Edited By ,Updated: 29 Jul, 2026 05:10 AM

‘झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए।’ दिल्ली की सड़कों पर 37 दिनों तक चले निर्भीक, मुखर और डिजिटल दौर के युवा आंदोलन ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि समान, गुणवत्तापूर्ण और सार्थक शिक्षा केवल एक नीति का विषय नहीं, बल्कि युवाओं का संवैधानिक अधिकार...
‘झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए।’ दिल्ली की सड़कों पर 37 दिनों तक चले निर्भीक, मुखर और डिजिटल दौर के युवा आंदोलन ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि समान, गुणवत्तापूर्ण और सार्थक शिक्षा केवल एक नीति का विषय नहीं, बल्कि युवाओं का संवैधानिक अधिकार है। कॉक्रोच जनता पार्टी के युवा कार्यकत्र्ताओं और सामाजिक कार्यकत्र्ता सोनम वांगचुक के नेतृत्व में चले इस आंदोलन ने राजधानी को झकझोर दिया। नीट प्रश्नपत्र लीक और उससे जुड़े जवाबदेही के अभाव ने सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया तथा अंतत: शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा।
देश के विभिन्न हिस्सों में शिक्षा सुधार की मांग गूंजने लगी। लेकिन इन मांगों का जवाब संवाद नहीं, बल्कि लाठीचार्ज, आंसू गैस, पैलेट गन, निर्मम पिटाई और भरोसे के टूटने के रूप में मिला। इतना ही नहीं, सर्वोच्च न्यायालय से भी प्रदर्शनकारियों को अपेक्षित राहत नहीं मिली। अदालत की टिप्पणियां थीं, ‘‘हमारा समय बर्बाद मत कीजिए। हमें वीडियो देखने में कोई रुचि नहीं है।’’ एक अन्य टिप्पणी थी, ‘‘हमें इसमें मत घसीटिए।’’ ऐसी प्रतिक्रियाओं ने भी युवाओं को निराश किया। प्रदर्शन स्थल की चश्मदीद गवाह होने से स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि वहां मौजूद युवा पुलिस की धमकियों से भयभीत नहीं थे। वे सरकार से कोई दान या कृपा मांगने नहीं आए थे। वे उस अधिकार की मांग कर रहे थे, जिसे वे संविधान द्वारा प्रदत्त अपना वैध अधिकार मानते हैं। ऐसा अधिकार, जिसे सत्ता की सुविधा के अनुसार दिया या छीना नहीं जा सकता।
सरकार ने इस पूरे घटनाक्रम को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या समझा और उसका समाधान बल प्रयोग में खोजा। दूसरी ओर विपक्ष ने इसे राजनीतिक अवसर के रूप में देखा। उसने प्रदर्शनकारियों के प्रति समर्थन जताया और इसे आगामी चुनावों का मुद्दा बनाने में कोई देर नहीं लगाई। आखिर राजनीति में घायल सरकार की गंध से अधिक तेजी से नेताओं को और क्या आकॢषत कर सकता है? राजनीति में हर संकट किसी न किसी के लिए अवसर बन जाता है। चौंकाने वाली बात यह रही कि लाठियों ने केवल प्रदर्शनकारियों की भीड़ को तितर-बितर नहीं किया, बल्कि उन्होंने उस पूरे राजनीतिक वर्ग की मानसिकता को भी उजागर कर दिया, जो युवाओं का स्वागत तब तक करता है, जब तक वे तालियां बजाते रहें लेकिन जैसे ही वे सवाल पूछते हैं, उन्हें असुविधा महसूस होने लगती है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक स्पष्ट संदेश दिया कि सरकार ने शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही की मांग का उत्तर संवाद से नहीं, बल्कि बल प्रयोग से दिया। इससे केवल सरकार की असहमति के प्रति असहजता ही उजागर नहीं हुई, बल्कि यह भी सामने आया कि पूरा राजनीतिक वर्ग जनाक्रोश को लोकतांत्रिक चेतावनी की बजाय चुनावी पूंजी के रूप में देखने लगा है। दुर्भाग्य यह है कि इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा पाखंड पुलिस कार्रवाई नहीं था, बल्कि उसके बाद नेताओं द्वारा नैतिकता का चोला ओढ़ लेना था। चुनावों से पहले रोजगार, पारदॢशता और अवसरों का वादा करने वाले वही नेता सत्ता में आने के बाद जनता की मांगों को चुनौती और अवज्ञा मानने लगते हैं। दरअसल सड़कों से जो सबसे बड़ा संदेश उभरकर सामने आया, वह यह कि आज का युवा उस राजनीति को अस्वीकार कर रहा है, जो अधिकारों को उपकार बनाकर प्रस्तुत करती है। वह उस राजनीतिक संस्कृति को भी चुनौती दे रहा है, जिसमें संवैधानिक अधिकारों को सत्ता की कृपा और जवाबदेही को वैकल्पिक गुण समझ लिया गया है।
इतिहास बताता है कि लाठी किसी भी भीड़ को तितर-बितर कर सकती है लेकिन उस विचार को कभी समाप्त नहीं कर सकती, जिसका समय आ चुका हो। राजनीतिक दोहरेपन की तस्वीर भी कम दिलचस्प नहीं है। जो कल पुलिस कार्रवाई का समर्थन कर रहे थे, सत्ता से बाहर होते ही लोकतांत्रिक अधिकारों के सबसे बड़े पैरोकार बन जाते हैं। और जो कल सरकारी दमन की आलोचना कर रहे थे, सत्ता में आते ही वही कदम उचित ठहराने लगते हैं। फिर भी इस आंदोलन ने सत्ता के लिए कुछ महत्वपूर्ण सबक छोड़े हैं। अब समय आ गया है कि शिक्षा को शासन और राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाया जाए। सरकार के कार्यकाल के 3 वर्ष अभी शेष हैं। ऐसे में आत्मप्रशंसा में डूबे रहने की बजाय उसे युवाओं की आवाज सुननी चाहिए। इतिहास तय करेगा कि सरकार और न्यायपालिका इस चेतावनी को समय रहते समझ पाए या फिर जैनरेशन जैड स्वयं परिवर्तन का अगला अध्याय लिखेगी।
परीक्षा प्रश्नपत्र लीक करने वालों के विरुद्ध कठोर कानून बनाना निश्चित रूप से आवश्यक है लेकिन वास्तविक सुधार के लिए परीक्षा प्रणाली की पूरी संरचना और संचालन व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन करना होगा। इसके साथ-साथ शिक्षा व्यवस्था का भी व्यापक पुनर्गठन आवश्यक है, क्योंकि देश तेजी से कृत्रिम बुद्धिमता (ए.आई.) के युग में प्रवेश कर रहा है। शिक्षा को केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि रोजगार और भविष्य की आवश्यकताओं से जोड़कर देखना होगा। यदि सरकारें इस संदेश को समय रहते समझ लें, तो यह आंदोलन भारत की लोकतांत्रिक यात्रा में एक सकारात्मक मोड़ सिद्ध हो सकता है।-पूनम आई. कौशिश