Edited By ,Updated: 04 Jan, 2026 05:44 AM

पिछले 45 वर्षों से वाम दलों का गढ़ माने जाते त्रिवेंद्रम के नगर निकाय चुनावों में भाजपा की चौंकाने वाली जीत ने जहां भाजपा के प्रवेश की भूमि तैयार कर दी है, वहीं पार्टी की इस जीत ने कांग्रेस पार्टी के असंतुष्ट नेता शशि थरूर की हाल की बेचैन कोशिशों के...
पिछले 45 वर्षों से वाम दलों का गढ़ माने जाते त्रिवेंद्रम के नगर निकाय चुनावों में भाजपा की चौंकाने वाली जीत ने जहां भाजपा के प्रवेश की भूमि तैयार कर दी है, वहीं पार्टी की इस जीत ने कांग्रेस पार्टी के असंतुष्ट नेता शशि थरूर की हाल की बेचैन कोशिशों के कारण को दर्शाया है। शायद उनको (थरूर) हवा का रुख बदलने का आभास हो चुका था चूंकि लोकसभा चुनाव (2024) में त्रिवेंद्रम की सीट पर वह बेहद मामूली फर्क से जीते थे। इससे पूर्व लगातार 3 चुनावों में बड़ी जीत दर्ज करने के बाद गत वर्ष वह भाजपा के उम्मीदवार राजीव चंद्रशेखरन को मात्र 12,600 मतों से ही हरा सके थे।
संभवत: शहर की सीमाओं के बाहर तटीय इलाकों में रहने वाले आर्थिक रूप से बड़े कमजोर वर्ग के मछुआरों के एकजुट होकर शशि थरूर के पक्ष में मतदान किए जाने की वजह से ही वह जीत पाए थे। शहर के 101 वार्डों में से भाजपा ने 50 पर जीत प्राप्त की, जोकि पूर्ण बहुमत से केवल 1 सीट कम है। हालांकि भाजपा की यह जीत शशि थरूर के लिए खुशी की वजह बनने की संभावना कम ही है। उलटे आने वाले दिनों में स्थानीय (लोकल) सियासी समीकरणों में वह खुद को हाशिए पर पा सकते हैं।
नि:संदेह शशि थरूर कांग्रेस पार्टी के एक पुराने, अनुभवी, मृदुभाषी, निष्ठावान व कर्मठ नेता हैं, परन्तु जिस पार्टी ने उनके राजनीतिक करियर को गढ़ा और संवारा, उसी पार्टी के विरुद्ध उनके तथाकथित बयानों, हालिया महीनों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खुले रूप में प्रशंसा के पुल बांधना और तत्पश्चात रूस के राष्ट्रपति पुतिन के सम्मान में राष्ट्रपति भवन में आयोजित भोज में शामिल होने के कारण थरूर को अपनी ही पार्टी में एक तरह से अविश्वसनीय बना डाला है। ‘आप्रेशन सिंदूर’ के बाद के घटनाक्रमों में सरकार के अंतरराष्ट्रीय जनसंपर्क अभियान के अधीन जब शशि थरूर को एक प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व सौंपते हुए विदेशों में भेजा गया, तो उस वक्त कांग्रेस पार्टी को सार्वजनिक रूप से असहज होना पड़ा था। अब जबकि उनके (थरूर) अपने निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा का सितारा चमकने के पूरे आधार बने हुए हैं, तो ऐसे वक्त में शशि थरूर पूर्ण आशा कर सकते हैं कि गत कई महीनों में भारतीय जनता पार्टी के साथ मेल-मिलाप बढ़ाने का उन्हें कोई सियासी फायदा मिलेगा?
त्रिवेंद्रम में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए शशि थरूर को राजीव चंद्रशेखरन जैसी मजबूत शख्सियत का मुकाबला करना पड़ेगा। नगर निकाय चुनावों में पार्टी के हैरतअंगेज प्रदर्शन को भाजपा में चंद्रशेखरन की एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। त्रिवेंद्रम में बढ़ती हुई वाम-विरोधी लहर व माहौल का सामाजिक लाभ कांग्रेस को ही मिलना था लेकिन थरूर के अपनी ही पार्टी के खिलाफ खुले विद्रोह ने कांग्रेस पार्टी को नुकसान ही पहुंचाया है। कांग्रेस वहां तीसरे स्थान पर रही, जबकि वाम दलों ने मुख्य विपक्षी दल की भूमिका बनाए रखी। राजीव चंद्रशेखरन पिछले कुछ वर्षों से इस संसदीय क्षेत्र को साध रहे हैं, ताकि 2029 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का टिकट प्राप्त कर सकें। देखा जाए तो चंद्रशेखरन के पास साधनों की कोई कमी नहीं है, जबकि शशि थरूर के पास बड़ी पूंजी भाषाई ज्ञान तथा वाकपटुता भर है। देखने वाली दिलचस्प बात यह होगी कि क्या थरूर भाजपा का टिकट पाने में सफल होते हैं या उसकी आंतरिक राजनीति का शिकार हो जाते हैं।
सही मायनों में थरूर को कांग्रेस पार्टी ने एक दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। 2026 की शुरुआत में केरल में चुनाव होंगे, जब पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु व असम में भी चुनाव होने हैं। केरल में जहां किसी समय शशि थरूर को कांग्रेस की एक बड़ी ताकत माना जाता था, वहीं अब स्थानीय चुनावों ने सिद्ध कर दिया है कि राज्य में अब उनकी प्रासंगिकता पहले जैसी नहीं रही। कांग्रेस पार्टी ने थरूर के लिए व्यावहारिक रूप से अपने दरवाजे बंद कर दिए हैं और यही बात उनके (थरूर) सामने एक भारी दुविधा खड़ी कर रही है। अगर थरूर कांग्रेस के लिए हितकारी साबित नहीं हो सकते, तो क्या भारतीय जनता पार्टी व संघ के लिए उपयोगी हो पाएंगे? स्पष्ट नजर आता है कि कांग्रेस को अधिकाधिक असहज करने के लक्ष्य से ही भाजपा गत कई महीनों से थरूर का फायदा उठा रही है। थरूर के हरेक बयान के लेख से पार्टी में खलबली मचती रही है। कांग्रेस पार्टी की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में अब कांग्रेस की सबसे बेहतर रणनीति यही है कि वह थरूर को हर दृष्टि से नजरअंदाज करे, जिसके पीछेे थरूर से कड़वे अनुभव हैं।
राजनीति के ऐसे भंवर से बाहर निकलने के लिए थरूर के पास केवल एक ही मांग है- खुद को पार्टी (कांग्रेस) से निष्कासित करवाने की कोशिश करना ताकि थरूर की लोकसभा सीट सुरक्षित रह सके। अगर उनको पार्टी से निकाला जाता है तो वह निर्दलीय सांसद बन जाएंगे, लेकिन अगर वह स्वयं इस्तीफा देते हैं तो उनकी सीट चली जाएगी। फिलहाल कांग्रेस तो उनके उकसावे में आकर उनको निष्कासित नहीं करना चाहती। अब देखना यह है कि क्या भाजपा त्रिवेंद्रम में हालात को परखने हेतु थरूर को इस्तीफा देने के लिए प्रेरित करती है तथा लोकसभा उपचुनाव करवाने की दिशा में अपने कदम बढ़ाती है? परन्तु ऐसी स्थिति में भी इस बात की कोई गांरटी नहीं है कि भाजपा राजीव चंद्रशेखरन के स्थान पर थरूर को टिकट देगी। इन हालात में कांग्रेस को छोड़ कर भाजपा का दामन थाम लेना शशि थरूर के लिए राजनीति के तौर पर कितना फायदेमंद होगा, यह भविष्य के गर्भ में है।-मनजीत सोढी