सपा को यू.पी. में दिख रहा अवसर, मुख्य ध्यान दलित वोट पर

Edited By Updated: 23 Sep, 2026 05:05 AM

sp sees opportunity in up focus on dalit vote

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कुछ महीने बाकी हैं, समाजवादी पार्टी (सपा) को एक अवसर दिख रहा है। सत्ता-विरोधी भावना, जेन जी की बढ़ती संख्या, लगातार बढ़ती बेरोजगारी, जातिगत समीकरणों में बदलाव और पार्टी के आकलन में, ऐसी परिस्थितियां पैदा हुई हैं जो...

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कुछ महीने बाकी हैं, समाजवादी पार्टी (सपा) को एक अवसर दिख रहा है। सत्ता-विरोधी भावना, जेन जी की बढ़ती संख्या, लगातार बढ़ती बेरोजगारी, जातिगत समीकरणों में बदलाव और पार्टी के आकलन में, ऐसी परिस्थितियां पैदा हुई हैं जो 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद सपा के लिए अनुकूल हैं। फिर भी, झिझक आंशिक रूप से पार्टी की चुनावी असुरक्षा से उत्पन्न होती है, विशेष रूप से एक ‘मुस्लिम-यादव’ पार्टी की धारणा से। अपने पारंपरिक समर्थन आधार से आगे बढऩे की कोशिश में, सपा अपने सामाजिक गठबंधन को व्यापक बनाने और अन्य जाति समूहों, विशेष रूप से दलितों और ओ.बी.सी. के वर्गों तक पहुंचने का प्रयास कर रही है।

कांग्रेस के साथ उसके गठबंधन को लेकर भी अनिश्चितता है। सपा के नेताओं का मानना है कि कांग्रेस के साथ चुनाव लडऩे से पार्टी का मुस्लिम वोटों का एकीकरण मुश्किल हो सकता है। साथ ही, केवल कांग्रेस के साथ जाने से पार्टी की स्थिरता सीमित हो सकती है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, दलितों के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिशों के बावजूद, 2024 के लोकसभा चुनावों में सपा के प्रदर्शन के बाद से उसे अभी भी एक विश्वसनीय गठबंधन की तलाश है। सपा नेताओं का कहना है कि स्थिति ‘अनुकूल’ है, क्योंकि 2024 में राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से 37 पर सपा के उम्मीदवार आगे रहे थे। कई मुद्दों पर राज्य सरकार से असहमति भी तेज हुई है। इस बीच, सी.एम. योगी आदित्यनाथ चुनावी मोड में आ चुके हैं और अखिलेश यादव ने भी एक आक्रामक अभियान शुरू करने का संकेत दिया है। 

दलितों तक पहुंच : सपा का मुख्य ध्यान दलित वोट पर है, जो पार्टी के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन भाजपा और बसपा के बीच विभाजित है। पार्टी ने हाल ही में दलितों के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं। अखिलेश ने कुछ समय पूर्व एक दलित के घर में भोजन किया और पार्टी के पारंपरिक लाल रंग की बजाय नीला कुर्ता पहने हुए भी दिखाई दिए, जो पार्टी के जिला और शहर अध्यक्षों की बैठक में एक संकेत के रूप में देखा गया। 

इस तरह से सपा की व्यापक रणनीति राज्य में दलितों के बीच अपनी उपस्थिति बढ़ाने की है, जिसका उद्देश्य अपने पी.डी.ए. (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) सामाजिक इंजीनियरिंग फॉर्मूले को मजबूत करना है। पार्टी ने दलित प्रतीकों का एक स्पष्ट आयाम भी हासिल किया है। सपा नेताओं ने बताया है कि नीला रंग, जो पारंपरिक रूप से बी.आर. आंबेडकर और दलित आंदोलन से जुड़ा है. सपा के दलित और लाल-हरे पैटर्न में दिखाई दे रहा है। सपा की रणनीति दलितों के बीच उपस्थिति बनाने और बसपा के वोट आधार में सेंध लगाने की है।

कार्यकत्र्ता प्रशिक्षण : सपा प्रमुख गोरखपुर, जो पूर्वी यू.पी. में एक महत्वपूर्ण केंद्र है, में पार्टी कार्यकत्र्ताओं के लिए 2 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम की भी योजना बना रहे हैं, जहां निषाद और ब्राह्मणों की महत्वपूर्ण उपस्थिति है। दोनों समुदायों को राजनीतिक रूप से प्रभावशाली माना जाता है और वे विभिन्न दलों के राजनीतिक दावों का केंद्र रहे हैं। समाजवादी पार्टी के प्रशिक्षण कार्यक्रम के अनुसार, पार्टी कार्यकत्र्ताओं को यह सिखाने की योजना है कि भाजपा को सत्ता में वापस आने से रोकने के लिए राजनीतिक रूप से क्या करना है?

अगला कदम : नवम्बर में वरिष्ठ सपा नेता और राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन के आगरा में एक दलित सम्मेलन का नेतृत्व करने की उम्मीद है, जो एक महत्वपूर्ण दलित आबादी वाले जिले में होगा। अखिलेश के इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि होने की संभावना है।
सपा की रणनीति का एक अन्य हिस्सा पार्टी के बूथ-स्तरीय संगठन को मजबूत करना और अपने सामाजिक गठबंधन को व्यापक बनाना है। पार्टी के नेताओं का कहना है कि उसे 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान मिली बढ़त को आगे बढ़ाना होगा और इसे 2027 तक बनाए रखना होगा। भाजपा के लिए चुनौती यह है कि उसे राजनीतिक जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है। पार्टी नेताओं का कहना है कि वह योगी आदित्यनाथ को एक ‘कट्टर ङ्क्षहदू’ के रूप में चित्रित करने से बचना चाहती है। पार्टी के भीतर कुछ लोगों का मानना है कि इस पर अत्यधिक ध्यान देने से भाजपा पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है, जो लगातार तीसरी बार सत्ता की राह देख रही है।-कृष्ण भनोट

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