कॉलेजियम सिस्टम में सुधार के साथ जजों के खाली पद भरे जाएं

Edited By Updated: 10 Sep, 2022 01:57 PM

with the reform of collegium vacant posts of judges should be filled

संसद में कानून मंत्री के इंकार के बावजूद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की रिटायरमैंट उम्र बढ़ाने के बारे में अनेक कयास लग रहे हैं। दूसरी तरफ रेवडिय़ों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान रिटायर्ड जजों के लिए बंगला, पैंशन, घरेलू सहायक,...

संसद में कानून मंत्री के इंकार के बावजूद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की रिटायरमैंट उम्र बढ़ाने के बारे में अनेक कयास लग रहे हैं। दूसरी तरफ रेवडिय़ों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान रिटायर्ड जजों के लिए बंगला, पैंशन, घरेलू सहायक, इंटरनैट, मोबाइल, मैडीकल, सुरक्षा अधिकारी और एयरपोर्ट में वी.आई.पी. प्रोटोकॉल जैसे इंतजाम हो रहे हैं। रिटायरमैंट के बाद काम करने की अनेक संवैधानिक बंदिशों के बावजूद जजों में ट्रिब्यनूल, आयोग और राज्यसभा की सदस्यता के साथ राज्यपाल जैसे पदों के लिए दौड़ बढ़ती ही जा रही है। 

मुकद्दमेबाजी में सरकार बहुत बड़ी पक्षकार है इसलिए जजों के पोस्ट रिटायरमैंट बैनीफिट्स के खिलाफ भाजपा नेता और पूर्व कानून मंत्री अरुण जेतली ने जोरदार आवाज उठाई थी। नए चीफ जस्टिस ललित ने रिटायरमैंट के बाद कोई पद नहीं लेने और आर्बिट्रेशन के प्रोफैशन में शामिल होने से इंकार करके अच्छी पहल की है। न्यायिक व्यवस्था में ठोस सुधार के लिए जजों की नियुक्ति व्यवस्था में सुधार जरूरी है। 

ए.आई.जे. एस. पर अमल करके कॉलेजियम सिस्टम में सुधार : आजादी के समय देश में 9 हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में कुल 7 जज थे। इस समय सुप्रीमकोर्ट में 34 और 25 हाईकोर्ट में 1108 जजों के पद हैं। आजादी के बाद केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस मिलकर जजों की नियुक्ति करते थे। सुप्रीम कोर्ट के तीन बड़े फैसलों के बाद 1998 से कॉलेजियम व्यवस्था के तहत जजों की नियुक्ति शुरू हो गई। जजों की नियुक्ति पर विचार और अनुशंसा के लिए 5 वरिष्ठ जजों की कमेटी को कॉलेजियम कहते हैं। केन्द्र सरकार ने कॉलेजियम के खात्मे और जजों की नियुक्ति के लिए एक स्वतंत्र आयोग बनाने की कोशिश की। लेकिन एन.जे.ए.सी. कानून को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 2015 में रद्द कर दिया। 

सुप्रीम कोर्ट के कई जजों ने कॉलेजियम सिस्टम को अपारदर्शी और सड़ान्धपूर्ण बताया है। दूसरी तरफ जजों को हटाने के लिए संविधान में महाभियोग की जटिल व्यवस्था की वजह से आजादी के बाद किसी जज की बर्खास्तगी भी नहीं हुई है। संविधान के अनुसार लोगों को जल्द और समान न्याय मिले, इसके लिए अदालतों की बड़ी जिम्मेदारी है। लेकिन सरकारी सिस्टम को ठीक करने के लिए पीआईएल पर आदेश देने वाले जजों ने कॉलेजियम को दुरुस्त करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए। 

कॉलेजियम के सामंती सिस्टम को ठीक करने के लिए आई.ए.एस., आई.पी.एस. और आई.एफ.एस. की तर्ज पर अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (ए.आई.जे.एस.) के गठन का प्रस्ताव आया था। इससे पूरे देश के प्रतिभाशाली युवाओं को न्यायिक सेवा से जोड़ा जा सकता है। इससे जजों की नियुक्ति में मनमानी खत्म होने के साथ मैरिट को बढ़ावा मिल सकता है। जिला अदालतों में काम करने के अनुभव की वजह से ए.आई.जे.एस. से प्रमोट जज हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में बेहतर भूमिका निभा सकते हैं। सही और जल्द न्याय देने के लिए ए.आई.जे.एस. जैसे न्यायिक सुधारों को लागू के लिए संविधान के तहत मिली विशिष्ट शक्ति इस्तेमाल करके इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ठोस आदेश पारित कर सकते हैं। 

जजों के खाली पदों पर भर्ती से जी.डी.पी. में बढ़ौतरी : नेता और जज मुकद्दमों की बढ़ती संख्या पर लगातार चिंता जाहिर कर रहे हैं लेकिन यह मर्ज नासूर-सा बन गया है। विधि आयोग की 1987 की पुरानी रिपोर्ट के हवाले से आबादी के लिहाज से जजों की कम संख्या की दुहाई दी जाती है। दूसरी तरफ जजों के रिक्त पदों पर भर्ती नहीं हो रही।

सुप्रीम कोर्ट में जजों के चार और हाईकोर्ट में जजों के लगभग 386 पद खाली हैं। देश के हाईकोर्टों में 60 लाख मुकद्दमे लंबित हैं जिनमें 2.52 लाख मामले 20 साल से ज्यादा पुराने हैं। थानों में मनमाफिक तरीके से दर्ज एफ.आई.आर. पर ट्रायल कोर्ट के जज आंख मूंदकर रिमांड का आदेश पारित कर देते हैं। इसकी वजह से लाखों बेगुनाह लोग जेलों में बंद हैं। गलत तरीके से लोगों को जेल में बंद रखना संविधान के तहत मिले उनके जीवन के अधिकार का उल्लंघन है। प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसे अंडर-ट्रायल कैदियों की रिहाई के लिए ठोस कदम उठाने का आह्वान किया है। 

जिला अदालतों और ट्रायल कोर्ट में कुल 24,631 पदों में से 5343 पोस्ट खाली हैं। इन पदों पर उच्च न्यायिक सेवा (एच.जे.एस.) और राज्य न्यायिक सेवा के माध्यम से नियुक्ति होती है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट और केन्द्र सरकार की कोई भूमिका नहीं होती। सुप्रीम कोर्ट के नए चीफ जस्टिस ललित 71 हजार लंबित मामलों की लिस्टिंग और निपटारे के लिए कई अच्छे कदम उठा रहे हैं। एक रिसर्च के अनुसार न्यायिक व्यवस्था और अदालतों में धनराशि के बेहतर आवंटन से व्यापार, अर्थव्यवस्था और जी.डी.पी. में भारी बढ़ौतरी हो सकती है। जजों की नियुक्ति वाली कॉलेजियम व्यवस्था में सुधार के साथ जिला अदालतों में खाली पदों में भर्ती के लिए नए चीफ जस्टिस ललित को ठोस पहल करनी चाहिए। इससे जनता को राहत मिलने के साथ अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र का विकास होगा।-विराग गुप्ता(एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट)
 

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