Edited By ,Updated: 14 May, 2026 04:05 AM

यह देखकर बहुत दुख और परेशानी होती है कि युवा माता-पिता अपने छोटे बच्चों को मोबाइल डिवाइस छीन लिए जाने पर रोते हुए देखकर खुश होते हैं या इस बात का गर्व करते हैं कि उनके बच्चे खुद से बेहतर तरीके से डिवाइस चलाना जानते हैं।
यह देखकर बहुत दुख और परेशानी होती है कि युवा माता-पिता अपने छोटे बच्चों को मोबाइल डिवाइस छीन लिए जाने पर रोते हुए देखकर खुश होते हैं या इस बात का गर्व करते हैं कि उनके बच्चे खुद से बेहतर तरीके से डिवाइस चलाना जानते हैं। कई युवा माताएं बच्चों को शांत करने या उन्हें व्यस्त रखने के लिए मोबाइल फोन सौंपना या टैलीविजन सैट ऑन करना पसंद करती हैं। यह सब उन स्पष्ट मैडीकल सलाह के बावजूद किया जाता है जो ऐसे उपकरणों के आदी बच्चों की न केवल आंखों पर बल्कि संपूर्ण शारीरिक विकास पर पडऩे वाले हानिकारक प्रभाव के बारे में बताती है। मोबाइल फोन तक बिना किसी रोक-टोक पहुंच के सबसे गंभीर परिणामों में से एक है पर्याप्त नींद की कमी क्योंकि बच्चे वीडियो गेम या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जाल में फंस जाते हैं। नींद की कमी, बदले में, उनकी एकाग्रता को प्रभावित करती है और खराब शैक्षणिक प्रदर्शन की ओर ले जाती है।
जाहिर है, स्क्रीन पर स्क्रॉल करने में बिताया गया लंबा समय भी खराब सामाजिक कौशल की ओर ले जाता है। अपने दोस्तों और साथियों के साथ समय बिताने की बजाय, ये बच्चे अपर्याप्त सामाजिक कौशल के साथ बड़े होते हैं और उनमें आत्मविश्वास की कमी होती है।
लगभग 1.5 अरब नागरिकों की आबादी के लिए भारत में अब 1.2 अरब से अधिक सक्रिय सिम कार्ड हैं। आधिकारिक स्रोतों के अनुसार, 80 प्रतिशत से अधिक भारतीय अब मोबाइल फोन के सक्रिय उपयोगकत्र्ता हैं। दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाला देश होने के कारण, भारत दुनिया में शीर्ष तीन मोबाइल फोन उपयोगकत्र्ताओं में से एक होगा।
युवा पीढ़ी के लिए गंभीर चुनौती : मोबाइल फोन पर ऐप्स की तेजी से बढ़ती लत और आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस (ए.आई.) का बढ़ता उपयोग युवा पीढ़ी के लिए एक गंभीर चुनौती और साथ ही एक अवसर भी है। जाहिर है कि किसी भी बच्चे को तकनीक से अछूता नहीं रखा जा सकता है, लेकिन इसके हानिकारक प्रभावों से निपटना होगा और इस स्थिति से कैसे निपटा जाए, यह एक ऐसा सवाल है जो दुनिया भर में व्यापक रूप से पूछा जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला देश था जिसने विभिन्न वैबसाइटों तक पहुंच के लिए न्यूनतम आयु लागू करने के लिए कानून बनाया। शायद यह कानून भारत सहित अन्य देशों में भी इसी तरह के हस्तक्षेप का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। अपने नए कानून के तहत, इंस्टाग्राम, यू-ट्यूब और स्नैप चैट जैसे प्लेटफॉर्म को 16 साल से कम उम्र के उपयोगकत्र्ताओं के दस लाख से अधिक अकाऊंट को ब्लॉक करने के लिए कहा गया है। इस कानून की तकनीकी कंपनियों ने आलोचना की है लेकिन माता-पिता और शिक्षकों ने इसका समर्थन किया है।
‘ऑनलाइन सेफ्टी अमैंडमैंट (सोशल मीडिया मिनिमम एज) एक्ट’ नामक नए कानून के तहत, आयु-प्रतिबंधित प्लेटफार्मों से अपेक्षा की जाएगी कि वे 16 वर्ष से कम उम्र के लोगों के मौजूदा अकाऊंट का पता लगाने के लिए ‘उचित’ कदम उठाएं और उन अकाऊंट को निष्क्रिय या हटा दें, उन्हें नए अकाऊंट खोलने से रोकें, जिसमें उन उपायों पर रोक लगाना भी शामिल है जो 16 वर्ष से कम उम्र के लोगों को प्रतिबंधों को दरकिनार करने की अनुमति दे सकते हैं। यदि कोई गलती से प्रतिबंधों से छूट जाता है या उसमें शामिल हो जाता है, तो प्लेटफार्मों को त्रुटियों को ठीक करने के लिए प्रक्रियाएं भी अपनाने की आवश्यकता है, ताकि किसी के अकाऊंट को अनुचित तरीके से हटाया न जाए।
स्थिति से निपटने के लिए कई तरीकों पर विचार : जबकि विभिन्न देश इस स्थिति से निपटने के तरीकों पर विचार कर रहे हैं, वे ऑस्ट्रेलियाई सरकार द्वारा उठाए गए कदमों के परिणाम पर भी बारीकी से नजर रख रहे हैं। कुछ देशों ने स्कूलों में मोबाइल फोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है, जबकि अन्य ने सामग्री प्रदान करने वाले देशों से नाबालिगों को अपनी सामग्री तक पहुंचने से रोकने के लिए कहा है। भारत सरकार ने अब तक समस्या से सक्रिय रूप से निपटने से परहेज किया है, हालांकि इसने कुछ वैबसाइटों पर 18 वर्ष से कम उम्र के लोगों को सदस्यता प्रदान करने पर प्रतिबंध लगा दिया है। हालांकि, स्पष्ट नियमों और सख्त दंडों की कमी के कारण इस निर्देश का भी उल्लंघन किया जाता है। कुछ राज्यों ने स्कूल के घंटों के दौरान उपयोग पर प्रतिबंध लगाने जैसे मोबाइल फोन के उपयोग को रोकने के लिए भी उपाय किए हैं। हालांकि, यह केवल केंद्र सरकार ही है जो देश भर में लागू होने वाले कदम उठा सकती है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ज्ञान के प्रसार के लिए मोबाइल उपकरणों और नई तकनीक तक पहुंच भी महत्वपूर्ण है।
मूल प्रश्न यह है कि तकनीक द्वारा दिए जा रहे अपार लाभों से छात्रों को वंचित किए बिना मोबाइल उपकरणों के अत्यधिक और अनुत्पादक उपयोग को कैसे रोका जाए। मोबाइल फोन के अत्यधिक और अनुत्पादक उपयोग और आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस के बढ़ते प्रभाव से संबंधित चुनौतियों को सरकार के साथ-साथ माता-पिता के संयुक्त प्रयासों से अवसरों में बदला जाना चाहिए। यह अनिवार्य है कि माता-पिता भी नवीनतम तकनीक से अवगत रहें और अपने बच्चों को मार्गदर्शन करने में सक्षम होने के लिए विकसित हो रही दुनिया के साथ तालमेल बिठाएं। साथ ही, सरकार के साथ-साथ निजी क्षेत्र को भी मोबाइल फोन, गेम्स और ए.आई. के उपयोग पर युवा स्कूली छात्रों के संवेदीकरण को सुनिश्चित करना चाहिए ताकि बच्चे इसके हानिकारक परिणामों से पीड़ित होने की बजाय तकनीक का लाभ उठाने की ओर निर्देशित हों।-विपिन पब्बी