Edited By Sarita Thapa,Updated: 04 Aug, 2026 09:00 AM

प्रसंग उस समय का है, जब सम्राट अशोक ने कलिंग विजय कर ली थी। उस युद्ध में भारी संख्या में निरपराध लोग मारे गए थे। बहुत से बच्चे अनाथ हो गए और स्त्रियां विधवा हो गईं। सम्राट अशोक अपने विजय गर्व में चूर हो रहे थे।
Inspirational Story : प्रसंग उस समय का है, जब सम्राट अशोक ने कलिंग विजय कर ली थी। उस युद्ध में भारी संख्या में निरपराध लोग मारे गए थे। बहुत से बच्चे अनाथ हो गए और स्त्रियां विधवा हो गईं। सम्राट अशोक अपने विजय गर्व में चूर हो रहे थे। जीत का जश्न मनाया जा रहा था। अशोक अपनी माता को बता रहे थे, ‘‘कलिंग नरेश मेरी अधीनता स्वीकार नहीं कर रहा था। मैंने उसे ही नहीं पूरे कलिंग को राख के ढेर में तबदील कर दिया।’’
सम्राट अशोक सोच रहे थे कि माता उनके इस विजय पर गर्व करेंगी, खुश होंगी। लेकिन सम्राट अशोक की अहंकारपूर्ण बातें सुनकर माता दुखी हो रही थीं। उनकी आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे। वह इस युद्ध और उसके परिणाम से अत्यंत दुखी थीं। माता को दुखी देखकर अशोक को आश्चर्य हुआ। उसने पूछा, ‘‘माता! आप रो रही हैं? ऐसा क्यों?
आपको तो अपने वीर और विजयी पुत्र पर गर्व होना चाहिए। प्रसन्न होना चाहिए कि आपके पुत्र ने कलिंग पर विजय प्राप्त कर ली है।’’
महारानी ने उत्तर में जो शब्द कहे, वे बहुत मार्मिक और झकझोरने वाले थे। महारानी ने अशोक से कहा, ‘‘पुत्र! तेरा नाम अशोक है, यानी दुनिया को शोकमुक्त करने वाला, लेकिन तू तो संसार में शोक का ही प्रसार कर रहा है। तनिक विचार कर कि जिन लाखों नारियों के पुत्र और पति मृत्यु को प्राप्त हुए हैं, उनमें यदि एक तू स्वयं भी होता तो तेरी माता को कितनी पीड़ा होती?’’ महारानी इससे अधिक कुछ नहीं कह पाईं, लेकिन माता के वचनों ने अशोक का हृदय परिवर्तन कर दिया और उन्होंने युद्ध का मार्ग छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया।
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