Edited By Sarita Thapa,Updated: 12 Jul, 2026 01:02 PM

राजा भोज एक दिन भोजन कर रहे थे कि तभी एक मधुमक्खी उनके पास आकर बैठ गई और आदतन अपने हाथ-पैर रगड़ते हुए उन्हें सिर पर लगाने लगी। भोज ने राज पुरोहित से पूछा, “यह ऐसा क्यों कर रही है?
Motivational Story : राजा भोज एक दिन भोजन कर रहे थे कि तभी एक मधुमक्खी उनके पास आकर बैठ गई और आदतन अपने हाथ-पैर रगड़ते हुए उन्हें सिर पर लगाने लगी। भोज ने राज पुरोहित से पूछा, “यह ऐसा क्यों कर रही है?
राज पुरोहित ने जवाब दिया कि राजन, यह दान का महत्व समझाते हुए कह रही है कि आप जैसे राजाओं को धन संचय नहीं करना चाहिए।
मैंने भी कितनी मेहनत से अपने छत्ते में शहद एकत्रित किया मगर मैं उसका उपयोग नहीं कर पाई और न ही किसी को दान दिया। इसे दूसरों ने लूट लिया। आप भी अपने धन का सदुपयोग करते हुए दान देना प्रारंभ करें। राजा भोज ने इस बात को काफी गंभीरता से लिया। वह उसी दिन से विद्वानों और निर्धनों को खुलकर दान करने लगे।

उनकी इस उदारता से चिंतित होकर राज्य के कोषाध्यक्ष ने राजकोष के द्वार पर लिखवा दिया, “राजा को आपात काल के लिए धन सुरक्षित रखना चाहिए।”
जब राजा भोज की उस पंक्ति पर नजर पड़ी तो उन्होंने उसके नीचे लिखवा दिया, “जिन पर लक्ष्मी की कृपा हो उन पर विपत्ति कैसी?”
कोषाध्यक्ष ने फिर लिखवा दिया, “कभी-कभी दुर्भाग्य से धनवानों पर भी विपत्ति आ सकती है।”
भोज ने इसे पढ़कर लिखवाया, “यदि दुर्भाग्य से धनवानों पर विपत्ति आ सकती है तो एकत्र किया हुआ धन भी नष्ट हो सकता है।”
राजा भोज के इस तर्क का कोई उत्तर कोषाध्यक्ष को नहीं सूझा। उस दिन से उसने कुछ भी लिखवाना बंद कर दिया। दान का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह आगे भी चलता रहा। ऐसा करके भोज ने प्रजा के हृदय में अपने लिए एक विशेष जगह बना ली।

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