शरद पवार का सुझाव देश के हित में है

Edited By Updated: 28 May, 2026 03:50 AM

sharad pawar s suggestion is in the interest of the country

शरद पवार ने देश की विदेश नीति पर आंतरिक राजनीतिक व्यवहार के संदर्भ में जो कुछ कहा है उस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। उन्होंने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत के बाहर देश की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए काम कर रहे हैं। हमारे राजनीतिक विचार...

शरद पवार ने देश की विदेश नीति पर आंतरिक राजनीतिक व्यवहार के संदर्भ में जो कुछ कहा है उस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। उन्होंने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत के बाहर देश की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए काम कर रहे हैं। हमारे राजनीतिक विचार अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन जब देश के सम्मान की बात आती है तो राजनीतिक मतभेदों को बीच में नहीं लाना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 5 दिवसीय विदेश यात्रा पर भारत के अंदर राजनीतिक व गैर-राजनीतिक मोर्चे पर हो रही टिप्पणियों के संदर्भ में उनका यह मंतव्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त अरब अमीरात से आरंभ कर स्वीडन, नीदरलैंड, नॉर्वे और इटली की द्विपक्षीय यात्रा की तथा नार्वे की राजधानी ओस्लो में स्कैंडिनेवियाई भारत शिखर सम्मेलन में शामिल हुए। 

प्रधानमंत्री के समक्ष अपने राष्ट्रीय हित को साधने का उद्देश्य था और इन यात्राओं पर विशेषज्ञों का मत यही है कि उसमें उन्हें अधिकतम सफलता मिली। किंतु राजनीतिक और गैर-राजनीतिक एक्टिविज्म और सोशल मीडिया पर उनके विदेश में रहते हुए ही हमले शुरू हो गए। सारे हमलों व आलोचनाओं के हल्ला बोल में ऐसा एक तथ्य सामने नहीं आया जिसमें बताया गया हो कि अमुक बिंदू पर प्रधानमंत्री ने अपने राष्ट्रीय हित के अनुकूल काम नहीं किया। जाहिर है कि विरोध केवल राजनीतिक मतभेदों और असहमतियों के इर्द-गिर्द था। यह चिंताजनक है क्योंकि भारत की भौगोलिक सीमाओं के अंदर की राजनीतिक असहमतियां और मतभेद सीमाओं से बाहर चला जाए तो राष्ट्रीय हित प्रभावित होता है। इसका अर्थ है कि हम देश हित को प्राथमिकता देने की जगह अपने राजनीतिक, व्यक्तिगत हित को प्राथमिकता दे रहे हैं या फिर हमारा वैचारिक दुराग्रह हावी है।

ऐसा नहीं है कि पवार की मोदी से पूरी तरह सहमति है। महाराष्ट्र में आज शरद पवार की राकांपा शक्तिहीन है तो इसी कारण क्योंकि स्वर्गीय अजीत पवार ने विद्रोह कर भाजपा से हाथ मिला लिया। बावजूद हमारी पारंपरिक राजनीति, जिसका प्रतिनिधित्व करने वाले गिने-चुने नेता रह गए हैं, में यही व्यवहार लंबे समय तक रहा है। देश में हमारी असहमति होती है, आरोप-प्रत्यारोप करते हैं लेकिन जब विदेशों की, अंतर्राष्ट्रीय मंच की बात आती है तो देश साथ खड़ा होता है। अंतर्राष्ट्रीय मंच पर या विदेश में प्रधानमंत्री किसी राजनीतिक दल का नहीं भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं। वहां केवल राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए। एक भारतवासी के नाते इस समय हमारा उद्देश्य क्या होना चाहिए। पश्चिम एशिया संकट यानी ईरान-अमरीका-इसराईल टकराव और तनाव ने ईंधन आपूर्ति में उथल-पुथल पैदा कर दी है। होर्मुज जलडमरूमध्य की खतरनाक नाकेबंदी से निपटना विश्व के लिए मुश्किल हो रहा है। इसमें पैट्रोल-डीजल आदि के लिए आयात पर निर्भर भारत या अन्य देशों के लिए दूरगामी दृष्टि से आपूर्ति की सुनिश्चित व्यवस्था करना, देशों के संबंधों में हो रहे बदलावों के साथ सामंजस्य स्थापित करना या अस्थिरता के काल में उसका आधार बनाते रहना तथा भविष्य में बनने वाले अंतर्राष्ट्रीय समीकरणों की दृष्टि से ऐसी स्थिति में होना ताकि देश के रूप में हम कहीं अलग-थलग न पड़ें। 

प्रधानमंत्री की यात्रा में यही लक्ष्य समाहित होंगे। इन सबमें यहां विस्तार से जाने की आवश्यकता नहीं। आप चाहे भाजपा सरकार के विरोधी हों या समर्थक दृष्टि एक ही होनी चाहिए कि प्रधानमंत्री की यात्राओं के दौरान उन देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय और प्रतिनिधिमंडलों की बातचीत, संयुक्त घोषणाओं तथा संपन्न समझौतों में क्या-क्या हुआ। जब आप गहराई से उन सबको देखेंगे तो आपका विचार अपने आप बदल जाएगा। दुर्भाग्य से हम उन पर सरसरी दृष्टि भी डालना नहीं चाहते। इस यात्रा में स्वीडन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया और काम करने वाली पत्रकार और कार्टून छापने वाले अखबार के देश नॉर्वे ने भी। संयुक्त राष्ट्र संघ की खाद्य और कृषि संगठन ने प्रधानमंत्री को विशेष रूप से सम्मानित किया। इन सब पर चर्चा की जगह हमारे यहां टॉफी वीडियो को लेकर ऐसी टिप्पणियां की जा रही हैं जिनमें कई को देखने सुनने या पढऩे में शर्म आए। भारत जैसे देश में विमर्श का यह स्तर किसी को भी अंदर से परेशान कर देगा।

क्या हम ऐसा करते समय विचार भी नहीं करते कि एक देश के रूप में विदेश में हमारी कैसी छवि बनेगी। यहीं पर शरद पवार का यह कथन प्रासंगिक हो जाता है कि जब भी राष्ट्रीय हित के लिए सामूहिक रूप से काम करने का मौका मिले तो सभी को एक सांझा उद्देश्य के साथ जुडऩा चाहिए और देश की प्रतिष्ठा मजबूत करने में मदद करनी चाहिए। कोई भी प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री देश के बाहर होते हैं तो अपने दृष्टिकोण से वह देश के भविष्य और सम्मान को ही केंद्र में रखते हैं। कई बार इनमें गलतियां भी हुई हैं। आज के दौर के अनुसार उनकी आलोचना भी अस्वाभाविक नहीं है किंतु आलोचना तथ्यों के आधार पर होगी। आखिर जॉर्जिया मेलोनी को मैलोडी ट्रॉफी भेंट करने से हमारी राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को कैसे नुकसान पहुंचा। 

कूटनीति में एक सामान्य वस्तु का उपयोग कर माहौल बदल देना, दुनिया को संदेश देना और उन्हें अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में परस्पर व्यवहार का रास्ता दिखा देना सामान्य बात नहीं है। भारत ने अपने लक्ष्य के अनुरूप यात्रा से सारी उपलब्धियां हासिल कीं जिसकी ओर तत्काल दृष्टि थी। दूसरे देश भी अपने हित के अनुसार काम कर रहे थे। पर मूल बात यह है कि हम एक राष्ट्र के रूप में कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। शरद पवार जैसे वरिष्ठ नेता अब ज्यादा उपलब्ध नहीं हैं कि सामने आकर रास्ता दिखाएं। ज्यादातर जा चुके हैं। हमें ही अपने हर व्यवहार पर राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देकर स्वयं को बदलना होगा।- अवधेश कुमार
 

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