Edited By Niyati Bhandari,Updated: 15 Sep, 2026 09:49 AM

Rishi Panchami Vrat Katha 2026: भाद्रपद शुक्ल पंचमी को मनाया जाने वाला ऋषि पंचमी व्रत महिलाओं को जाने-अनजाने हुए रजस्वला दोष से शुद्धि प्रदान करता है। जानिए 15 सितंबर 2026 को उत्तंक ब्राह्मण की पावन कथा।
Rishi Panchami 2026: सनातन धर्म में भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी के रूप में मनाया जाता है। यह केवल सामान्य त्योहार नहीं है, बल्कि सप्त ऋषियों को श्रद्धांजलि अर्पित करने और महिलाओं द्वारा रजस्वला काल के दौरान जाने-अनजाने हुई भूल या दोष से मुक्ति पाने के लिए रखा जाने वाला अत्यंत पवित्र व्रत है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माहवारी के समय शास्त्रों द्वारा तय नियमों का पालन न होने पर जो दोष लगता है, इस व्रत के अनुष्ठान से उस दोष का निवारण हो जाता है।
Rishi Panchami Vrat Katha ऋषि पंचमी व्रत कथा
किवदंतियों के अनुसार विदर्भ गांव में उत्तंक नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम सुशीला था जो की बहुत पतिव्रता थी। ब्राह्मण का एक पुत्र और पुत्री थी। ब्राह्मण ने खुशी-खुशी अपनी बेटी को विवाह करके विदा किया लेकिन कुछ समय पश्चात ही वो विधवा हो गई। दुखी होकर ब्राह्मण अपनी कन्या के साथ गंगा के पास कुटिया बनाकर रहने लगे।
एक दिन वो कन्या सो रही थी और उसका सारा शरीर कीड़ों से भार गया। ये देखकर ब्राह्मण की पत्नी बहुत घबरा गई और सारी बात जाकर ब्राह्मण को बताई और कहने लगी मेरी बेटी से ऐसी क्या गलती हो गई जो इसके साथ ऐसा हुआ ?

ब्राह्मण ने ध्यान लगाकर इस घटना का पता किया और देखा कि पिछले जन्म में भी ये कन्या ब्राह्मणी थी। रजस्वला के समय में उसने बर्तन छू दिए थे। जिस वजह से उसके शरीर में कीड़े पड़ गए हैं। रजस्वला अवस्था के चार दिन और दोष होते हैं, जो उत्तंक जी के अनुसार, रजस्वला काल में स्त्री पापग्रस्त मानी जाती है:
प्रथम दिवस: चाण्डाली के समान।
द्वितीय दिवस: ब्रह्मघातिनी के समान।
तृतीय दिवस: रजकी (धोबिन) के समान।
चतुर्थ दिवस: स्नान के पश्चात शुद्ध होती है।
पूर्वजन्म में इस कन्या ने ऋषि पंचमी व्रत के उत्सव का दर्शन किया था, जिसके शुभ प्रभाव से इसे पुनः ब्राह्मण कुल में जन्म मिला परंतु व्रत का अनादर करने के कारण इसकी देह कृमिमय हो गई।
इस समस्या का समाधान पाने के लिए ब्राह्मण ने कहा कि इस पाप से मुक्ति पाने के लिए कन्या से ऋषि पंचमी का व्रत कराया जाए। पिता की आज्ञा से पुत्री ने ऐसा ही किया और कुछ समय बाद इस व्रत के कारण उसके जीवन से सारे दुःख-दर्द दूर हो गए।
