Edited By Niyati Bhandari,Updated: 28 Jul, 2026 02:43 PM
Guru Purnima 2026: जानें, साल 2026 में कब है गुरु पूर्णिमा। गजकेसरी और सर्वार्थ सिद्धि योग में गुरु पूजा का शुभ मुहूर्त, महत्व और महर्षि वेदव्यास के जन्म की कथा।
Guru Purnima 2026: आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा अथवा व्यास पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। इस बार ये पावन दिन बेहद खास होने जा रहा है क्योंकि ग्रहों की स्थिति एक नहीं, बल्कि 3 दुर्लभ शुभ योगों का महासंगम बनाने जा रही है, जो साधकों के लिए सिद्धि और सौभाग्य के द्वार खोलने वाला है।
कब है गुरु पूर्णिमा 2026?
पंचांग गणना के अनुसार, साल 2026 में आषाढ़ पूर्णिमा का आरंभ 28 जुलाई 2026 की सांय 6 बजकर 18 मिनट पर होगा और इसका विश्राम 29 जुलाई 2026 की रात 8 बजकर 5 मिनट पर होने जा रहा है। उदयातिथि को ध्यान में रखते हुए गुरु पूर्णिमा का पर्व 29 जुलाई 2026, बुधवार को मनाया जाएगा।

इन 3 दुर्लभ योगों में मनाई जाएगी गुरु पूजा
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से इस बार आषाढ़ माह की पूर्णिमा पर ग्रहों का अद्भुत संयोग बन रहा है, जो इसे और भी फलदायी बना रहा है:
गजकेसरी योग: गुरु और चंद्रमा की विशेष स्थिति से बनने वाला यह योग मान-सम्मान और पद-प्रतिष्ठा में वृद्धि दिलाता है।
सर्वार्थ सिद्धि योग: जैसा कि नाम से स्पष्ट है, इस योग में किया गया कोई भी शुभ कार्य, मंत्र जाप या दान निश्चित रूप से सफलता प्रदान करता है।
रवि योग: यह योग जीवन की नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट कर सकारात्मकता और सूर्य जैसी तेजस्विता प्रदान करता है।
स्नान-दान और पूजन का शुभ मुहूर्त
गुरु पूर्णिमा पर पवित्र नदियों में स्नान और सामर्थ्य अनुसार दान का विशेष महत्व है।
पूजन का श्रेष्ठ समय: 29 जुलाई की सुबह 5 बजकर 41 मिनट से लेकर 9 बजकर 5 मिनट तक रहेगा। इस समय में की गई गुरु वंदना विशेष फल प्रदान करेगी।
आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को भगवान विष्णु के 9वें अवतार भगवान वेद व्यास का जन्म हुआ था। इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा या गुरु पूर्णिमा कहते हैं। यह गुरु पूजा करने का दिवस है, गुरु के प्रति आस्था, श्रद्धा और समर्पण का महापर्व है। गुरु की पूजा करके हम उस ‘साक्षात परब्रह्म’ का ही पूजन करते हैं जो सर्वेश्वर है। गुरु स्वयं ईश्वर है, परम सत्य है। वह हमारा रक्षक है, मार्गद्रष्टा है।
गुरु पूर्णिमा क्यों कहलाती है व्यास पूर्णिमा?
महर्षि वेदव्यास का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को लगभग 3000 ई. पूर्व में हुआ था। उनके सम्मान में ही हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। वेद, उपनिषद और पुराणों का प्रणयन करने वाले वेद व्यास जी को समस्त मानव जाति का गुरु माना जाता है। बहुत से लोग इस दिन व्यास जी के चित्र का पूजन और उनके द्वारा रचित ग्रंथों का अध्ययन करते हैं।
गुरु को गोविंद से भी बड़ा कहा गया है। गुरु की पूजा कर हम अपने अत्यल्प ‘स्व’ को उसकी सर्वसमर्थ सत्ता में समर्पित अथवा विसर्जित कर देते हैं। पुष्पदंत विरचित ‘शिवमहिम्रस्तोत्रम’ के अनुसार गुरु से बढ़कर कोई तत्व नहीं है, ‘नास्ति तत्वं गुरो: परम्।’ भगवान वेदव्यास का जन्म एक द्वीप पर होने से ये ‘द्वैपायन’ और रंग काला होने के कारण ‘कृष्ण’ अर्थात कृष्णद्वैपायन कहलाए। इनका अवतार धर्म की रक्षा के लिए हुआ। इन्होंने अद्भुत शाश्वत धार्मिक साहित्य की रचना पर मानव जाति को ज्ञान और भक्ति का मार्ग दिखलाया। वस्तुत: हमारा सम्पूर्ण साहित्य ही ‘व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्व’ कहा गया है।
कैसे करें गुरु का पूजन?
गुरु पूर्णिमा के दिन केले की पूजा, व्रत एवं जो अपने गुरु की पाद पूजा करता है, उसे वर्ष के दौरान सारे कर्मों में सफलता मिलती है। गुरु पूर्णिमा के दिन पितृ दोष, गुरुदोष एवं गृह-क्लेश निवारण के लिए हरिद्वार, कुरुक्षेत्र, पुष्कर (राजस्थान), पिहोवा, गया (बिहार), प्रयाग, शिरडी, गोवर्धन इत्यादि तीर्थ स्थानों में सूर्योदय से एक घंटा पहले स्नान करके भगवान सत्यनारायण जी की कथा व सद्गुरु एवं भगवान विष्णु जी की पूजा, दान व भजन आदि का विशेष महत्व होता है। तीर्थों के सेवन व गुरु पूजा, ब्राह्मण, कुल पुरोहित व साधु की सेवा व भजन आदि का विशेष महत्व होता है। पाप भस्म होते हैं एवं मन की मुराद पूरी होती है।
