सबसे मजबूत साबित हो रहा ‘सत्ता का फैविकोल’

Edited By Updated: 23 Jun, 2026 03:35 AM

the  fevicol of power  is proving to be the strongest

इधर पिछले एक महीने में राजनीति की 3-4 बड़ी घटनाएं हुईं। पश्चिम बंगाल में बीते 9 मई को शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और मई अंत आते-आते तृणमूल कांग्रेस से ‘तृण’ अलग होने लगा और 15 दिन में ही सिर्फ ‘मूल’ बचा। तीन जून आते-आते टी.एम.सी. में...

इधर पिछले एक महीने में राजनीति की 3-4 बड़ी घटनाएं हुईं। पश्चिम बंगाल में बीते 9 मई को शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और मई अंत आते-आते तृणमूल कांग्रेस से ‘तृण’ अलग होने लगा और 15 दिन में ही सिर्फ ‘मूल’ बचा। तीन जून आते-आते टी.एम.सी. में औपचारिक रूप से विभाजन हो गया। 58 असंतुष्ट विधायकों ने अपने आपको मूल तृणमूल कांग्रेस बताया और कुछ ही दिन पहले पार्टी से निकाले गए ऋतुब्रत बनर्जी विधानसभा में विपक्ष के नेता बन गए। निशाना बने ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी। लेकिन बात यहीं तक नहीं रुकी और पार्टी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 बागी हो गए और एन.डी.ए. को समर्थन करने की घोषणा भी कर दी। 

यानी दो-तिहाई का मामला हुआ। कानूनी बाध्यता से मुक्ति मिली। बात यहीं तक नहीं रुकी। आजकल स्थानीय स्तर से लेकर तृणमूल विधायक और सांसद तक किसी बम से नहीं डर रहे। उनका डर अंडा हमले से है। ये अंडे कोई राजनीतिक दल से नहीं आ रहे। उन्हें यह भेंट ज्यादातर स्थानीय लोग ही कर रहे हैं, जो पिछले 10 साल से कटमनी का आतंक झेल रहे थे। जो सांसद-विधायक कभी अपने क्षेत्र के राजा हुआ करते थे, आजकल अपने चुनाव क्षेत्र में भी निकलने से डरते हैं। यही डर स्थानीय स्तर के नेताओं को भी है। दृश्य दो: स्थान मुंबई। शिवसेना का मुख्यालय मातोश्री। जब तक बाल ठाकरे रहे, शेर दहाड़ता रहा लेकिन जबसे उद्धव ठाकरे आए, शेर धीरे-धीरे बूढ़ा होने लगा। राज ठाकरे के अलग होने के बाद तो यह गिरावट और तेजी से हुई। जिस मातोश्री में कभी शेर की शक्ति हुआ करती थी, दिसम्बर 24 में यह शक्ति भी चली गई।

वेंद्र फडऩवीस के मुख्यमंत्री बनने से पहले ही एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में पार्टी रणनीतिक रूप से  दोफाड़ हो गई थी। बाकी लोकसभा में 9 सदस्यों वाली टी.एम.सी. की टूट के बाद ही शेर एक-तिहाई दुबला हो गया और 9 में से 6 सदस्य अलग हो गए। अब बस कुछ औपचारिकताओं का इंतजार है। वैसे भी सोमवार को एकनाथ शिंदे ने कह ही दिया है कि हम कोई काम अधूरा नहीं छोड़ते। यानी टूट की आगे और तैयारी है। हालांकि राजनीतिक दलों में टूट का यह सिलसिला पहली बार नहीं हुआ। हरियाणा का ‘आया राम, गया राम’ बदनाम हुआ जरूर लेकिन उसके बाद ऐसे कई और मौके आए तथा उदाहरण भी भारतीय राजनीति में मौजूद हैं। लेकिन ऊपर की टूट इसलिए अलग है क्योंकि यहां के नेताओं को सत्ता बहुत प्रिय भी है और वे सत्ता से डरते भी हैं।

डरने के कई कारण होते हैं, अपनी कमियां, अपने नए-पुराने  खाते खुलने का डर और सबसे बड़ा कारण अपनी कांस्टिचुएंसी में अपने कार्यकत्र्ताओं को खोने का डर। कार्यकत्र्ताओं के काम नहीं होंगे तो नेतागिरी कैसे चलेगी। उनकी नियमित आय का ठेका भी इन्हीं नेताओं का है। उनकी दुकान नहीं चलेगी तो ऊपर वालों की कैसेे चलेगी। याद कीजिए 2021 के पश्चिम बंगाल चुनाव के तुरंत बाद भारतीय जनता पार्टी के चुने हुए सांसद अर्जुन सिंह और गायक बाबुल सुप्रियो अपने इन्हीं कारणों की वजह से ममता दीदी की शरण में चले गए थे। पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में कार्यकत्र्ताओं को काम पर लगाए रखने के लिए उनके हिस्से में राज्य सरकार और नगर निगमों से कराए जाने वाले काम आते हैं और वही आय के साधन होते हैं। 

पश्चिम बंगाल का हाल ही में चर्चित हुआ शब्द कटमनी वहां काफी पहले से चल रहा है और आम आदमी के लिए परेशानी का कारण है, जो इस चुनाव में गुस्से का कारण भी बना। महाराष्ट्र भी इसी रास्ते पर काफी लंबे समय से है। यहां भी आप लोकल नेता के सहयोग से न तो किराए का मकान पा सकते हैं और न ही मकान अपनी मर्जी से बनवा सकते हैं। कोलकाता या पश्चिम बंगाल में तो स्थानीय ठेके, काम, सब पर इन्हीं नेताओं की चलती है। ये सब जनता के गुस्से में तब बदल जाता है, जब स्थानीय रेहड़ी वालों या आम आदमी से जन्म प्रमाण पत्र या अन्य छोटे काम में भी वसूली की कोशिश की जाती है। पश्चिम बंगाल में यह गुस्सा विधानसभा चुनावों में एक ऐसी सुनामी के रूप में सामने आया, जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल का यह रोग लालू यादव के कार्यकाल में बिहार तक पहुंच गया था और उस गुस्से को विधानसभा चुनावों में उलटा-पुल्टा करने में 15 साल लग गए। 

दृश्य नंबर 3:  कर्नाटक में  विधान परिषद चुनाव में कम से कम 11 भाजपा और जे.डी.एस. विधायकों ने पाला बदलकर कांग्रेस का साथ दिया। भाजपा का आरोप है कि सहयोगी जे.डी.एस. के कम से कम 8 विधायकों ने कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन किया है। इस उलटफेर से भाजपा और जे.डी.एस. के कर्नाटक के बड़े नाम पार्टी जांच के दायरे में आ गए  हैं। इनमें जे.डी.एस. के जी.टी. देवेगौड़ा और एम.आर. मंजूनाथ तथा भाजपा के दिग्गज नेता रमेश जारकीहोली, बी.पी. हरीश, एम. चंद्रप्पा और एच.के. सुरेश शामिल हैं। माना जा रहा है कि पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री येद्दियुरप्पा के बेटे विजयेंद्र को नीचा दिखाने के लिए ही कंर्नाटक में भाजपा नेताओं और सहयोगी जे.डी.एस. से जानबूझकर क्रॉस वोटिंग की गई है। लेकिन इसके नायक हैं  कर्नाटक के नए और तेज-तर्रार मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार। कांग्रेस शासित राज्यों में डी.के. देश के सर्वाधिक रईस मुख्यमंत्री तो हैं ही, साथ ही कांग्रेस के संकटमोचक माने जाते हैं। तय है कि इधर से उधर होने वाले नेताओं में से कुछ कई तरह की जांच और कानूनी मामलों में फंसे हैं। उन्हें अब ढील और संरक्षण मिलने के आसार हैं। 

तय है कि  इन सभी गतिविधियों  के पीछे सत्ता की मलाई के आदी नेताओं के निजी स्वार्थ और उलटे-सीधे धंधों तथा कमीशनखोरी पर सत्ता का नया पर्दा टांगने की कोशिश माना जा रहा है। पश्चिम बंगाल में कटमनी कमीशन शब्द का पता अभी भला पूरे देश को चला हो लेकिन यह काफी लंबे समय से है और बदनाम भी। यह धंधा बिना सत्ता में रहे नहीं चल सकता। इसलिए जिधर सत्ता, उधर नेता का जाना स्वाभाविक हो गया है। इस तरह यह राजनीति देश में लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा  है, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन कुछ राजनीतिक दल इससे सीख लेने को तैयार नहीं। जनता का विरोध समय तो ले सकता है लेकिन उसका गुस्सा धीरे-धीरे एक सुनामी का रूप ले ही लेता है। सच तो यह है कि लोकतंत्र में ‘सत्ता का फैविकोल’ सबसे मजबूत साबित हो रहा है।-अकु श्रीवास्तव
 

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