Edited By Niyati Bhandari,Updated: 11 Aug, 2026 01:50 AM

किताब और कैलेंडर
पत्नी ने पति को किताब पढ़ते देखा और कहा ‘‘काश, मैं किताब होती तो तुम मुझे ही देखते रहते।’’
किताब और कैलेंडर
पत्नी ने पति को किताब पढ़ते देखा और कहा ‘‘काश, मैं किताब होती तो तुम मुझे ही देखते रहते।’’
पति झट से बोला, ‘‘काश, तुम कैलेंडर होती तो मैं हर साल बदल देता।’’
पति-पत्नी के ये तो हाल हैं और कहते हैं कि ‘कहो न प्यार है।’ हिन्दुस्तान-पाकिस्तान जैसे हालात हैं और कहते हैं कि ‘हम साथ-साथ हैं’। अहंकार से तर्क और तर्क से नर्क। परिवार को हरिद्वार बनाना है तो तर्क से नहीं समर्पण से जिएं।

स्थायी आनंद
रबड़ की निप्पल का करिश्मा देखिए कि उससे रोता हुआ बच्चा चुप हो जाता है और संत की वाणी का करिश्मा देखिए कि आदमी अभाव की जिंदगी में भी खुश हो जाता है।
याद रखना : सुख हो या दुख, दोनों ही दूध के दांत हैं। इनका टूटना यानी जाना तय है।

चलते रहो
सुख-दुख स्थायी नहीं होते। स्थायी तो आनंद है, जो साधनों से नहीं - साधना से मिलता है, वासना से नहीं - उपासना से मिलता है। परिवर्तन नित्य है। सृष्टि की हर वस्तु परिवर्तनशील है। सूरज दिन में तीन रूप धरता है। बिना बदले जीवन ठहर जाता है। ठहरा हुआ पानी सड़ जाता है। रोटी जल जाती है। पान गल जाता है।
समाज पंगु हो जाता है। राष्ट्र भ्रष्टाचार में डूब जाता है और संत अपनी साधना से गिरकर गृहस्थों जैसा बन जाता है। इसलिए चलते रहो, बहते रहो, रुको मत, थको मत। थोड़ा विश्राम और फिर सावधान। यही है सच्चा विश्राम।

सुख में इतराना नहीं
दुख किसके जीवन में नहीं आता। गरीब हो या अमीर, संत हो या संसारी, छोटा हो या बड़ा, सबकी जिंदगी में दुख आता है। जिंदगी में सबको दुख का सामना करना पड़ता है।
फर्क सिर्फ इतना है कि कोई दुख से निपट लेता है और किसी को दुख निपटा देता है। अगर आप मेरा कहा मानें तो मैं आपसे निवेदन करूंगा कि दुख में रोना नहीं और सुख में सोना नहीं। मतलब दुख में घबराना नहीं और सुख में इतराना नहीं।