Edited By Sarita Thapa,Updated: 11 Jul, 2026 01:03 PM

एक नगर सेठ की चार बहुएं बड़े क्रोधी स्वभाव की थीं। वे आपस में रोज लड़तीं। दिन-रात गृह क्लेश ही मचा रहता। इससे नाराज होकर देवी लक्ष्मी ने वहां से चले जाने की सोची। रात को देवी लक्ष्मी ने उस सेठ को स्वप्न दिखाया कि अब मैं जा रही हूं। जहां लड़ने-झगड़ने...
Religious Katha : एक नगर सेठ की चार बहुएं बड़े क्रोधी स्वभाव की थीं। वे आपस में रोज लड़तीं। दिन-रात गृह क्लेश ही मचा रहता। इससे नाराज होकर देवी लक्ष्मी ने वहां से चले जाने की सोची। रात को देवी लक्ष्मी ने उस सेठ को स्वप्न दिखाया कि अब मैं जा रही हूं। जहां लड़ने-झगड़ने वाले लोग रहते हैं वहां मैं नहीं रहती।
सेठ देवी लक्ष्मी के पैरों से लिपट गया और कहा मैं आपका परम भक्त रहा हूं। मुझे छोड़कर आप न जाएं। देवी लक्ष्मी को उस पर दया आई और कहा-कलह के स्थान पर मेरा ठहरना तो संभव नहीं। ऐसी स्थिति में अब मैं तुम्हारे घर तो किसी भी स्थिति में न रहूंगी पर तुझे मांगना हो तो एक वरदान मुझसे मांग लो। सेठ ने सोच-विचार कर कहा कि आप यह वरदान दें कि मेरे घर के सब लोगों में प्रेम और एकता बनी रहे। देवी लक्ष्मी वरदान देकर वहां से चली गईं। वरदान के फलस्वरूप दूसरे दिन से ही सब लोग प्रेमपूर्वक रहने लगे और मिल-जुलकर काम करने लगे।

एक दिन सेठ ने स्वप्न में देखा कि देवी लक्ष्मी घर में फिर वापस आ गई हैं। उसने उन्हें प्रणाम किया और पुन: पधारने के लिए धन्यवाद दिया। देवी लक्ष्मी ने कहा कि इसमें धन्यवाद की कोई बात नहीं है। जहां एकता होती है और प्रेम रहता है वहां तो मैं बिना बुलाए ही पहुंच जाती हूं। जो लोग दरिद्रता से बचना चाहते हैं उन्हें अपने घर में कलह की परिस्थितियां उत्पन्न नहीं होने देनी चाहिए।

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