समाज को ईमानदार और स्वच्छ छवि वाले राजनीतिज्ञों व अधिकारियों की जरूरत

Edited By Updated: 27 Sep, 2026 04:15 AM

society needs honest and clean image politicians and officials

भारत के प्रथम गृहमंत्री व उपप्रधानमंत्री, जिन्हें लौह पुरुष के नाम से जाना जाता है तथा जिन्हें अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवाओं का स्टील फ्रेम माना जाता है, सरदार पटेल ने अपने संबोधन में कहा था कि प्रशासनिक अधिकारी भारत की रीढ़ की तरह होते हैं तथा...

भारत के प्रथम गृहमंत्री व उपप्रधानमंत्री, जिन्हें लौह पुरुष के नाम से जाना जाता है तथा जिन्हें अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवाओं का स्टील फ्रेम माना जाता है, सरदार पटेल ने अपने संबोधन में कहा था कि प्रशासनिक अधिकारी भारत की रीढ़ की तरह होते हैं तथा जिन्हें धैर्य, साहस, तटस्थता, ईमानदारी व बिना किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के कार्य करना चाहिए। यह मूलभूत बातें इन अधिकारियों के प्रशिक्षण में भी रटाई जाती हैं। मगर न जाने किन कारणों से देश के कुछ अधिकारी अपने नैतिक मूल्यों को त्याग कर राजनीतिज्ञों के पि_ू बनकर अपना कार्य लोभ-लालसा व पक्षपातपूर्ण रवैये के साथ करना शुरू कर देते हैं। 

अधिकतर अधिकारी अपनी मनचाही तैनाती व उन्नति पाने के लिए किसी सत्ता पक्ष के दल का दामन थाम लेते हैं तथा तटस्थ रहने की बजाय उस दल के अनुचित निर्देशों के प्रति वफादार होकर अपना कार्य करना आरंभ कर देते हैं। कई बार तो यह भी देखा गया है कि कुछ अधिकारी अपनी जाति, धर्म, गृह जिला-राज्य के आधार पर भी अपना कार्य करना शुरू कर देते हैं तथा स्टील फ्रेम  से जाने जाने वाले प्रशासन को खींच-खींचकर रबड़ की तरह लचीला बना देते हैं।ईमानदारी व तटस्थता से काम करने वाले चंद अधिकारियों को इधर-उधर भटकाया जाता है। संविधान व विभागीय नियमों के अंतर्गत ट्रांसफर, प्रोमोशन व दंड देने की शक्तियां इन अधिकारियों को उनके  रैंक के अनुसार प्रदान की गई हैं लेकिन अब तो यह सारा काम राजनीतिज्ञों ने अपने हाथ में ले लिया है तथा सिपाही, पटवारी व गार्ड तक के स्थानांतरण राजनीतिज्ञों की मर्जी के बिना नहीं किए जा सकते। अधिकारी तो राजनीतिज्ञों के महज ‘टूल’ बन चुके हैं।

विभागों में अनुशासनहीनता बढऩे का मुख्य कारण भी यही है, क्योंकि यदि किसी कर्मचारी की वाॢषक गोपनीय रिपोर्ट में कोई प्रतिकूल टिप्पणी कर भी दी जाए, तो वह भी राजनीतिज्ञों द्वारा अनुकूल कर दी जाती हैं। ऐसे हालातों में ईमानदार अधिकारी के पास 2 ही विकल्प रह जाते हैं-या तो वह सिस्टम के साथ घुल-मिल जाए या फिर इधर-उधर भटकने के लिए तैयार हो जाए। यही कारण है कि अधिकतर अधिकारी राजनीतिज्ञों के चमचे बन गए हैं, क्योंकि संस्था की स्वतंत्रता उनके पास नहीं रहने दी जाती। कितनी विडंबना है कि उच्च स्तर के अधिकारी, जो न जाने कितनी कठिन परीक्षा के माध्यम से अपने पद पर आसीन होते हैं, वे एक मैट्रिक पास राजनीतिज्ञ के तलवे चाटते रहते हैं। इस हालात के लिए यह अधिकारी वर्ग खुद भी जिम्मेदार है, क्योंकि वह मलाईदार पदों पर रहना चाहता है तथा अपने ही दूसरे साथी अधिकारी के अधिकारों का हनन करता रहता है। जब दोनों वर्गों की सांठ-गांठ हो जाती है, तब भ्रष्टाचार का नंगा नाच शुरू हो जाता है। टारगेट निर्धारित कर दिए जाते हैं तथा दोनों मिलकर सरकारी संपदा का शोषण करना आरंभ करना शुरू कर देते हैं। फिर चाहे अवैध माइनिंग हो, उद्योग का काला धंधा हो या फिर ठेकेदारी, सभी का तांडव शुरू हो जाता है। अंतत: जो धन गरीब व्यक्ति तक पहुंचना होता है, वह इन सभी के हाथों में चला जाता है।

वैसे तो जिले की कमांड करना एक आई.ए.एस. व आई.पी.एस. अधिकारी का अधिकार है, क्योंकि नियमों के अनुसार जिला कप्तानों के पद केवल इन्हीं अधिकारियों के लिए चिन्हित किए गए हैं। मगर देखा गया है कि जो कुछ अधिकारी राजनीतिज्ञों के इशारे पर नहीं चलते, उन्हें दूर-दराज जिलों में औपचारिकता के नाते एक-आध बार जिला कप्तान लगा दिया जाता है। मगर दूसरी तरफ जो अधिकारी उनके इशारों पर चलते हैं, वे एक बार नहीं, कई बार जिलों की कमांड करते हैं। प्रशासन और समाज पर इस सांठ-गांठ का गहरा प्रभाव पड़ता है। जब सरकार बदलती है तो पुराने गुट के अधिकारियों को साइड लाइन कर दिया जाता है तथा दूसरी टीम अपनी पारी खेलनी शुरू कर देती है। कुछ शातिर अधिकारी दोनों पक्षों को खुश रखते हैं तथा अपने पदों का भरपूर आनंद उठाते हैं। दूसरी तरफ ईमानदार अधिकारियों की कोई नहीं सुनता तथा वे मजबूरी में केंद्र की प्रतिनियुक्ति पर चले जाते हैं।

आज  है, जो सांठ-गांठ की बजाय निष्पक्षता व कर्मठता से काम करें तथा समाज को नई दिशा व दशा प्रदान कर सकें। भारतीय प्रशासन में दोनों के बीच संतुलित समन्वय होना अति आवश्यक है, क्योंकि अधिकारी अपनी योग्यता और अनुभव के आधार पर नीतियों का खाका बनाते हैं, जिस पर राजनीतिज्ञ अंतिम निर्णय लेते हैं। राजनीतिज्ञों को अपने पद की प्रतिष्ठा की तरफ पूर्ण ध्यान देना चाहिए तथा यदि वे ईमानदारी से काम करेंगे तो अधिकारी स्वत: उसी राह पर चलने के लिए मजबूर हो जाएंगे और देश उन्नति की राह पर चलेगा। यह ठीक है कि देश की आर्थिक समृद्धि 7.8 प्रतिशत तक पहुंच गई है, मगर यह वृद्धि तभी सार्थक होगी, जब असमानताएं कम होंगी तथा प्रत्येक क्षेत्र की गुणवत्ता में वृद्धि होगी व भ्रष्टाचार पर पूर्ण नियंत्रण रहेगा।-राजेंद्र मोहन शर्मा 
 

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