Edited By Sarita Thapa,Updated: 10 Oct, 2026 09:01 AM

हिंदू धर्म में नवरात्रि का पर्व मां दुर्गा की पूजा के लिए और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए बहुत खास माना जाता है। इन नौ दिनों में भक्त माता रानी के नौ स्वरूपो की पूजा करते हैं और पहले दिन शुभ मुहूर्त में घटस्थापना करते हैं।
Shardiya Navratri 2026 : हिंदू धर्म में नवरात्रि का पर्व मां दुर्गा की पूजा के लिए और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए बहुत खास माना जाता है। इन नौ दिनों में भक्त माता रानी के नौ स्वरूपो की पूजा करते हैं और पहले दिन शुभ मुहूर्त में घटस्थापना करते हैं। नवरात्रि की पूजा में कलश स्थापना के साथ जौ बोने की परंपरा भी निभाई जाती है। आपने अक्सर द9ेखा होगा कि नवरात्रि के पहले दिन मिट्टी के पात्र में जौ बोए जाते हैं और नौ दिनों तक उनक देखभाल की जाती है। लेकिन कभी आपने सोचा है कि आखिर इस परंपरा के पीछ क्या कारण है और इसे ब्रह्मा जी से कैसे जोड़ा जाता है। तो आइए जानते हैं इसके बारे में विस्तार से।
नवरात्रि में जौ बोने की परंपरा क्यों है खास?
हिंदू धर्म में जौ को शुभता, समृद्धि और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि के पहले दिन जब घटस्थापना की जाती है, तब पूजा स्थल पर मिट्टी के पात्र में जौ बोने की परंपरा कई घरों में प्रचलित है। इसके बाद नियमित रूप से पूजा की जाती है और जौ में अंकुर निकलने का इंतजार किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जौ के अंकुरित होने को खुशहाली, उन्नति और जीवन में नई ऊर्जा के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। नवरात्रि के अंतिम दिनों में इन अंकुरों को श्रद्धापूर्वक मां दुर्गा को अर्पित किया जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में इन्हें ज्वारे या जवारे भी कहा जाता है।
ब्रह्मा जी से जुड़ी क्या है पौराणिक मान्यता?
पौराणिक मान्यताओं में जौ का संबंध सृष्टि की शुरुआत और जीवन के विकास से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि सृष्टि की रचना करने वाले ब्रह्मा जी ने सबसे पहले वनस्पतियों और अन्न को महत्व दिया। इसी कारण जौ को सृष्टि, अन्न और जीवन के पोषण का प्रतीक माना जाता है। एक अन्य धार्मिक धारणा के अनुसार, जौ को प्रमुख प्राचीन अनाजों में गिना जाता है और वैदिक परंपराओं में भी इसका इस्तेमाल होता रहा है। यज्ञ, हवन और कई धार्मिक अनुष्ठानों में जौ का प्रयोग किया जाता है। यही वजह है कि नवरात्रि की घटस्थापना में इसे शुभ सामग्री के रूप में शामिल किया जाता है। हालांकि, ब्रह्मा जी से जुड़ी इस मान्यता के अलग-अलग रूप मिलते हैं। इसलिए इसे धार्मिक परंपरा और आस्था के रूप में समझना उचित है।
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