Edited By Sarita Thapa,Updated: 28 Jun, 2026 12:54 PM
कबीर साहब का आविर्भाव वि.स.1456 ईस्वी सन् 1398 ज्येष्ठ पूॢणमा सोमवार को हुआ। इसी दिन काशी के जुलाहे नीरू अपनी नवविवाहित नीमा का गौना करा कर अपने घर वापस आ रहे थे कि रास्ते में नीमा को प्यास लगी।
Sant Kabir Sakhis : कबीर साहब का आविर्भाव वि.स.1456 ईस्वी सन् 1398 ज्येष्ठ पूॢणमा सोमवार को हुआ। इसी दिन काशी के जुलाहे नीरू अपनी नवविवाहित नीमा का गौना करा कर अपने घर वापस आ रहे थे कि रास्ते में नीमा को प्यास लगी। रास्ते में लहरतारा तालाब था और नीमा पानी पीने के लिए तालाब में नीचे उतरी और पानी पीने ही लगी थी कि वहां कमल दल के गुच्छ पर किसी शिशु के रोने की आवाज सुनाई दी। नीरू और नीमा आपसी सहमति से इस बालक को घर ले गए जो बाद में कबीर साहिब हुए। जहां कबीर साहिब पाए गए, उसी स्थान को प्रकटस्थली कहा जाता है और वहीं प्रकटस्थली मंदिर बनाया गया। इसी मंदिर में देश-विदेश से कबीर पंथी व अन्य धर्मों के लोग आकर कबीर जी का आशीर्वाद लेते हैं।
मूलगादी कबीर चौरामठ सिद्धपीठ काशी बनारस कबीर साहिब की कर्मभूमि है। कबीर साहिब के माता-पिता कपड़ा बुनने का कार्य करते थे। नीरू टीला कबीर जी का घर था जहां नीरू और नीमा रहते थे। वहीं कबीर साहब का लालन-पालन हुआ। कबीर जी अपने माता-पिता के साथ कपड़ा बुनने के कार्य में हाथ बंटाने लगे और इस कार्य में निपुण हो गए। उनका झुकाव परमार्थ की ओर था तथा उनमें गूढ़ तत्वों को समझ कर उनकी गहराई जानने तथा उनका विवेचन करने की असाधारण योग्यता थी।
एक जोति सै सब उत्पनो कौन बाम्हन कौन सूदा।
आत्मा की कोई जाति नहीं है। सब जीव उस एक परम ज्योति से उत्पन्न हुए हैं न कोई ऊंचा है न नीचा न कोई अच्छा है न बुरा।
जाति नहि जगदीश की, हरिजन की कहा होय।
जात-पात के कीच में डूब मरो मत कोय।।
प्रभु की कोई जाति नहीं है तो इसके भक्तों की क्या जाति हो सकती है।
सांच बराबरि तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदै सांच है ताकै हृदय आप॥
सत्य के समान संसार में कोई तप नहीं है और झूठ के समान कोई पाप नहीं है जिनके हृदय में सत्य का निवास है, उनके हृदय में ईश्वर स्वयं वास करते हैं।
साखी आंखी ज्ञान की, समुझि देख मन माहि।
बिनु साखी संसार का, झगड़ा छूटत नाँहि॥
कबीर साहब की साखियां हमारे जीवन की आंखें हैं। साखी के बिना हम अज्ञान के अंधकार में डूबे रहते हैं। साखी अज्ञानता के अंधकार को दूर करती है और उसे प्रकाश में बदल देती है। संसार में झगड़े इतने बढ़ गए हैं कि इनसे बचने के लिए साखी ही झगड़े और अज्ञानता को दूर करती है। अज्ञानता खत्म हो जाए तो सारे झगड़े समाप्त हो जाएंगे।

पोथी पढि़-पढि़ जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
एकै आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होइ॥
पोथी पढ़-पढ़ कर सारा जग मर गया पर कोई पंडित नहीं हुआ जो प्रेम का एक अक्षर पढ़ लेता है वही पंडित होता है।
नां कुछ किया न करि सक्या, नां करणें जोग सरीर।
जे कुछ किया सु हरि किया, ताथैं भया कबीर-कबीर॥
कबीर साहब कहते हैं कि मैंने इस संसार में कुछ नहीं किया। कुछ कर ही नहीं सका। मुझमें करने की सामथ्र्य ही नहीं थी। वास्तव में जो कुछ भी किया है, वह ईश्वर ने ही किया है। ईश्वर के करने से ही मैं सामान्य जुलाहा कबीर से भक्त कबीर बन गया।
जिन ढूंढा तिन पाइया, गहरे पानी पैठि।
मैं बपुरा बूढऩ डरा, रहा किनारे बैठि।।
जिन्होंने ज्ञानरूपी सागर के गहरे पानी में घुस कर ढूंढा उन्हें ही ईश्वर रूपी अमूल्य रत्न की प्राप्ति हुई। जो इस डूबने से डरता रहा वह किनारे ही बैठा रहा और उसे ईश्वर की प्राप्ति नहीं हुई। कबीर साहब ने अपना सम्पूर्ण जीवन समाज में व्याप्त अन्याय एवं कुरीतियों को समाप्त करने में लगा दिया और अपने इरादों पर डटे रहे और लोगों को भक्ति के मार्ग पर चलने का उपदेश दिया। कबीर साहिब की साखियां अज्ञानता को दूर कर सत्य का साक्षात्कार कराती हैं। साखी के बिना हम अज्ञान के अंधकार में डूबे रहते हैं। कबीर साहब क्रांतिकारी व महान समाज सुधारक थे। उन्होंने अपना जीवन निर्गुण भक्ति में व्यतीत करते हुए समाज में फैली जात-पात और अंधविश्वास का विरोध किया और झूठे रीति-रिवाजों को ठुकराने को कहा और भक्ति में लीन होकर ईश्वर को पाने का संदेश दिया।

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