Edited By Sarita Thapa,Updated: 03 Oct, 2026 04:10 PM

हिंदू धर्म में जीवितपुत्रिका व्रत का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। यह व्रत माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना करने के लिए रखती हैं।
Jitiya Vrat 2026 : हिंदू धर्म में जीवितपुत्रिका व्रत का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। यह व्रत माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना करने के लिए रखती हैं। जितिया का व्रत हर साल अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। इस साल जीवितपुत्रिका व्रत 3 अक्टूबर 2026, शनिवार के दिन रखा जाएगा। यह व्रत मुख्य रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और नेपाल में रखा जाता है। धार्मिक दृष्टि से यह व्रत बहुत कठिन माना जाता है, क्योंकि इसमें माताएं पूरे 24 घंटे से अधिक समय तक निर्जला व्रत रखती हैं। अगर आप भी इस साल जितिया का व्रत रखने जा रही हैं, तो आइए जानते हैं कि इस पावन व्रत की सही तिथि और नहाय-खाय से लेकर पारण तक की पूरी विधि के बारे में-
जितिया व्रत विधि
जितिया व्रत की शुरुआत नहाय-खाय के साथ होती है। इस दिन माताएं सुबह जल्दी उठकर नदी, तालाब या घर पर ही पवित्र जल से स्नान करती हैं और स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं।
स्नान के बाद केवल सात्विक भोजन ही पकाया जाता है। भोजन में मुख्य रूप से नोनी का साग, रागी की रोटी, तोरई की सब्जी और चना दाल बनाई जाती है।
नहाय-खाय के दिन की देर रात या तड़के माताएं मीठा या सात्विक आहार ग्रहण करती हैं, इसके बाद से ही निर्जला व्रत का संकल्प शुरू हो जाता है।
इस दिन पूरे दिन और पूरी रात पानी की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की जाती है। शाम के समय पूजा स्थान को गोबर से लीपकर साफ किया जाता है। फिर मिट्टी या गोबर से राजा जीमूतवाहन और चील-सियारी की मूर्तियां बनाई जाती हैं।
जीमूतवाहन को सरसों का तेल, खली, कुशा, सिंदूर और फल-फूल अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद सभी महिलाएं एकत्र होकर जीवितपुत्रिका व्रत की कथा सुनती हैं। पूजा के बाद चढ़ाया गया तेल और खली संतान के सिर पर लगाया जाता है ताकि उस पर जीमूतवाहन की कृपा बनी रहे।
व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद ही जितिया व्रत का पारण किया जाता है। सुबह स्नान करके सूर्य देव को जल अर्पित किया जाता है। इसके बाद ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को अनाज, कपड़े और दक्षिणा का दान दिया जाता है।
पारण में सबसे पहले नोनी का साग, मरुआ की रोटी और तोरई की सब्जी खाकर ही व्रत खोला जाता है। इसके बाद ही माताएं अन्न और जल ग्रहण करती हैं।