Edited By Niyati Bhandari,Updated: 10 Oct, 2026 10:44 AM

Solution to get rid of Pitra Dosha: सर्वपितृ अमावस्या पर पितरों के श्राद्ध और तर्पण के साथ-साथ व्रत कथा का विशेष महत्व है। जानें अक्षोदा और पितर अमावसु की पौराणिक कथा, 10 अक्टूबर 2026 के शुभ मुहूर्त और श्राद्ध की विधि।
Sarvapitri Amavasya fast story: पितृ पक्ष का अंतिम दिन यानी सर्वपितृ अमावस्या धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन उन सभी पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती या जिनका श्राद्ध पितृ पक्ष के दौरान किसी कारणवश छूट गया हो। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से पूजा-पाठ करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार को उनका अखंड आशीर्वाद प्राप्त होता है।
मान्यताओं के अनुसार जो व्यक्ति पूरे साल भर में श्राद्ध-तर्पण नहीं करता, अगर वह भी इस तिथि पर श्राद्ध-तर्पण कर लेता है तो उसे सभी तिथियों के श्राद्ध कर्म के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। आप भी भूल गए हैं पूर्वजों की मृत्यु तिथि तो पढ़ें ये सर्वपितृ अमावस्या से जुड़ी पौराणिक कथा। अगर पितरों के निमित्त व्रत रख रहे हैं तो भी इस कथा को पढ़ने अथवा सुनने से सुख-समृद्धि बनी रहती है और पितृ दोष के प्रभावों से राहत मिलती है।
पौराणिक समय में अग्निष्वात और बर्हिषपद नाम के दो पितृ देव थे। उनकी मानस कन्या थीं अक्षोदा। अक्षोदा ने पितरों को प्रसन्न करने के लिए एक हजार वर्ष तक बिना किसी विघ्न के तपस्या की। उसके तप से प्रसन्न होकर समस्त पितरगण अक्षोदा के समक्ष प्रकट हुए। उन पितरों में एक तेजस्वी पितृ अमावसु भी थे जिन्हें अक्षोदा बिना पलक झपकाए देखती रही, वो उनमें इस तरह मग्न हो गई कि उसने अपने पितरों की बातों को अनसुना कर दिया।

पितरों द्वारा जब उसे वर मांगने को कहा गया तो अक्षोदा ने पितरों से कहा- 'हे भगवन अगर आप मुझे वर देना चाहते हैं तो वरदान में आप मुझे स्वीकारें मैं आपका संग चाहती हूं।'
उसकी ये बात सुनकर सभी पितरगण क्रोध में आ गए। उन्होंने अक्षोदा को वरदान की जगह श्राप दिया कि वो पितर लोक से पृथ्वी लोक पर जाएगी। पितरों के द्वारा ऐसा श्राप दिए जाने पर अक्षोदा उनके पैरों में गिर कर क्षमा मांगने लगी। यह देख पितरों को उस पर दया आ गई। तब पितरों ने दयाभाव से उससे कहा कि श्राप के चलते तुम्हारा मत्स्य कन्या के रूप में जन्म होगा।

भगवान ब्रह्मा के वंशज महर्षि पराशर उस मत्स्य कन्या को पति रूप में मिलेंगे और उसके गर्भ से भगवान वेद व्यास जन्म लेंगे। फिर श्राप मुक्त होकर वह फिर से पितर लोक में वापस आ जाएगी।
इसके बाद सभी पितरों ने अमावसु की प्रशंसा की और कहा- 'आपने सौंदर्य और स्त्री के आगे अपने मन को भटकने नहीं दिया और अपने संयम और नियम पर अडिग रहे, इसलिए आज का दिन आपके नाम से यानि अमावसु नाम से जाना जाएगा।'
ऐसा मान्यता है कि तभी से आश्विन मास का ये दिन पितृमोक्ष अमावस्या के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
