Edited By Niyati Bhandari,Updated: 19 Oct, 2026 03:55 PM

Bharat Swastik Yatra: प्रसिद्ध कथावाचक मोरारी बापू अमृतसर पहुंचे और सचखंड श्री हरिमंदर साहिब में नतमस्तक हुए। उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब जी की महिमा, महाराजा रणजीत सिंह के सुशासन और पंजाब की पावन धरा का बखान किया।
अमृतसर (परविंदर कुमार मिश्रा): प्रसिद्ध आध्यात्मिक कथावाचक मोरारी बापू सोमवार को गुरुओं की पावन नगरी अमृतसर पहुंचे। अमृतसर आगमन पर उन्होंने सबसे पहले सचखंड श्री हरिमंदर साहिब में नतमस्तक होकर दर्शन-दीदार किए और गुरबानी का आनंद लिया। बापू ने पंजाब की भूमि को धन्य बताते हुए कहा कि उन्होंने पूरा विश्व देखा है, लेकिन श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के प्रति जैसी अपार श्रद्धा यहां देखने को मिलती है, वैसी दुनिया में कहीं और नहीं है।
'ग्रंथ साहिब जी को गुरु मानना ऐतिहासिक और क्रांतिकारी निर्णय'
श्री हरिमंदर साहिब में दर्शन के उपरांत मोरारी बापू ने कहा कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की महिमा अपरंपार है। सिखों के गुरु साहिबान द्वारा 'शब्द गुरु' यानी ग्रंथ जी को ही गुरु घोषित करने का निर्णय मानव इतिहास का सबसे बड़ा और क्रांतिकारी कदम है। बापू ने भावुक होकर कहा, "अमृतसर में मेरी पहली कथा बहुत वर्ष पहले हुई थी। गुरु नगरी में तो तभी बुलावा आता है जब गुरु की कृपा होती है। अब मैं संकल्प लेता हूं कि अगले साल मैं कहीं भी रहूँ, 9 दिनों की कथा के लिए अमृतसर ज़रूर आऊंगा।"
श्री हरिमंदर साहिब के 4 द्वार और महाराजा रणजीत सिंह का सुशासन
बापू ने श्री हरिमंदर साहिब के चार द्वारों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये चारों द्वार स्वस्तिक का प्रतीक हैं, जो सभी धर्मों और वर्गों के लिए खुले हैं। उन्होंने महाराजा रणजीत सिंह के शासन की प्रशंसा करते हुए कहा कि कई राजा आए और गए, लेकिन महाराजा रणजीत सिंह ने दुनिया को सिखाया कि वास्तव में राज कैसे चलाया जाता है। यहां केंद्र में गुरुद्वारा साहिब हैं और उस केंद्र का भी परम केंद्र 'श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी' हैं।
संगत, पंगत और लंगर: दुनिया के लिए पंजाब का महान संदेश
मोरारी बापू ने कहा कि पंजाब की यह पावन धरा पूरे विश्व को 'संगत, पंगत और लंगर' का दिव्य संदेश देती है। यहां विशाल संगत के कारण भले ही कड़ा प्रसाद थोड़ा-थोड़ा मिलता है, लेकिन उसका स्वाद अद्भुत और अलौकिक होता है। दर्शन के दौरान सेवादारों और प्रशासन का पूरा सहयोग मिला। इस दौरान बापू ने स्वयं गुरबानी कीर्तन "ठाकुर तुम शरणगत..." का गायन किया।
'सत्य, मौन और विवेक ही जीवन का सच्चा आधार'
अपने प्रवचन में बापू ने जीवन मूल्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा:
सत्य व मौन: 'एक ओंकार सत नाम' का अर्थ है कि सत्य के समान कोई धर्म नहीं है। तुलसीदास जी ने भी रामचरितमानस में सत्य को ही धर्म माना है। मीरा ने गाकर-नाचकर कृष्ण को रिझाया, लेकिन मौन के समान कोई तप नहीं है।
वाणी की मर्यादा: अपनी बोली से किसी का अपमान न करें, क्योंकि वाणी का दुरुपयोग सरस्वती का अपमान है।
विवेक की आवश्यकता: ज्ञान होने के बावजूद यदि इंसान के पास विवेक न हो, तो वह भारी भूल कर बैठता है। जब मनुष्य गलत काम करता है तो न ग्रंथ याद रहता है और न विवेक।
सद्गुण और दोष: जाप के समान कोई यज्ञ नहीं, क्रोध के समान कोई अग्नि नहीं और निंदा के समान कोई नर्क नहीं है। निंदा करने वाला सीधे नर्क का वासी बनता है।
चुंबक और लोहे के दृष्टांत से समझाया ईश्वर प्रेम
बापू ने चुंबक और लोहे का उदाहरण देते हुए कहा कि सोना कितना भी महंगा क्यों न हो, चुंबक उसे अपनी ओर नहीं खींचता। लेकिन साधारण और सस्ता लोहा तुरंत चुंबक से चिपक जाता है। इसी प्रकार, यदि आप ईश्वर के समक्ष महंगे सोने के बजाय लोहे की तरह साधारण और नम्र बनकर जाएंगे, तो भगवान स्वयं आपकी ओर आकर्षित हो जाएंगे।
कथा पांडाल में छाया वैराग्य, बापू की आंखें हुईं नम
कथा के दौरान अमीर खुसरो की गुरु-भक्ति और सूरदास जी के कृष्ण-विरह के प्रसंग का वर्णन करते हुए बापू का हृदय भर आया। व्यास पीठ से बोलते हुए बापू स्वयं रो पड़े और पूरा पांडाल भाव-विभोर हो गया। बापू ने कहा कि यह शूरवीरों और साधु-संतों की भूमि है। बापू ने बताया कि उन्हें वाघा बॉर्डर के पास कथा करने की अनुमति मिली थी, लेकिन इस पावन धरा के गुरुजनों की आज्ञा से वे यहां आकर विचार साझा कर रहे हैं।