‘सोशल मीडिया’ जानकारी के प्रमुख स्रोत के रूप में उभरा!

Edited By Updated: 23 Jul, 2026 04:27 AM

social media emerged as a major source of information

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो क्लिप में दिल्ली में छात्रों के विरोध प्रदर्शन के दौरान एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को बिना किसी उकसावे के एक युवा लड़की को जोर से थप्पड़ मारते हुए देखा जा सकता है। एक अन्य क्लिप में एक पुलिसकर्मी को एक लड़की का यौन...

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो क्लिप में दिल्ली में छात्रों के विरोध प्रदर्शन के दौरान एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को बिना किसी उकसावे के एक युवा लड़की को जोर से थप्पड़ मारते हुए देखा जा सकता है। एक अन्य क्लिप में एक पुलिसकर्मी को एक लड़की का यौन उत्पीड़न करते हुए दिखाया गया है। एक और वीडियो में सादे कपड़ों में डंडे लिए हुए पुरुष दिखाई दे रहे हैं। इसके अलावा, एक ऐसा वीडियो भी है, जिसमें पुलिसकर्मी खुद ही एक पुलिस वाहन को पलट रहे हैं ताकि उसका दोष प्रदर्शनकारियों पर मढ़ा जा सके। ऐसे कई अन्य वीडियो चल रहे हैं, जिनमें पुलिस की बर्बरता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।

इनमें से कोई भी वीडियो या तस्वीरें किसी भी राष्ट्रीय टैलीविजन चैनल पर नहीं दिखाई गईं और न ही मुख्यधारा के मीडिया में प्रकाशित हुईं। ‘कॉक्रोच जनता पार्टी’ के नेतृत्व में छात्रों द्वारा किए जा रहे विरोध प्रदर्शनों की इलैक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा कवरेज ने उसकी विश्वसनीयता को गहरा आघात पहुंचाया है और इसने सोशल मीडिया के एक अधिक विश्वसनीय और पारदर्शी सूचना स्रोत के रूप में विकसित होने को चिह्नित किया है।

विजुअल मीडिया के अंतर्निहित लाभ को देखते हुए, देश में मीडिया की स्थिति पर कोई भी बात वास्तव में टैलीविजन समाचारों पर ही केंद्रित रहती है। हालांकि, वर्षों से अपनी स्पष्ट रूप से सरकार समर्थक कवरेज के कारण इसे ‘गोदी मीडिया’ का नाम मिला है, सोमवार को संसद भवन की ओर छात्रों के मार्च के दौरान इसके खिलाफ सार्वजनिक आक्रोश फूट पड़ा। जब से कॉक्रोच जनता पार्टी ने दिल्ली में अपना विरोध प्रदर्शन शुरू किया है, जिसमें लद्दाख के जलवायु कार्यकत्र्ता सोनम वांगचुक द्वारा शुरू किया गया अनिश्चितकालीन उपवास भी शामिल है, लगभग पूरे मुख्यधारा के मीडिया ने इस विरोध को कम करके दिखाया है। जहां दिल्ली स्थित किसी भी टी.वी. चैनल ने इस आंदोलन के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा, वहीं राजधानी के अधिकांश समाचार पत्रों ने भी इस खबर को अपने मुख्य पृष्ठों से दूर रखा।

सूचना के उस बड़े अंतर को सोशल मीडिया ने भरा, जिसमें नागरिक पत्रकार भी शामिल थे, जिन्होंने दृश्यों को खुद बोलने दिया क्योंकि दिनों के साथ आंदोलन के लिए समर्थन बढ़ता गया। केवल मोबाइल फोन लेकर रिपोॄटग करने वाले कई युवा पत्रकारों ने विरोध स्थल से लगातार रिपोॄटग की। एक अग्रणी राष्ट्रीय अंग्रेजी समाचार पत्र ने अपनी मुख्य हैडलाइन में विरोध मार्च के दौरान छात्रों और पुलिसकर्मियों पर लाठीचार्ज या चोटों का कोई उल्लेख नहीं किया, जिसमें केवल यह उल्लेख किया गया था कि पुलिस ने संसद का घेराव करने के एक प्रयास को विफल कर दिया और छात्रों का एक प्रतिनिधिमंडल केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा से मिला। कई अन्य समाचार पत्रों ने पुलिस लाठीचार्ज की बजाय छात्रों द्वारा पत्थर फैंकने की तस्वीरें दिखाईं। यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार ने विरोध प्रदर्शनों को खिंचने दिया और एक महीने से अधिक समय से विरोध कर रहे छात्रों तक नहीं पहुंची। शायद सरकार ने सोचा होगा कि यह विरोध, जो प्रतियोगी या प्रवेश परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों के बार-बार लीक होने के खिलाफ ऑनलाइन शुरू हुआ था, अपने आप शांत हो जाएगा। हालांकि, यह बढ़ता रहा और अब कई शहरों में फैल गया है।

यह विरोध स्वाभाविक रूप से बढ़ा और इस बात का कोई संकेत नहीं था कि युवाओं के बीच बढ़ते असंतोष के पीछे कोई राजनीतिक दल था। सरकार को अपनी प्रतिष्ठा पर अड़े नहीं रहना चाहिए था और इसे नजरअंदाज करना जारी नहीं रखना चाहिए था। यदि सरकार ने प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ बातचीत शुरू की होती, तो छात्रों और आम जनता की नजरों में सरकार का सम्मान और बढ़ जाता। लेकिन सोशल मीडिया की भूमिका पर वापस आएं तो यह कहना होगा कि यह परिपक्व हो गया है। इसकी पहुंच अब टी.वी. समाचार चैनलों से कहीं अधिक है, जिन्होंने अपनी सारी विश्वसनीयता खो दी है। अब पुलिस या अन्य सुरक्षा एजैंसियों के लिए ज्यादतियों से बच निकलना बहुत मुश्किल होगा। लेकिन सावधानी बरतने की भी जरूरत है। नागरिक पत्रकारिता हमेशा जिम्मेदार या सही नहीं हो सकती।

आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस (ए.आई.) के इस युग में कभी-कभी यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि क्या वास्तविक है और क्या गलत। हालांकि, प्रदर्शनकारियों द्वारा कैद किए गए बिना संपादित दृश्यों ने वह सब उजागर कर दिया है, जिसे मुख्यधारा के मीडिया द्वारा छुपाया जा सकता था या हो सकता है कि उनके पास ऐसी सभी कार्रवाइयों को कैद करने के संसाधन न हों। सरकार के लिए यह बेहतर होगा कि वह पुलिस द्वारा की गई सभी ज्यादतियों का संज्ञान ले, जिसमें सादे कपड़ों में लाठी लिए पुलिसकर्मी भी शामिल हैं और सुनिश्चित करे कि दोषियों को सजा मिले। सूचना प्रौद्योगिकी और मोबाइल फोन की शक्ति के इस युग में, किसी भी सरकार के लिए किसी भी ज्यादती को छुपाना मुश्किल होगा।-विपिन पब्बी 

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