Edited By Niyati Bhandari,Updated: 26 Sep, 2026 11:09 AM

Pitru Paksha Shradh Katha:हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का विशेष महत्व है। महाभारत काल के अनुसार जानें दुनिया में सबसे पहले श्राद्ध का उपदेश किसने दिया, अग्निदेव को पहली आहुति क्यों दी जाती है और 3 पिंडों का क्या विधान है।
Pitru Paksha Shradh Katha: हिंदू धर्म में पितृ पक्ष यानी श्राद्ध पक्ष का विशेष महत्व माना जाता है। इन दिनों में पूर्वजों (पितरों) को श्रद्धापूर्वक याद किया जाता है और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए तर्पण व पिंडदान किया जाता है। हालांकि, बहुत कम लोग ये बात जानते हैं कि इस संसार में श्राद्ध करने की परंपरा सबसे पहले कैसे शुरू हुई और यह जनमानस तक किस प्रकार पहुंची। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने धर्मराज युधिष्ठिर को श्राद्ध की उत्पत्ति और इसकी परंपरा से जुड़े कई गूढ़ रहस्य बताए थे। आप भी जानें

महातपस्वी अत्रि और महर्षि निमि: सबसे पहला उपदेश और शुरुआत
महाभारत के अनुसार, सबसे पहले महातपस्वी अत्रि मुनि ने महर्षि निमि को श्राद्ध कर्म का उपदेश दिया था। अत्रि मुनि से उपदेश प्राप्त करने के बाद महर्षि निमि ने पूरे विधि-विधान से श्राद्ध करना प्रारंभ किया। महर्षि निमि को श्राद्ध करते देख अन्य ऋषि-मुनि भी प्रेरित हुए और उन्होंने भी अपने पितरों को अन्न देना शुरू कर दिया। लगातार श्राद्ध का भोजन ग्रहण करते-करते देवता और पितर पूरी तरह से तृप्त हो गए।
अग्निदेव को क्यों दी जाती है श्राद्ध की पहली आहुति?
श्राद्ध के भोजन में सबसे पहला भोग अग्निदेव को अर्पित करने के पीछे एक विशेष पौराणिक कारण है। जब ऋषि-मुनियों द्वारा दिए गए भोजन से देवता और पितर पूर्ण तृप्त हो गए, तो उन्हें अजीर्ण (पाचन संबंधी) समस्या होने लगी। तब अग्निदेव ने देवताओं और पितरों से कहा कि अब से श्राद्ध में हम सभी एक साथ मिलकर भोजन करेंगे। अग्निदेव के पास रहने से देवताओं और पितरों का अजीर्ण रोग दूर हो गया। इसी प्रसन्नता के कारण यह नियम बना कि श्राद्ध का सबसे पहला भोजन अग्निदेव को समर्पित किया जाता है, जिसके बाद ही देवताओं और पितरों को भोजन दिया जाता है।
श्राद्ध में 3 पिंडों का विधान और उनका महत्व
महाभारत में श्राद्ध कर्म के दौरान 3 पिंड अर्पित करने का स्पष्ट विधान बताया गया है:
पहला पिंड: जल में अर्पित किया जाता है।
दूसरा पिंड: गुरुजनों को दिया जाता है।
तीसरा पिंड: अग्नि को समर्पित किया जाता है।
शास्त्रों के अनुसार, इन तीन पिंडों का विधिवत दान करने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
कब से कब तक रहता है पितृ पक्ष?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितृ पक्ष हर साल भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि से शुरू होकर अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) तक रहता है। इन 16 दिनों की अवधि में पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और दान-पुण्य करने से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
