Edited By jyoti choudhary,Updated: 21 Jul, 2026 05:54 PM

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने कहा है कि बढ़ती वैश्विक तेल कीमतें और कमजोर मॉनसून वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की आर्थिक वृद्धि के लिए प्रमुख जोखिम बन सकते हैं। आईएमएफ के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और अल-नीनो के
बिजनेस डेस्कः अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने कहा है कि बढ़ती वैश्विक तेल कीमतें और कमजोर मॉनसून वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की आर्थिक वृद्धि के लिए प्रमुख जोखिम बन सकते हैं। आईएमएफ के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और अल-नीनो के संभावित प्रभाव से देश की विकास दर तथा महंगाई दोनों पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
कच्चे तेल में आ सकती है तेजी
भारत और भूटान के लिए आईएमएफ के वरिष्ठ रेजिडेंट प्रतिनिधि अनिल साल्गाडो ने कहा कि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है। चूंकि भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का लगभग 80 प्रतिशत आयात के जरिए पूरा करता है, इसलिए वैश्विक ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
भारत का GDP अनुमान घटाया
आईएमएफ ने हाल ही में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान 10 आधार अंक घटाकर 6.4 प्रतिशत कर दिया है। हालांकि, वित्त वर्ष 2027-28 के लिए वृद्धि दर का अनुमान 20 आधार अंक बढ़ाकर 6.7 प्रतिशत किया गया है।
अनिल साल्गाडो ने कहा कि दूसरा बड़ा जोखिम कमजोर मॉनसून है। उनके अनुसार, अल-नीनो के प्रभाव से वर्षा प्रभावित हो सकती है। मॉनसून की शुरुआत में देरी हुई थी और जुलाई में कुछ सुधार देखने को मिला लेकिन आगे की स्थिति पर नजर रखना जरूरी होगा। उन्होंने यह भी कहा कि आईएमएफ के ताजा अनुमान में कमजोर मॉनसून के संभावित प्रभाव को पूरी तरह शामिल नहीं किया गया है।
पिछले सप्ताह होर्मुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति बाधित होने की आशंका के बीच वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई थीं। हालांकि, अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की खबरों के बाद हाल के दिनों में कीमतों में कुछ नरमी दर्ज की गई है।
भारत ने उठाए हैं कई अहम कदम
आईएमएफ ने यह भी कहा कि भारत के राष्ट्रीय आय आंकड़ों (नेशनल अकाउंट्स) की गुणवत्ता का दोबारा आकलन वर्ष 2026 के अंत तक किया जाएगा। यह समीक्षा संशोधित आधार वर्ष 2022-23 के अनुसार जारी किए गए नए जीडीपी आंकड़ों के आधार पर होगी।
संस्था के अनुसार, भारत ने सांख्यिकीय प्रणाली को मजबूत करने के लिए कई सुधारात्मक कदम उठाए हैं। इनमें जीडीपी का आधार वर्ष बदलना, वस्तु-स्तर के मूल्य सूचकांकों का दायरा बढ़ाना, विनिर्माण क्षेत्र में डबल डिफ्लेशन पद्धति लागू करना तथा प्रशासनिक और डिजिटल आंकड़ों के उपयोग को बढ़ावा देना शामिल है। इन सुधारों से राष्ट्रीय आय के आंकड़ों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता बेहतर होने की उम्मीद जताई गई है।