Edited By jyoti choudhary,Updated: 14 Jul, 2026 05:30 PM

दुनिया की सबसे बड़ी कॉपर (तांबा) उत्पादक अर्थव्यवस्थाओं में शामिल चिली में उत्पादन में आई गिरावट ने वैश्विक बाजार की चिंता बढ़ा दी है। कॉपर की आपूर्ति कम होने की खबर के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमतों में तेजी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का
बिजनेस डेस्कः दुनिया की सबसे बड़ी कॉपर (तांबा) उत्पादक अर्थव्यवस्थाओं में शामिल चिली में उत्पादन में आई गिरावट ने वैश्विक बाजार की चिंता बढ़ा दी है। कॉपर की आपूर्ति कम होने की खबर के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमतों में तेजी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका असर इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, ऊर्जा और निर्माण जैसे कई उद्योगों की लागत पर पड़ सकता है।
कॉपर आधुनिक उद्योगों की सबसे अहम धातुओं में से एक है। बिजली के तार, मोबाइल फोन, लैपटॉप, एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर, इलेक्ट्रिक वाहन, सोलर पैनल और डेटा सेंटर जैसे उत्पादों में इसका व्यापक उपयोग होता है। यही वजह है कि इसकी आपूर्ति में किसी भी तरह की कमी का असर वैश्विक सप्लाई चेन पर दिखाई देता है।
15-20% तक घटा कॉपर उत्पादन
रिपोर्टों के अनुसार, चिली में कॉपर उत्पादन 15 से 20 प्रतिशत तक घट गया है। इसके बाद कॉपर फ्यूचर्स की कीमत 6.25 डॉलर प्रति पाउंड से ऊपर पहुंच गई, जो हाल के सप्ताहों के उच्च स्तरों में शामिल है।
उत्पादन में गिरावट के कारण
उत्पादन में गिरावट के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। खनन क्षेत्रों में पानी की कमी, तकनीकी समस्याएं, खदानों के रखरखाव का काम, अयस्क की गुणवत्ता में बदलाव और श्रमिकों से जुड़े विवादों ने उत्पादन को प्रभावित किया है। दुनिया की प्रमुख कॉपर खदानों में शामिल एस्कोंडिडा और कोलाहुआसी में भी उत्पादन में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है।
कॉपर चिली की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। देश के कुल निर्यात में इसकी बड़ी हिस्सेदारी है और सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में भी इसका महत्वपूर्ण योगदान है। ऐसे में उत्पादन घटने का असर चिली की आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ने की आशंका है।
भारत पर क्या होगा इसका असर?
भारत जैसे देशों के लिए भी यह स्थिति अहम मानी जा रही है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कॉपर की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो इलेक्ट्रॉनिक्स, बिजली उपकरण, ऑटोमोबाइल और विशेष रूप से इलेक्ट्रिक वाहन बनाने वाली कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि सभी उत्पादों की कीमतें तुरंत बढ़ जाएंगी, लेकिन उद्योगों पर लागत का दबाव बढ़ना तय माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में वैश्विक बाजार की नजर इस बात पर रहेगी कि चिली कितनी जल्दी अपने कॉपर उत्पादन को सामान्य स्तर पर वापस ला पाता है। यदि आपूर्ति में सुधार नहीं होता, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कॉपर की कीमतों में उतार-चढ़ाव और तेज हो सकता है।