Edited By Niyati Bhandari,Updated: 17 Sep, 2026 11:01 AM
Vishwakarma Jayanti Vrat Katha in Hindi: भगवान विश्वकर्मा की पूजा में उनसे जुड़ी कथाएं पढ़ना बेहद शुभ माना गया है। जानें, वह पौराणिक कथाएं। शास्त्रों के अनुसार, जो भी व्यक्ति भक्ति-भाव से भगवान विश्वकर्मा का पूजन करता है तथा इन कथाओं को पढ़ता या...
Vishwakarma Puja Vrat Katha: हर वर्ष 17 सितंबर को ब्रह्मांड के प्रथम शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा की जयंती श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जाती है। इस पावन अवसर पर देश भर के कुशल कामगार, शिल्पकार, कारीगर तथा औजारों, हथियारों व मशीनों का प्रयोग करने वाले लोग अपने-अपने उपकरणों की विशेष सफाई करते हैं, उनका पूजन करते हैं और भगवान को प्रसाद अर्पित करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन पूजन विधान के साथ भगवान विश्वकर्मा से जुड़ी कथाएं करना या सुनना बेहद शुभ माना गया है।
Mythological stories of Lord Vishwakarma भगवान विश्वकर्मा की पौराणिक कथाएं
सृष्टि के आदिकाल, जो पाषाण युग कहलाता है, में आज का यह मानव समाज वनमानुष के रूप में वन-पर्वतों पर इधर से उधर उछल-कूद कर रहा था। मनुष्य की उस प्राकृतिक अवस्था में खाने के लिए कंदमूल, फल और पहनने को वलकल तथा निवास के लिए गुफाएं थीं। उस प्राकृतिक अवस्था से आधुनिक अवस्था में मनुष्य को जिस शिल्पकला विज्ञान ने सहारा दिया, उस शिल्पकला विज्ञान के अधिष्ठाता एवं आविष्कारक महर्षि आचार्य विश्वकर्मा थे। शिल्प विज्ञान प्रवर्तक अथर्ववेद के रचयिता कहे जाते हैं। अथर्ववेद में शिल्पकला विज्ञान के अनेकों आविष्कारों का उल्लेख है। पुराणों ने भी इसको विश्वकर्मा रचित ग्रंथ माना है, जिसके द्वारा अनेकों विद्याओं की उत्पत्ति हुई।
मानव जीवन की यात्रा का लंबा इतिहास है और इसका बहुत लंबा संघर्ष है। भगवान विश्वकर्मा ने उसे सबसे पहले शिक्षित और प्रशिक्षित किया ताकि उसे विभिन्न शिल्पों में प्रशिक्षित किया जा सके। इस तरह मानव की संस्कृति और सभ्यता का प्रथम प्रवर्तक भगवान विश्वकर्मा जी हुए जिसे वेदों ने स्वीकार किया है और उनकी स्तुति की है।
इस प्रकार विभिन्न कलाओं का विकास हुआ। धर्म ग्रंथों में कहा जाता है कि भगवान विश्वकर्मा के पांच पुत्र हुए। उन्होंने अपने पांचों पुत्रों को विभिन्न शिल्पों में दक्ष बनाया। प्रथम पुत्र मनु लौह कला में प्रवीण हुआ, दूसरा पुत्र मय काष्ठ कला का ज्ञाता बना, तीसरे पुत्र स्वष्टा ने तॉम्ब्र कला में विशेषता प्राप्त की, चौथा पुत्र शिल्पी पाषाण कला का मर्मज्ञ हुआ और पांचवां पुत्र दैवज्ञ स्वर्ण कला का ज्ञाता बना। उनके पांचों पुत्रों ने विश्वकर्मा के शिल्पकला विज्ञान का विकास और विस्तार किया, जिसके फलस्वरूप मानव जाति को सुख-सुविधा के लिए अनेक साधन-प्रसाधन प्राप्त हुए।
विश्वकर्मा ने मानव जाति को शासन-प्रशासन में प्रशिक्षित किया। उन्होंने अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का आविष्कार और निर्माण किया, जिससे मानव जाति सुरक्षित रह सके। उन्होंने अपनी विमान निर्माण विद्या से अनेक प्रकार के विमानों के निर्माण किए जिन पर देवतागण तीनों लोकों में भ्रमण करते थे। उन्होंने स्थापत्य कला से शिवलोक, विष्णुलोक, इंद्रलोक आदि अनेक लोकों का निर्माण किया। भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र, इंद्र के वज्र और महादेव के त्रिशूल का भी उन्होंने निर्माण किया जो अमोघ अस्त्र माने जाते हैं। आज शिल्पकला विज्ञान के जो भी चमत्कार देखने को मिलते हैं, वे सभी भगवान विश्वकर्मा की देन हैं।
सभी देवताओं ने भगवान विश्वकर्मा को ही सक्षम देव समझा तथा उन सब के आग्रह पर वह पृथ्वी के प्रथम राजा बने, इन सभी चीजों का जिक्र भारतवर्ष के वेद पुराणों में है। कश्यप मुनि को राज-सत्ता सौंपकर विश्वकर्मा भगवान शिल्पकला विज्ञान के अनुसंधान के लिए शासन मुक्त हो गए क्योंकि भारत के आर्थिक विकास और स्वावलंबन के लिए यह आवश्यक था। कुछ दिनों के शासन में विश्वकर्मा भगवान ने शासन को सक्षम, समर्थ तथा शक्तिशाली बनाने के अनेकों सूत्रों का निर्माण किया जिस पर गहराई से शोध करने की आज आवश्यकता है।

Vishwakarma Vrat Katha: भगवान विश्वकर्मा की महत्ता को सिद्ध करने वाली एक कथा के अनुसार, काशी में धार्मिक आचरण रखने वाला एक रथकार अपनी पत्नी के साथ रहता था। वह अपने कार्य में निपुण तो था, परंतु स्थान-स्थान पर घूमने और प्रयत्न करने पर भी वह भोजन से अधिक धन प्राप्त नहीं कर पाता था। उसके जीविकोपार्जन का साधन निश्चित नहीं था। पति के समान ही पत्नी भी पुत्र न होने के कारण चिंतित रहती थी।
पुत्र प्राप्ति के लिए दोनों साधु-संतों के यहां जाते थे, लेकिन यह इच्छा पूरी न हो सकी। तब एक पड़ोसी ब्राह्मण ने रथकार की पत्नी से कहा, ‘तुम भगवान विश्वकर्मा की शरण में जाओ, तुम्हारी अवश्य ही इच्छा पूरी होगी और अमावस्या तिथि को व्रत कर भगवान विश्वकर्मा महात्म्य सुनो।’
इसके बाद रथकार एवं उसकी पत्नी ने अमावस्या को भगवान विश्वकर्मा की पूजा की, जिससे उसे धन-धान्य और पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई और वे सुखी जीवन व्यतीत करने लगे। तभी से विश्वकर्मा की पूजा धूमधाम से की जाने लगी।

Vishwakarma Katha: भगवान विश्वकर्मा ने कई मंदिरों का निर्माण किया और उन्हें सुंदर आकार व स्वरूप दिया। उन्हीं में से एक सोने की लंका भी है। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव ने माता पार्वती के साथ विवाह करने के बादे सोने की लंका का निर्माण विश्वकर्मा से करवाया था और जब गृह सृजन पर रावण को भी बुलाया गया तो उसने सोने का महल भगवान से मांग लिया।
कुछ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान कृष्ण ने द्वापर युग में भगवान विश्वकर्मा से ही द्वारिका नगरी का निर्माण करवाया था। इस नागरी की लंबाई, चौड़ाई और 48 कोस थी। उसमें वास्तु शास्त्र के अनुसार चौड़ी सड़कों, चौराहों और गलियों का निर्माण किया गया था। वहीं महाभारत के अनुसार तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युमाली का वध करने के लिए भगवान शिव जिस रथ से गए थे उसे विश्वकर्मा जी ने ही बनवाया था।
इसके अलावा मान्यता है कि भगवान कृष्ण के प्रेम में पागल गोपियां एक बार एक तालाब के किनारे उनका इंतजार कर रहीं थीं। कुछ दिनों बाद जब कृष्ण वहां आए तो उन्होंने गोपियों का समर्पण देखकर उस तालाब का नाम गोपी तालाब रखने का निर्णय किया। परंतु गोपियों ने उन्हें इस तालाब की जगह नया तालाब बनवाने को कहा। तब श्रीकृष्ण के आदेश पर विश्वकर्मा जी ने एक खूबसूरत तालाब का निर्माण किया, जिसे वर्तमान में गोपी तालाब के नाम से जाना जाता है।
एक अन्य मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने एक बार विश्वकर्मा जी से धरती पर उनका ऐसी जगह मंदिर बनाने को कहा जहां पांच कोस तक कोई शव न जलाया गया हो। इसके बाद विश्वकर्मा जी ने भगवान विष्णु का मंदिर बनवाया। आज यह मंदिर छत्तीसगढ़ में राजीव लोचन मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।
