक्र को बदलने लगे तो क्या यह कुदरत के काम में दखलंदाजी माना जाएगा?
हमारे पौराणिक ग्रंथों में यह उल्लेख मिलता है कि लोग हजारों वर्ष तक जीते थे, अनेकों ने इच्छामृत्यु जैसे वरदान प्राप्त किए हुए थे और यही नहीं, उनकी मृत्यु किसी भी रूप में संभव नहीं थी, परंतु किसी न किसी प्रकार से उन्हें मरना ही पड़ता था। कहते हैं कि जब कौरवों और पांडवों का युद्ध हुआ, तब उनकी आयु 60-70 से अधिक थी। कृष्ण की आयु 125 वर्ष थी और भीष्म की तो सैंकड़ों वर्ष थी। अपना इच्छित वरदान पाने के लिए तपस्या में लीन रहने में ही न जाने कितनी शताब्दियां निकल जाती थीं। इसका अर्थ यह है कि भारत में उस समय चिकित्सा विज्ञान और रोग निदान तथा शरीर को बीमारियों से पीड़ित न होने देने के लिए बहुत शानदार व्यवस्था थी। शरीर को रोगमुक्त बनाए रखने की कला ही अधिक समय तक जीवित रहना संभव बना सकती है। मृत्यु पर वश न हो, पर स्वस्थ रहकर जीवन जीना अपने हाथ में है। वैज्ञानिक इसी बात पर शोध कर रहे हैं कि कैसे इंसान मृत्यु पर विजय तो नहीं लेकिन उसे एक स्वाभाविक प्रक्रिया बना सकता है। इसका अर्थ यह है कि यदि विज्ञान कैंसर, अल्जाइमर, हृदय रोग या वृद्धावस्था से जुड़ी पीड़ा कम करता है, तो यह मानव कल्याण है। कुछ शोधों का उद्देश्य है :
-कोशिकाओं की हानि पहुंचने की गति धीमी करना।
-मस्तिष्क को नुकसान से बचाना।
-रोगों से लडऩे की क्षमता बढ़ाकर शरीर को युवा बनाए रखना।
-उम्र से जुड़ी बीमारियों को टालना।
उद्देश्य यह है कि सिर्फ लंबी उम्र नहीं, बल्कि सक्रिय उम्र, जहां 80 वर्ष का व्यक्ति भी 50 जैसा स्वस्थ रह सके। कुछ लोगों का मानना है कि यदि मृत्यु देर से होती है और मनुष्य स्वस्थ बना रहता है तो खाने-पीने के संकट से लेकर रोजग़ार और सब से बड़ा यह है कि पीढिय़ों का टकराव एक भीषण समस्या बन जाएगा। इसी के साथ यदि राजनीतिक या आॢथक रूप से शक्तिशाली लोग दशकों तक जीवित और प्रभावशाली रहें, तो नई पीढ़ी के लिए अवसर सीमित हो सकते हैं। प्रश्न यह भी है कि यदि मृत्यु बहुत दूर चली जाए, तो क्या जीवन के उद्देश्य बदल जाएंगे? भारतीय परम्परा में ‘दीर्घायु’ की कामना है-‘शतायु भव’, अर्थात लंबा जीवन तब तक मूल्यवान है जब तक वह संतुलित, उपयोगी और नैतिक हो।
उम्र बढऩा नहीं, अस्वस्थ बुढ़ापा समस्या : मनुष्य सदियों से अधिक जीने की कामना करता आया है। कभी तपस्या से, कभी आयुर्वेद से, कभी विज्ञान से और अब आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी से। दुनिया भर में उम्र बढ़ाने, बुढ़ापा धीमा करने और जीवन को लंबा करने पर शोध हो रहा है। परंतु असली प्रश्न यह नहीं कि मनुष्य कितने वर्ष जी सकता है, बल्कि यह कि वह कैसे जी रहा है। यदि जीवन केवल सांसों की संख्या बनकर रह जाए, यदि बढ़ती उम्र के साथ शरीर अशक्त, मन अकेला, जेब खाली और समाज उपेक्षित कर दे, तो ऐसी लंबी आयु वरदान नहीं, कई बार बोझ बन जाती है। सच यही है कि लंबी उम्र से अधिक महत्वपूर्ण स्वस्थ, शिक्षित, सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन है। प्रकृति ने उम्र बढऩे पर कोई पाबंदी नहीं लगाई। चिकित्सा विज्ञान भी अब जीवनकाल बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। लेकिन यदि समाज शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था नहीं करेगा, तो बढ़ती उम्र एक गंभीर मानवीय संकट बन सकती है।
एक व्यक्ति, जिसने जीवन भर परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए योगदान दिया, यदि वही बुजुर्ग इलाज के लिए दर-दर भटके, पैंशन या आॢथक सुरक्षा से वंचित हो, परिवार पर ‘बोझ’ समझा जाए, मानसिक अवसाद और अकेलेपन में जिए तो यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि सामाजिक विफलता है। ऐसी स्थिति सचमुच जीते जी मर जाने जैसी है। यदि व्यक्ति को कम उम्र से ही यह सिखाया जाए कि स्वास्थ्य कैसे बनाए रखें, भोजन कैसा हो, व्यायाम क्यों जरूरी है, मानसिक संतुलन कैसे रखें और सबसे जरूरी यह कि अपनी कमाई की व्यवस्था ऐसी करें कि कभी किसी के सामने हाथ फैलाने या कुछ मांगने की नौबत न आए। यदि इसका ध्यान जवानी में ही रख लिया गया तो बुढ़ापा अचानक आने वाली विपत्ति नहीं, बल्कि तैयारी के साथ आने वाला जीवन चरण बन सकता है। जब बुजुर्ग व्यक्ति अपनी जमा पूंजी दवाओं, ऑप्रेशन और अस्पतालों में खो देता है, तब बीमारी केवल शरीर नहीं तोड़ती, पूरा परिवार आॢथक और मानसिक रूप से टूट जाता है। इसलिए, यदि स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ और किफायती नहीं होंगी, तो बढ़ती उम्र सामाजिक संकट बन जाएगी, जो अंतत: सरकार के लिए एक चुनौती बन जाएगी।
लंबी उम्र बनाम उपयोगी उम्र : लक्ष्य केवल उम्र बढ़ाना नहीं बल्कि सेहतमंद जीवन होना चाहिए। व्यक्ति अधिक समय तक चले-फिरे, मानसिक रूप से सक्रिय रहे, आॢथक रूप से सुरक्षित रहे और सामाजिक रूप से उसका आदर-सम्मान कायम रहे क्योंकि बिस्तर पर पड़े 20 अतिरिक्त वर्ष किसी उपलब्धि का प्रमाण नहीं, यह सरकार की विफलता है। सबसे बड़ा प्रश्न है कि यदि विज्ञान हमें 100-150 या 200 वर्ष जीने की क्षमता दे दे लेकिन समाज हमें 60-70 के बाद अप्रासंगिक मान ले, तो इसका क्या उत्तर है? अंतिम सत्य यही है कि लंबी उम्र प्रकृति दे सकती है, स्वस्थ उम्र विज्ञान दे सकता है लेकिन सम्मानजनक उम्र केवल परिवार और समाज दे सकता है। जिस दिन हम यह समझ जाएंगे, उस दिन बुढ़ापा बोझ नहीं, अनुभव, गरिमा और सभ्यता की पहचान बनेगा।-पूरन चंद सरीन