आनंद एवं शांति की अनुभूति के लिए अपनाएं ये मार्ग

Edited By Niyati Bhandari, Updated: 26 May, 2022 10:24 AM

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आत्मा और परमात्मा से संबंधित शाश्वत ज्ञान का अनुगमन करना ही अध्यात्म विद्या है। आध्यात्मिक होने का अर्थ है भौतिकता से परे जीवन को अनुभव करना। कई बार हम धर्म और अध्यात्म को एक

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Anmol Vachan: आत्मा और परमात्मा से संबंधित शाश्वत ज्ञान का अनुगमन करना ही अध्यात्म विद्या है। आध्यात्मिक होने का अर्थ है भौतिकता से परे जीवन को अनुभव करना। कई बार हम धर्म और अध्यात्म को एक ही समझने लगते हैं परंतु अध्यात्म, धर्म से बिल्कुल अलग है। ईश्वरीय आनंद की अनुभूति करने का मार्ग ही अध्यात्म है। अध्यात्म व्यक्ति को अपने स्वयं के अस्तित्व के साथ जोड़ने और उसका सूक्ष्म विवेचन करने में समर्थ बनाता है। 

वास्तव में आध्यात्मिक होने का अर्थ है कि व्यक्ति अपने अनुभव के धरातल पर यह जानता है कि वह स्वयं अपने आनंद का स्रोत है। आध्यात्मिकता का संबंध हमारे आंतरिक जीवन से है। हमारा अधिकांश ज्ञान भौतिक है और उसी से हम परम आनंद पाने की आकांक्षा करते हैं जो पूर्णत: व्यर्थ है। आज के वातावरण में लोग भौतिकवाद के अनुसरण में व्यस्त हैं। 

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भौतिकवाद केवल बाहरी आवरण को समृद्ध बना सकता है। इससे हम अपने भौतिक शरीर की जरूरतें पूरी कर सकते हैं। भौतिकवाद हमारे बाहरी शरीर को सुंदर बना सकता है परंतु इससे आंतरिक आनंद और उल्लास की अपेक्षा करना गलत है। 

भौतिकवाद एवं विज्ञान हमें संपूर्ण विश्व की बाहरी यात्रा करवा सकते हैं परंतु आंतरिक यात्रा तो केवल अध्यात्म के मार्ग पर चलकर ही हो सकती है। वे सभी गतिविधियां जो मनुष्य को परिष्कृत एवं निर्मल और आनंद से परिपूर्ण बनाती हैं, सब अध्यात्म से प्राप्त होती हैं। 
आध्यात्मिक जीवन ईश्वरीय ज्ञान एवं आनंद से भरी हुई एक नाव के समान है जो जीवन के उत्थान एवं पतन रूपी तूफानों में भी चलती रहती है। 

अध्यात्म मनुष्य को आंतरिक रूप से सशक्त बनाता है। लाभ-हानि, मान-अपमान, सुख-दुख, उत्थान-पतन सभी परिस्थितियों में आध्यात्मिक मार्ग का पथिक अविचल रूप से गतिमान रहता है। 

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सांसारिक रुकावटें उसकी इस गति को बाधित नहीं कर सकतीं। सभी प्राणियों में उसी परम सत्ता के अंश को अनुभव करने की प्रेरणा अध्यात्म ही प्रदान करता है। अध्यात्म विश्व बंधुत्व का मार्ग है जहां मनुष्य की ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, आपसी भेदभाव  समाप्त हो जाते हैं। प्रत्येक प्राणी में उसी दिव्य तत्व की अनुभूति होने लगती है। 

अध्यात्म की इसी समदर्शी तथा समत्व की भावना को योगेश्वर श्री कृष्ण जी ने अर्जुन को गीता के छठे अध्याय में वर्णन करते हुए कहा है कि जो मनुष्य सभी प्राणियों में स्थित आत्मा को अपने जैसा देखता है, ऐसा आध्यात्मिक मनुष्य सांसारिक वातावरण से अलग होकर सभी प्राणियों को ईश्वरमय समझने लगता है।

संसार के पदार्थों में अत्यधिक संलिप्तता तथा उपभोग की प्रवृत्ति हमें अध्यात्म के मार्ग से भटका देती है। अध्यात्म को अपने जीवन में अपना कर ही आनंद एवं शांति की अनुभूति की जा सकती है।

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