Edited By ,Updated: 30 Jun, 2026 03:58 AM

पंजाब की कहानी अक्सर उसकी मजबूती, समृद्धि और राष्ट्र-निर्माण में दिए गए योगदान के संदर्भ में सुनाई जाती है। लेकिन आधुनिक पंजाब का इतिहास राजनीतिक विश्वासघात और सामाजिक उथल-पुथल की भी कहानी है, जिसने धीरे-धीरे पंजाब की ताकतों को कमजोर किया।
पंजाब की कहानी अक्सर उसकी मजबूती, समृद्धि और राष्ट्र-निर्माण में दिए गए योगदान के संदर्भ में सुनाई जाती है। लेकिन आधुनिक पंजाब का इतिहास राजनीतिक विश्वासघात और सामाजिक उथल-पुथल की भी कहानी है, जिसने धीरे-धीरे पंजाब की ताकतों को कमजोर किया। पंजाब ने हमेशा देश की प्रगति में अपना योगदान खुले दिल से दिया लेकिन बदले में उसे वह सहयोग नहीं मिला, जिसका वह हकदार था।
1947 का विभाजन (जान, जमीन और पहचान का नुकसान) : पंजाब के लिए यह विभाजन की असहनीय पीड़ा की शुरुआत थी। राज्य 2 हिस्सों में बंट गया, लाखों लोग मारे गए और करोड़ों लोग अपने घरों से विस्थापित हो गए। पंजाब की सांस्कृतिक और व्यावसायिक राजधानी लाहौर पाकिस्तान में चली गई। ऐतिहासिक व्यापारिक मार्ग टूट गए और एक मजबूत अर्थव्यवस्था लगभग एक ही रात में बिखर गई। आज, लगभग 8 दशक बाद भी, उस विभाजन के आॢथक, सामाजिक और मानसिक प्रभाव पंजाब के विकास की दिशा को प्रभावित कर रहे हैं।
1966 का पुनर्गठन (संपत्ति, राजधानी और अवसरों का नुकसान) : 1966 में भाषाई और सांस्कृतिक आधार पर पंजाब का पुनर्गठन किया गया। वह विशाल पंजाब, जो उत्तर में ङ्क्षहदूकुश (कश्मीर), दक्षिण में सिंध (राजस्थान), पश्चिम में खैबर दर्रा (अफगानिस्तान) और पूर्व में यमुना (दिल्ली) तक फैला हुआ था, उसे बहुत छोटा कर दिया गया। हरियाणा के गठन और पहाड़ी क्षेत्रों को हिमाचल प्रदेश में शामिल किए जाने से पंजाब की पहचान और मनोविज्ञान पर गहरा प्रभाव पड़ा। पंजाब ने न केवल अपना भौगोलिक क्षेत्र ही खोया, बल्कि भूमि, जल, वन, महत्वपूर्ण औद्योगिक केंद्र, पर्यटन स्थल और अपनी राजधानी चंडीगढ़ पर एकाधिकार भी खो दिया।
उग्रवाद और पलायन (बौद्धिक और श्रम शक्ति का नुकसान) : 1980 के दशक और 1990 के शुरुआती वर्षों में उग्रवाद ने पंजाब की अर्थव्यवस्था को एक और बड़ा झटका दिया। निवेशकों का विश्वास टूट गया, औद्योगिक विकास रुक गया और अनेक उद्योग एवं व्यवसाय पंजाब से बाहर चले गए। इसी दौरान शिक्षित और कुशल पंजाबी बेहतर अवसरों की तलाश में बड़ी संख्या में विदेशों की ओर पलायन करने लगे, जो राज्य के भविष्य के विकास की मजबूत नींव बन सकते थे।
वर्तमान : चौराहे पर खड़ा पंजाब : आज पंजाब जिन चुनौतियों का सामना कर रहा है, वे रातों-रात पैदा नहीं हुईं। वे दशकों की उपेक्षा, लापरवाही और राजनीतिक नेतृत्व, नौकरशाही तथा स्वयं समाज द्वारा लिए गए स्वार्थपूर्ण निर्णयों का परिणाम हैं।
संकट में घिरा पंजाब : दशकों से भूजल के अंधाधुंध दोहन, उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग, औद्योगिक प्रदूषण तथा कचरा प्रबंधन की विफलताओं ने पंजाब की धरती को लगभग विषैला बना दिया है। भूजल का स्तर लगातार गिर रहा है। जल प्रदूषण, जो पहले कुछ क्षेत्रों तक सीमित था, अब पूरे पंजाब में फैलता जा रहा है। पराली जलाने, औद्योगिक धुएं, वाहनों से निकलने वाले धुएं और तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण वायु प्रदूषण पूरे वर्ष लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बना हुआ है।
शहरीकरण हमारी रीढ़ पर भारी : सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि वही भूमि, जिसने पीढिय़ों तक कृषि को सहारा दिया, आज हमारी आंखों के सामने तेजी से समाप्त होती जा रही है। हर वर्ष हजारों हैक्टेयर उपजाऊ कृषि भूमि राष्ट्रीय राजमार्गों, अनियंत्रित शहरी विस्तार, आवासीय कालोनियों, शैक्षणिक संस्थानों, व्यावसायिक परियोजनाओं, मैरिज पैलेसों और अन्य अव्यवस्थित विकास की भेंट चढ़ रही है।
रोजगार और कौशल की कमी : पंजाब अपनी अर्थव्यवस्था को विविध क्षेत्रों में विकसित करने में सफल नहीं हो पाया, जिसका सीधा प्रभाव रोजगार के अवसरों पर पड़ा है। राज्य ऐसी आधुनिक और कुशल कार्यशक्ति तैयार करने में भी जरूरी निवेश नहीं कर पाया, जो नवाचार, प्रौद्योगिकी और ए.आई. जैसे क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा कर सके।
राजनीतिक टकराव : राज्य के सामने इतनी बड़ी चुनौतियां होने के बावजूद राजनीति लगातार आपसी आरोप-प्रत्यारोप और टकराव में उलझी हुई है। पूरी ऊर्जा सुॢखयां बटोरने में खर्च हो रही है। इस पूरे शोर-शराबे में केवल एक प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है : हम पंजाब के लिए कैसा भविष्य तैयार कर रहे हैं?
भविष्य-खोई हुई चर्चा : आज पंजाब को सबसे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि अगले 25 वर्षों में वह स्वयं को किस प्रकार का राज्य बनाना चाहता है, इस पर गंभीर और दूरदर्शी विचार किया जाए। पंजाब को एक ऐसे सर्वदलीय चार्टर की आवश्यकता है, जिस पर व्यापक चर्चा के बाद सभी की सहमति हो। हमें अपने मतभेदों से ऊपर उठकर इन महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर खोजने होंगे :
पंजाब का नया आर्थिक मॉडल क्या हो, जो वित्तीय ऋण के बोझ को कम कर सके? कृषि को ए.आई. और आधुनिक प्रौद्योगिकी से कैसे जोड़ा जाए? किन उद्योगों को प्राथमिकता दी जाए और यदि वे हमारी भूमि का उपयोग करते हैं, तो क्या उनकी कार्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सी.एस.आर.) को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ा जा सकता है? वास्तविक अर्थों में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर कैसे पैदा किए जाएं? प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए? युवाओं को पंजाब में कैसे रोका जाए और उन्हें राजनीति एवं प्रशासन में सक्रिय भागीदारी के लिए कैसे प्रेरित किया जाए? पंजाब को ऐसे नेताओं की जरूरत है, जो अपने स्वार्थों से पहले राज्य के हित को रखें और सांझे दृष्टिकोण के साथ पंजाब के भविष्य के लिए कार्य करें।
निष्कर्ष : हमें एक सुविचारित व व्यापक कार्ययोजना की आवश्यकता है, जो व्यवस्थागत कमियों की पहचान करे, परिवर्तनकारी सुधारों की सिफारिश करे और उन्हें लागू करने के लिए यथार्थवादी तथा समयबद्ध लक्ष्य निर्धारित करे। इतिहास ने हमें एक बात अवश्य सिखाई है-जब भी पंजाब किसी सांझे उद्देश्य के लिए एकजुट हुआ है, उसने हर चुनौती को विजय में बदला है। आज हमारे सामने प्रश्न यह नहीं है कि क्या पंजाब फिर से उठ सकता है, वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या हमारे भीतर एक साथ उठ खड़े होने का सांझा संकल्प, दृढ़ इच्छाशक्ति और प्रतिबद्धता मौजूद है?-ब्रह्म मोहिंदरा (पूर्व कैबिनेट मंत्री, पंजाब)