एक ऐसा मंदिर जहां होता है भगवान शिव का माता पार्वती के साथ अनोखा मिलन

Edited By Updated: 19 Mar, 2020 04:23 PM

kathgarh mandir

हिमाचल प्रदेश को देवभूमि का दर्जा प्राप्त है। इस स्थान पर बहुत सारे ऐसे मंदिर स्थापित हैं,

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हिमाचल प्रदेश को देवभूमि का दर्जा प्राप्त है। इस स्थान पर बहुत सारे ऐसे मंदिर स्थापित हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते होंगे। जहां पूरे विश्व में भोलेनाथ के मंदिर स्थापित हैं, तो वहीं कांगड़ा जिले में भगवान शिव का ऐसा मंदिर विख्यात है, जहां उनका मिलन माता पार्वती के साथ होता है। जी हां, आज हम आपको उसी मंदिर के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं। चलिए जानते हैं, उस मंदिर के इतिहास के बारे में- 
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कांगड़ा जिले के इंदौरा उपमंडल में स्‍थापित काठगढ़ महादेव मंदिर काफी रहस्‍यमयी है। दावा है कि इस मंदिर में विराजमान शिवलिंग दुनिया का पहला ऐसा श‍िवलिंग है जो दो भागों में विभाजित है। इसके एक भाग को शिव तो दूसरे को मां पार्वती का रूप माना जाता है। जी है, बता दें कि मंदिर में स्‍थापित शिवलिंग अष्‍टकोणीय है। शिव के रूप में पूजे जाने वाले शिवलिंग की ऊंचाई तो 8 फुट है वहीं माता पार्वती के रूप में पूजे जाने वाले हिस्‍से की ऊंचाई 6 फुट है। इसी के साथ दो भागों में विभाजित शिवलिंग को अर्द्धनारीश्‍वर शिवलिंग कहा जाता है। कहा जाता है कि जैसे माता पार्वती भोलेनाथ के आधे अंग पर विराजती हैं वैसे ही इस शिवलिंग में भी वह विराजमान हैं। यूं तो यह शिवलिंग दो भागों में अलग-अलग रहता है। लेकिन सर्दी के मौसम में यह दोनों करीब आ जाते हैं। यह कैसे होता इस बारे में केवल यही कहा जाता है कि ग्रहों की स्थिति के अनुसार ही शिवलिंग पास और दूर होते हैं।
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मान्यता है, त्रेता युग में भगवान राम के भाई भरत जब भी अपने ननिहाल कैकेय देश अर्थात कश्मीर जाते थे, तो काठगढ़ में शिवलिंग की पूजा किया करते थे। शिवरात्रि के त्यौहार पर प्रत्येक वर्ष यहां पर तीन दिवसीय भारी मेला लगता है। शिव और शक्ति के अर्द्धनारीश्वर स्वरुप श्री संगम के दर्शन से मानव जीवन में आने वाले सभी पारिवारिक और मानसिक दु:खों का अंत हो जाता है।
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काठगढ़ मंदिर के सौंदर्यीकरण के बारे में कथा मिलती है कि महाराजा रणजीत सिंह को यह धाम अत्‍यंत प्रिय था। उन्‍होंने अपने शासनकाल के दौरान मंदिर का विस्‍तार किया। उनकी काठगढ़ मंदिर के प्रति इतनी अगाध आस्‍था थी कि वह प्रत्‍येक शुभ कार्य में मंदिर के समीप ही स्थित कुएं का जल प्रयोग करते थे।

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