Edited By ,Updated: 14 Jul, 2026 04:31 AM

‘सतलुज’ के प्रदर्शन ने पंजाब में हाल के वर्षों का सबसे संवेदनशील राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। इस फिल्म ने आतंकवाद के दौर की पीड़ादायक यादों को फिर से ताजा कर दिया है, सरकारी कार्रवाई और मानवाधिकारों पर बहस छेड़ दी है तथा सभी प्रमुख राजनीतिक दलों...
‘सतलुज’ के प्रदर्शन ने पंजाब में हाल के वर्षों का सबसे संवेदनशील राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। इस फिल्म ने आतंकवाद के दौर की पीड़ादायक यादों को फिर से ताजा कर दिया है, सरकारी कार्रवाई और मानवाधिकारों पर बहस छेड़ दी है तथा सभी प्रमुख राजनीतिक दलों को अपनी चुनावी रणनीति पर पुनॢवचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। 1980-90 के दशक की ङ्क्षहसा आज भी हजारों परिवारों के लिए बीता हुआ इतिहास नहीं, बल्कि जीवंत स्मृति है। यही कारण है कि इस फिल्म पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं कला से अधिक चुनावी गणित से प्रेरित दिखाई देती हैं। अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए सभी दल जानते हैं कि फिल्म पर उनका रुख ग्रामीण मतदाताओं, सिख समाज तथा आतंकवाद, न्याय और सुशासन को लेकर जनता की सोच को प्रभावित कर सकता है।
शिरोमणि अकाली दल ने इस विवाद को सबसे पहले राजनीतिक अवसर के रूप में पहचाना। लगातार चुनावी पराजयों और ग्रामीण क्षेत्रों में अपना पारंपरिक आधार खोने के बाद अकाली नेतृत्व ने खुलकर फिल्म का समर्थन किया और सैंकड़ों गांवों में इसके प्रदर्शन की घोषणा की है। इसका उद्देश्य स्पष्ट है-किसान आंदोलन के बाद पार्टी से दूर हुए ग्रामीण सिख मतदाताओं को दोबारा अपने साथ जोडऩा। अकाली दल का मानना है कि यह फिल्म आतंकवाद विरोधी अभियान के दौरान कथित ज्यादतियों की यादें ताजा करेगी और सिख हितों के रक्षक के रूप में उसकी पुरानी राजनीतिक पहचान को फिर मजबूत करेगी। इसलिए गांवों में होने वाले प्रदर्शन केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि चुनावी जनसंपर्क अभियान हैं। यदि यह रणनीति सफल रही तो अकाली दल पिछले एक दशक में खोया अपना ग्रामीण आधार काफी हद तक वापस पा सकता है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सामने यह विवाद सबसे कठिन राजनीतिक चुनौती बनकर उभरा है।
भाजपा हमेशा आतंकवाद और अलगाववाद के विरुद्ध कठोर रुख अपनाने वाली पार्टी के रूप में अपनी पहचान बनाती रही है। उसके समर्थक किसी भी ऐसे कथानक का विरोध करने की अपेक्षा रखते हैं, जिसे आतंकवाद के प्रति सहानुभूति के रूप में देखा जाए। लेकिन पंजाब की राजनीति अलग है। भाजपा लंबे समय से शहरी ङ्क्षहदू मतदाताओं से आगे बढ़कर ग्रामीण सिख क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास कर रही है। कृषि कानूनों के विरोध में चले किसान आंदोलन ने इस रणनीति को बड़ा झटका दिया। यदि भाजपा फिल्म का खुला विरोध करती है तो ग्रामीण मतदाताओं के बीच यह संदेश जा सकता है कि वह सिख भावनाओं के प्रति संवेदनशील नहीं है। दूसरी ओर, यदि वह नर्म रुख अपनाती है तो उसकी राष्ट्रवादी छवि पर प्रश्न उठ सकते हैं। यह विवाद भाजपा और अकाली दल के बीच संभावित गठबंधन की राह भी कठिन बना सकता है।
उधर कांग्रेस ने अब तक बेहद सावधानीपूर्ण रुख अपनाया है। पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वङ्क्षडग़ ने फिल्म देखने के बाद ही टिप्पणी करने की बात कही, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी का कहना है कि यदि फिल्म तथ्यों पर आधारित है तो उस पर प्रतिबंध नहीं लगना चाहिए। लेकिन कांग्रेस की वास्तविक समस्या इससे कहीं बड़ी है। फिल्म में दिखाए गए अधिकांश घटनाक्रम उस दौर से जुड़े हैं, जब पंजाब में कांग्रेस की सरकारें थीं। इसलिए यह विवाद आतंकवाद विरोधी अभियानों, कथित मानवाधिकार उल्लंघनों और पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या से जुड़े पुराने प्रश्नों को फिर सामने ले आया है। बेअंत सिंह को आज भी बड़ी संख्या में लोग आतंकवाद समाप्त कर पंजाब में शांति स्थापित करने वाले मुख्यमंत्री के रूप में याद करते हैं। ऐसे में कांग्रेस न तो पूरी तरह फिल्म का समर्थन कर सकती है और न ही अपने पुराने शासनकाल का खुला बचाव।
‘सतलुज’ की सबसे बड़ी आलोचना यह है कि इसमें पंजाब की त्रासदी का केवल एक पक्ष अधिक प्रमुखता से सामने आता है। पंजाब का आतंकवाद केवल सुरक्षा बलों पर लगे आरोपों तक सीमित नहीं था। उस दौर में हजारों निर्दोष नागरिक, पत्रकार, शिक्षक, सरकारी कर्मचारी, राजनीतिक कार्यकत्र्ता और धार्मिक नेता आतंकवाद का शिकार बने। असंख्य परिवार बर्बाद हो गए। यदि इन तथ्यों की अनदेखी की जाती है तो पंजाब के उस त्रासद दौर की तस्वीर अधूरी रह जाती है। पंजाब के चुनाव सामान्यत: कृषि, बेरोजगारी, नशाखोरी, भ्रष्टाचार और सुशासन जैसे मुद्दों पर लड़े जाते हैं लेकिन भावनात्मक विषय अक्सर राजनीतिक विमर्श की दिशा बदल देते हैं। इस फिल्म ने भी शासन और विकास से ध्यान हटाकर पहचान, इतिहास और न्याय की बहस को केंद्र में ला दिया है। वास्तव में, ‘सतलुज’ अब केवल एक फिल्म नहीं रह गई, यह इतिहास, स्मृति और राजनीतिक व्याख्या का अखाड़ा बन चुकी है।
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि यह फिल्म चुनावी परिणाम बदल देगी लेकिन इतना स्पष्ट है कि इसने पंजाब की राजनीति को अतीत के उन घावों की ओर फिर मोड़ दिया है, जिन्हें राजनीतिक दल पीछे छोड़ देना चाहते थे। यदि यह विवाद आगे भी जारी रहा तो अगले वर्ष का विधानसभा चुनाव केवल विकास के वादों पर नहीं, बल्कि पंजाब के सबसे उथल-पुथल भरे दौर की अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याओं पर भी लड़ा जा सकता है। यही इस फिल्म का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रभाव होगा।-के.एस. तोमर